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तय समय से ज्यादा रुके किराएदार, तो क्या मकान मालिक वसूल सकते हैं बढ़ा हुआ रेंट, दिल्ली हाई कोर्ट ने दिया बड़ा फैसला

अगर किरायेदार बढ़ा हुआ किराया नहीं देता या घर खाली नहीं करता, तो मकान मालिक जबरदस्ती उसका सामान बाहर नहीं फेंक सकता और न ही बिजली-पानी काट सकता है. बकाया पैसे वसूलने और किरायेदार को बाहर निकालने के लिए मकान मालिक को कोर्ट-कचहरी और कानूनी तरीके का ही सहारा लेना पड़ेगा.

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किराएदार के लिए जरूरी है ये नियम (Photo-ITG)
किराएदार के लिए जरूरी है ये नियम (Photo-ITG)

क्या आप जानते हैं अगर किराएदार किसी घर में तय समय से ज्यादा दिन तक रुकता है तो क्या मकान मालिक उससे ज्यादा किराया ले सकता है. दिल्ली हाईकोर्ट ने साफ किया है कि जो किरायेदार लीज की अवधि समाप्त होने के बाद भी संपत्ति पर कब्जा बनाए रखते हैं, उन्हें बढ़ा हुआ किराया देना पड़ सकता है, बशर्ते लीज समझौते में 'ऑटोमैटिक रेंट एस्केलेशन क्लॉज'  शामिल हो. अदालत ने माना कि खाली करने के लिए केवल अतिरिक्त समय की मांग करने से किरायेदार पुराने किराए पर रहने का हकदार नहीं हो जाता.

माना जा रहा है कि इस फैसले का व्यावसायिक और आवासीय दोनों तरह के लीज विवादों पर बड़ा असर पड़ेगा, जहां किरायेदार अक्सर कब्जा सौंपने से पहले कुछ समय का विस्तार मांगते हैं. यह मामला दिल्ली के मकान मालिक और कमर्शियल किरायेदारों के बीच विवाद से जुड़ा है, जिन्होंने मूल लीज समाप्त होने के बाद भी लगभग दो महीने तक परिसर पर कब्जा बनाए रखा था.
 
लीज समझौते के तहत, एक वर्ष के बाद किराए में 20% की वृद्धि होनी तय थी. हालांकि किरायेदारों ने संपत्ति खाली कर दी, लेकिन उनका तर्क था कि अतिरिक्त अवधि केवल उनके बाहर निकलने की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए मांगी गई थी, इसलिए इस पर बढ़ा हुआ किराया लागू नहीं होना चाहिए.

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हार्ईकोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि किराया वृद्धि का प्रावधान स्वतः ही प्रभावी हो गया क्योंकि किरायेदार तय अवधि के बाद भी कब्जे में रहे. कोर्ट ने कहा कि संपत्ति का वास्तविक कब्जा ही यह तय करता है कि लीज के तहत आपकी क्या देनदारी है, न कि किरायेदार की खाली करने की मंशा. जब तक किरायेदार परिसर पर कब्जा बनाए रखता है, तब तक किराए से जुड़े अनुबंध की शर्तें लागू रहेंगी.

यह निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह इस सिद्धांत को स्पष्ट करता है कि केवल लीज की अवधि समाप्त होने से अनुबंध की बाध्यताएं खत्म नहीं हो जातीं. कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला मकान मालिक और किरायेदार के संबंधों में अधिक निश्चितता प्रदान करता है, क्योंकि यह सुनिश्चित करता है कि सहमति वाली अनुबंध शर्तें तब तक प्रभावी रहेंगी जब तक कि कब्जा औपचारिक रूप से वापस नहीं कर दिया जाता.

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एक्सपर्ट्स के मुताबिक कोई किरायेदार केवल इसलिए वित्तीय प्रतिबद्धताओं को एकतरफा निलंबित नहीं कर सकता क्योंकि उसने खाली करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा है. अगर लीज में स्वतः किराया वृद्धि का प्रावधान है, तो वह क्लॉज कब्जा सौंपने तक प्रभावी रहेगा.

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उच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यह सिद्धांत तब भी लागू हो सकता है जब लीज डीड पंजीकृत न हो, बशर्ते किराया वृद्धि का क्लॉज पक्षों के बीच समझौते का हिस्सा था. घर खाली करने के लिए अतिरिक्त समय मांगने का मतलब कब्जा छोड़ना या लीज की शर्तों में बदलाव करना नहीं है, ऐसा अनुरोध किरायेदार के किराया देने के दायित्व को नहीं रोकता है. 

मकान मालिकों के अधिकार और सीमाएं

हालांकि, यह फैसला मकान मालिकों को किरायेदारों को जबरन निकालने या आवश्यक सेवाएं जैसे बिजली-पानी काटने की अनुमति नहीं देता है. उन्हें अदालतों के माध्यम से ही कानूनी उपाय तलाशने होंगे, जिनमें शामिल हैं-

  • बकाया या बढ़े हुए किराए की वसूली
  • जहां लागू हो, बकाया राशि पर ब्याज
  • उचित कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से बेदखली 
  • अनधिकृत कब्जे के लिए मुआवजा

किरायेदारों के लिए संदेश साफ है कि अगर लीज में स्वतः वृद्धि का प्रावधान है, तो खाली करने के लिए अतिरिक्त समय मांगने से पुराना किराया फ्रीज नहीं होगा.इस फैसले से मकान मालिकों को यह अधिकार तो मिल गया है कि वे समझौते के तहत किराये में बढ़ोतरी वसूल सकते हैं, लेकिन, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि वे खुद कानून अपने हाथ में ले लें.

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