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भारत का सबसे बड़ा लकड़ी का महल, 400 साल पुराने रहस्य से उठ गया पर्दा!

Padmanabhapuram Palace वास्तुकला का एक ऐसा अजूबा है, जहां कदम रखते ही इतिहास ज़िंदा हो उठता है. इस शाही महल में कई ऐसी रहस्यमयी चीज़ें हैं जैसे बिना किसी मॉडर्न तकनीक के कांच की तरह चमकने वाले फर्श और राजाओं के भागने के लिए बनी गुप्त भूमिगत सुरंगें जो आज के वैज्ञानिकों और इतिहासकारों को भी हैरान कर देती हैं.

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समय के चक्र में ठहरा एक अनोखा महल (Pictures: Wikimedia Commons)
समय के चक्र में ठहरा एक अनोखा महल (Pictures: Wikimedia Commons)

क्या आप जानते हैं कि भारत के बिल्कुल दक्षिणी छोर पर एक ऐसा शाही महल है, जहां कदम रखते ही ऐसा लगता है मानो हम समय में 400 साल पीछे चले गए हों. हम बात कर रहे हैं पद्मनाभपुरम पैलेस की. यह महल अपनी गुप्त भूमिगत सुरंगों, सदियों पुरानी खूबसूरत पेंटिंग्स और लकड़ी की बेहतरीन नक्काशी के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है.

यह रियासत 1601 की है, जब यह वेनाड साम्राज्य का राज हुआ करता था. 1750 तक, महाराजा मार्तंड वर्मा ने अपना राज्य भगवान पद्मनाभ को समर्पित कर दिया और इस राजधानी का नाम बदलकर पद्मनाभपुरम कर दिया  जिसका अर्थ है "भगवान पद्मनाभ का निवास.

पद्मनाभपुरम पैलेस

अजूबा हे ये महल

इस महल के फर्श आज भी कांच की तरह चमकते हैं और यह इतिहासकारों के लिए एक बड़ा रहस्य हैं. माना जाता है कि कारीगरों ने इसे बनाने के लिए कोयला, चूना, जले हुए नारियल के छिलके और पौधों के रस का इस्तेमाल किया था. लेकिन इसे बनाने का असली तरीका क्या था, इसका कोई लिखित रिकॉर्ड नहीं है.

राजमाता का महल इस पूरे महल का सबसे पुराना हिस्सा है. यहां एक पारंपरिक आंगन है, जिसके चारों तरफ लकड़ी का बेहद खूबसूरत काम किया गया है. यहीं पर एक गुप्त भूमिगत सुरंग भी है, जिसका इस्तेमाल राजा-महाराजा मुसीबत के समय सुरक्षित भागने के लिए करते थे.

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भारत का सबसे बड़ा लकड़ी का महल

राजा का जो मीटिंग रूम था, उसे इस तरह से डिजाइन किया गया था कि बाहर चाहे कितनी भी भयंकर गर्मी हो, अंदर हमेशा प्राकृतिक रूप से ठंडक रहती थी. इसकी लकड़ी की झरोखेदार खिड़कियां तेज धूप को रोक देती थीं, लेकिन ठंडी हवा को अंदर आने देती थीं.

विशाल डाइनिंग हॉल त्रावणकोर के राजाओं के बड़े दिल और उनकी अमीरी की कहानी बयां करता है. पुराने समय में जब भी कोई बड़ा शाही उत्सव होता था, तो यहां एक साथ हजारों मेहमानों को खाना खिलाया जाता था.  

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