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दुबई के रियल एस्टेट पर खतरा, डेवलपर्स पर भारी पड़ रहा मिडिल ईस्ट का तनाव

बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इस अनिश्चितता का सबसे ज्यादा असर दुबई के रियल एस्टेट पर पड़ा है, हालांकि निवेश के कुछ नए मौके बन रहे हैं, लेकिन निवेशक फिलहाल 'देखो और इंतजार करो' की नीति अपना रहे हैं और स्थिति साफ होने का इंतजार कर रहे हैं.

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ईरान- इजरायल जंग का दुबई पर असर (Photo-ITG)
ईरान- इजरायल जंग का दुबई पर असर (Photo-ITG)

मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के चौथे हफ्ते में प्रवेश करने के साथ ही दुबई के रियल एस्टेट सेक्टर पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं. ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार, निवेशकों के बीच बढ़ती चिंता और कर्ज चुकाने के जोखिमों ने दुबई के दो बड़े प्रॉपर्टी डेवलपर्स द्वारा जारी किए गए बॉन्ड्स को 'डिस्ट्रेस्ड' यानी भारी गिरावट की श्रेणी में धकेल दिया है.

बाजार के आंकड़ों के अनुसार, इस क्षेत्र की कई बड़ी कंपनियों के 6 डॉलर वाले बॉन्ड्स अब 'खतरे के निशान' पर पहुंच गए हैं. निवेशकों को अब इन कंपनियों को पैसा उधार देने में बहुत ज्यादा जोखिम लग रहा है. यही वजह है कि इन कंपनियों को बाजार से नया कर्ज लेने के लिए सुरक्षित सरकारी निवेश के मुकाबले 10% से भी ज्यादा अतिरिक्त ब्याज चुकाना पड़ रहा है.

मौजूदा स्थिति यह है कि मिडिल ईस्ट के रियल एस्टेट सेक्टर के कुल डॉलर मार्केट का लगभग 15% हिस्सा अब इसी संकट वाली श्रेणी में आ चुका है, जहां निवेशकों को डर है कि कंपनियां अपना पुराना कर्ज समय पर नहीं लौटा पाएंगीं.

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निवेशकों में तनाव

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निवेशकों के बीच कर्ज चुकाने के जोखिम को लेकर बढ़ती चिंता ने बिनघाटी होल्डिंग और ओमनियत होल्डिंग्स जैसी बड़ी कंपनियों के बॉन्ड्स को 'संकटग्रस्त' (Distressed) श्रेणी में ला खड़ा किया है. विशेष रूप से बिनघाटी का 2027 में मैच्योर होने वाला बॉन्ड फिलहाल सबसे ज्यादा दबाव में है. यह गिरावट इस सेक्टर के लिए एक बड़ा झटका है, क्योंकि फरवरी के अंत तक इन कंपनियों के बॉन्ड्स की स्थिति काफी मजबूत थी, लेकिन युद्ध के कारण अब नया कर्ज मिलना मुश्किल हो गया है.

हालांकि, दोनों कंपनियों ने अपनी स्थिति को मजबूत बताया है. बिनघाटी का कहना है कि उनके निर्माण कार्यों पर कोई असर नहीं पड़ा है और बुकिंग रद्द होने की दर 1% से भी कम है, जबकि मार्च में उनकी सेल संकट से पहले के स्तर पर ही रही. वहीं, ओमनियत ने स्पष्ट किया है कि उनके पास अगले चार साल तक के लिए पर्याप्त फंड और रेवेन्यू मौजूद है. दूसरी ओर, फिच रेटिंग्स (Fitch Ratings) ने इन डेवलपर्स को 'निगरानी' पर रखा है, क्योंकि भू-राजनीतिक जोखिमों के चलते निर्माण लागत बढ़ सकती है और मांग में कमी आ सकती है.

चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि युद्ध शुरू होने से पहले इन कंपनियों ने दुबई और अबू धाबी में नए प्रोजेक्ट्स के लिए बड़े पैमाने पर कर्ज लिया था. अब स्थिति यह है कि साल 2030 तक इन कंपनियों को लगभग 8 अरब डॉलर का कर्ज चुकाना है.

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