घर खरीदने की प्रक्रिया अब सिर्फ इस सवाल तक सीमित नहीं रह गई है कि कितने बजट में कितना महंगा घर खरीदा जा सकता है. भारतीय रियल एस्टेट बाजार में खरीदारों की प्राथमिकताएं तेजी से बदल रही हैं. अब लोग घर की कीमत और लोन एलिजिबिलिटी के साथ यह भी देख रहे हैं कि वे किस तरह के माहौल और किस इलाके में रहना चाहते हैं. यानी घर खरीदने का फैसला अब सिर्फ चार दीवारों तक सीमित नहीं है, बल्कि आसपास के पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर और लाइफस्टाइल को ध्यान में रखकर लिया जा रहा है.
आज के खरीदार सिर्फ घर या फ्लैट देखकर फैसला नहीं कर रहे हैं. वे पूरे इलाके को समझने की कोशिश कर रहे हैं. इसके लिए दिन के अलग-अलग समय पर लोकेशन का दौरा किया जा रहा है, ताकि कम्यूट टाइम, ट्रैफिक और पब्लिक ट्रांसपोर्ट की कनेक्टिविटी का अंदाजा लगाया जा सके. इसके अलावा, आसपास स्कूल, अस्पताल, बाजार, पार्क और दूसरी जरूरी सुविधाएं कितनी आसानी से उपलब्ध हैं, इसे भी काफी महत्व दिया जा रहा है.
इलाके की असली तस्वीर समझने के लिए मानसून भी खरीदारों के लिए एक तरह का टेस्ट बन गया है. बारिश के दौरान किसी इलाके में जलभराव होता है या नहीं, ड्रेनेज सिस्टम कितना बेहतर है, सड़कों की हालत कैसी है और घरों में सीलन की समस्या तो नहीं है, इन चीजों का पता आसानी से चल जाता है. ऐसी कई जमीनी हकीकतें प्रॉपर्टी के ब्रोशर या ऑनलाइन लिस्टिंग में दिखाई नहीं देतीं.
इसके साथ ही बदलते मौसम और बढ़ते क्लाइमेट रिस्क ने भी घर खरीदने के फैसले को प्रभावित किया है. बाढ़, हीटवेव और पानी की कमी जैसी चुनौतियों को देखते हुए खरीदार अब यह भी सोच रहे हैं कि आने वाले सालों में कोई इलाका रहने के लिहाज से कितना सुरक्षित और टिकाऊ रहेगा.
यह भी पढ़ें: बड़े शहरों में घर खरीदार क्यों पीछे हट रहे हैं, क्या खत्म हो गया प्रॉपर्टी बाजार का बूम?
Millennials और Gen Z की बदलती सोच
यह बदलाव खास तौर पर Millennials और Gen Z के बीच देखने को मिल रहा है. BASIC Home Loan की 7,400 से ज्यादा होमबायर्स पर की गई स्टडी के मुताबिक, घर खरीदने वालों में करीब 90-95% हिस्सेदारी इन्हीं दोनों पीढ़ियों की है.
इनके लिए अफोर्डेबल घर का मतलब सिर्फ कम कीमत वाला घर नहीं है. अब खरीदार यह भी देख रहे हैं कि घर की लोकेशन कैसी है, ऑफिस या काम की जगह तक पहुंचने में कितना समय लगेगा और आसपास की सुविधाएं कितनी अच्छी हैं. अगर थोड़े ज्यादा पैसे खर्च करने पर बेहतर लोकेशन, कम ट्रैवल टाइम और अच्छी लाइफस्टाइल मिलती है, तो ये खरीदार उसके लिए ज्यादा कीमत देने को भी तैयार हैं.
यानी आज का खरीदार सिर्फ यह नहीं देख रहा कि घर कितना सस्ता है, बल्कि यह भी देख रहा है कि उस घर में रहकर जिंदगी कितनी आसान और बेहतर होगी.
शहरों के बढ़ने के साथ बदलेंगी प्राथमिकताएं
भारत में तेजी से बढ़ते शहरीकरण के बीच यह बदलाव और भी महत्वपूर्ण हो जाता है. World Bank की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, 2030 तक भारत में पैदा होने वाली नई नौकरियों में करीब 70% शहरों से आने की उम्मीद है. वहीं, 2050 तक देश की शहरी आबादी 951 मिलियन तक पहुंच सकती है. इसके अलावा, 2070 तक 144 मिलियन से ज्यादा नए घरों की जरूरत पड़ने का अनुमान है.
ऐसे में आने वाले समय में किसी इलाके की कीमत सिर्फ इस बात से तय नहीं होगी कि वहां घर कितना बड़ा है या उसकी कीमत कितनी है. पानी की उपलब्धता, बेहतर सड़कें, मजबूत ड्रेनेज सिस्टम, बिजली की बचत, पब्लिक ट्रांसपोर्ट, हरियाली और आसपास का पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर भी किसी इलाके की वैल्यू तय करने में बड़ी भूमिका निभाएंगे.
कुल मिलाकर, भारतीय होमबायर्स की सोच में बड़ा बदलाव आ रहा है. अब घर खरीदना सिर्फ एक प्रॉपर्टी खरीदने का फैसला नहीं है. लोग ऐसी जगह चुनना चाहते हैं, जहां उनका रोजमर्रा का सफर आसान हो, जरूरी सुविधाएं पास हों, पर्यावरण बेहतर हो और आने वाले समय में भी वह इलाका रहने के लिए अच्छा बना रहे. यानी आने वाले दौर में लोग सिर्फ घर नहीं, बल्कि बेहतर लोकेशन, बेहतर सुविधाएं और बेहतर लाइफस्टाइल खरीदना चाहेंगे.
यह भी पढ़ें: चीन का रियल एस्टेट फिर संकट में! जमीनों की लीज खत्म, क्या डूब जाएंगे खरबों रुपये