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क्या सच में सस्ते हैं अफोर्डेबल फ्लैट्स, एक्सपर्ट से समझिए बिल्डर का खेल!

निवेशकों और खरीदारों के लिए सबसे बड़ी सलाह यही है कि वे किसी भी मार्केटिंग स्ट्रेटजी या भारी डिस्काउंट के पीछे न भागें. निवेश से पहले बिल्डर की हिस्ट्री, पुराने प्रोजेक्ट्स की डिलीवरी और उस क्षेत्र के भविष्य के विकास की 'ड्यू डिलिजेंस' यानी जांच-परख स्वयं करें.

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बिल्डर के लुभावने वादों से कैसे बचें (Photo-Pexels)
बिल्डर के लुभावने वादों से कैसे बचें (Photo-Pexels)

मिडिल क्लास लोगों के लिए अपना घर जीवन भर की जमा-पूंजी और भावनाओं से जुड़ा होता है. वर्तमान समय में 'अफोर्डेबल हाउसिंग' या 'सस्ता घर' एक ऐसा शब्द बन गया है जो सुनने में तो बहुत लुभावना लगता है, लेकिन इसके पीछे की हकीकत काफी जटिल है.

नोएडा, गाजियाबाद और गुड़गांव जैसे शहरी क्षेत्रों में लोग अक्सर सरकारी योजनाओं या निजी बिल्डर्स के विज्ञापनों को देखकर निवेश कर देते हैं, लेकिन बाद में उन्हें कई तकनीकी और वित्तीय समस्याओं का सामना करना पड़ता है. आजतक रेडियो के शो प्रॉपर्टी से फायदा में रियल एस्टेट एक्सपर्ट रोहित धीमान ने अफोर्डेबल हाउसिंग पर चर्चा की.

रोहित धीमान ने बताया कि कैसे जमीनी हकीकत का विश्लेषण करें तो यह साफ होता है कि सस्ता घर खरीदना जितना आसान दिखता है, उसकी डगर उतनी ही पथरीली है. आम जनता में अक्सर यह डर बना रहता है कि सरकारी फ्लैट्स के आवंटन में 'पुल' या 'कॉन्टेक्ट्स' का इस्तेमाल कर प्रभावशाली लोग नाम निकलवा लेते हैं.  लेकिन वास्तव में, यह प्रणाली पूरी तरह से पारदर्शी और 'चिट सिस्टम' पर आधारित होती है, जहां आवेदकों और जनता की मौजूदगी में पर्चियां निकाली जाती हैं.  यह एक ऐसा मंच है जहां धांधली की संभावना लगभग शून्य होती है, लेकिन यहां भाग्य से ज्यादा आपकी पात्रता मायने रखती है.

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अफोर्डेबल हाउसिंग क्या है?
 
रोहित कहते हैं- 'अफोर्डेबल हाउसिंग में निवेश के दौरान एक बड़ी समस्या कीमतों में अचानक होने वाली वृद्धि और पजेशन में देरी है. कई बार देखा गया है कि जिस फ्लैट के लिए आपने आवेदन किया था, उसकी कीमत निर्माण के दौरान 5000 से 6000 रुपये प्रति वर्ग फुट तक पहुंच जाती है, ऐसे में कई खरीदार विरोध स्वरूप अपनी यूनिट वापस ले लेते हैं या विड्रॉ कर लेते हैं. यहां एक कानूनी पेच यह है कि यदि आपका नाम ड्रॉ में आ गया और आपने खुद की मर्जी से यूनिट सरेंडर की, तो भविष्य में आप दोबारा उसी एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया के तहत आवेदन नहीं कर सकते. ' 

पजेशन में देरी के पीछे अक्सर बिल्डर का कैश फ्लो और 'कंस्ट्रक्शन लिंक प्लान' (CLP) जिम्मेदार होता है. बिल्डर अपने मुनाफे और ग्राहकों से मिलने वाली किस्तों से निर्माण कार्य चलाता है. जब फाउंडेशन यानी नींव का काम चल रहा होता है, तो वह सबसे खर्चीला और समय लेने वाला हिस्सा होता है. खरीदारों को अक्सर जमीन पर कुछ दिखाई नहीं देता और वे किश्तें देना बंद कर देते हैं, जिससे प्रोजेक्ट रुक जाता है. इसके अलावा, सरकारी प्राधिकरणों और रेरा (RERA) से मिलने वाली मंजूरियों में लगने वाला समय भी देरी का एक बड़ा कारण बनता है.

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रेरा से कितना फायदा?

रोहित बताते हैं 'रियल एस्टेट की इस दुनिया में 'रेरा' (RERA) बायर के लिए एक सुरक्षा कवच या 'शील्ड' की तरह है. आज के समय में बिना रेरा  पंजीकरण वाले प्रोजेक्ट में निवेश करना अपनी मेहनत की कमाई को दांव पर लगाने जैसा है. रेरा न केवल पजेशन की समय सीमा तय करता है, बल्कि बिल्डर की जवाबदेही भी सुनिश्चित करता है. यदि कोई प्रोजेक्ट 4 साल के वादे के बाद 7 साल तक नहीं बनता, तो खरीदार रेरा के जरिए मुआवजे या ब्याज सहित रिफंड की मांग कर सकता है.'
 
अक्सर लोग निजी बिल्डर्स की चमचमाती मार्केटिंग और लुभावने विज्ञापनों में फंस जाते हैं और नीचे लिखे शर्तों को नहीं पढ़ते. जब पजेशन का समय आता है, तब खरीदार को पता चलता है कि उसे IFMS, IDC, PLC और अन्य हिडन चार्जेस के नाम पर लाखों रुपये अतिरिक्त देने हैं. जो घर कागजों पर 30 लाख का दिख रहा था, वह असलियत में 35 या 36 लाख का पड़ता है. यहीं पर 'सस्ता घर' का नैरेटिव कमजोर पड़ने लगता है.

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रोहित कहते हैं 'गाजियाबाद के मधुबन बापूधाम या गोविंदपुरम जैसे इलाकों में हमने देखा है कि सरकार 25% तक का डिस्काउंट देने को तैयार है, फिर भी फ्लैट्स खाली पड़े हैं. इसका सबसे बड़ा कारण है 'लोकेशन' और 'कनेक्टिविटी'. लोग वहां निवेश नहीं करना चाहते जहां मूलभूत सुविधाएं न हों या जहां सुरक्षा की समस्या हो.  मध्यमवर्गीय खरीदार अक्सर ऐसी दुविधा में फंस जाता है जहां वह एक तरफ रेंट दे रहा होता है और दूसरी तरफ बैंक की ईएमआई. ' 

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यदि प्रोजेक्ट में देरी हो जाए, तो वह वित्तीय और मानसिक दबाव के ऐसे दलदल में फंस जाता है जहां से निकलना मुश्किल हो जाता है. कुछ मामलों में तो प्रोजेक्ट के 'एनसीएलटी' (NCLT) में जाने की वजह से लोगों का पैसा सालों तक फंसा रहता है. प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) जैसी सब्सिडी योजनाएं निश्चित रूप से राहत देती हैं, लेकिन हाल के बदलावों के बाद अब सब्सिडी एकमुश्त न मिलकर किस्तों में मिल रही है, जिससे ग्राहकों को अपनी योजना दोबारा बनानी पड़ रही है.

 

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