भारतीय रियल स्टेट में सुधारों के नाम पर रेरा (RERA) जैसे कानून तो आए, लेकिन आज भी इस सेक्टर की स्थिति 'ऊपर से फिट और अंदर से अनिश्चित' बनी हुई है. कोर्ट-कचहरियों में आज भी दो-तिहाई मामले प्रॉपर्टी से जुड़े हैं, जो यह साबित करते हैं कि लिटिगेशन की भारी लागत और समय के बावजूद खरीदार परेशान है. आजतक रेडियो के खास शो प्रॉपर्टी से फायदा में रियल इस्टेट एक्सपर्ट और जर्नलिस्ट रवि सिन्हा ने रियल एस्टेट से जुड़ी परेशानियों पर खुलकर चर्चा की.
रवि कहते हैं- 'रिफॉर्म्स के जितने भी दावे किए जा रहे हैं, वे वास्तविक बदलाव के बजाय एक 'टच-अप' मात्र हैं. एक औसत खरीदार को यह समझने की जरूरत है कि उसके पास उपलब्ध जानकारी और असली ग्राउंड रियलिटी के बीच एक गहरी खाई है, जिसे पाटने की कोई ईमानदार कोशिश नहीं की जा रही है. हम दुबई जैसे ग्लोबल मार्केट्स से तुलना करें, तो वहां का रेगुलेटर (RERA) प्रोजेक्ट की घोषणा होते ही सक्रिय हो जाता है, उदाहरण के लिए, यदि कोई बिल्डर 20:80 जैसी स्कीम लाता है, तो उसे तुरंत समन देकर 'सोर्स ऑफ फंड' पूछा जाता है और पूरा पैसा एस्क्रो अकाउंट में जमा कराया जाता है.
इसके विपरीत, भारत में रेरा केवल पब्लिक से लिए गए डिपॉजिट के 70% को सुरक्षित करने की बात करता है. यहां बिल्डर की वित्तीय क्षमता या उसके पास मौजूद 'ब्लैक मनी कार्टेल' की कोई जांच नहीं होती, यदि फंडिंग का फ्लो रुक जाए, तो प्रोजेक्ट अटक जाता है और आम जनता का निवेश डूब जाता है.'
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एंट्री बैरियर और नेटवर्थ का अभाव
रवि बताते हैं कि रियल स्टेट की सबसे बड़ी ढांचागत समस्या यह है कि यहां कोई 'एंट्री बैरियर' नहीं है, जिस तरह बैंक खोलने के लिए आरबीआई नेटवर्थ और क्रेडेंशियल्स की कड़ी जांच करता है, वैसा रियल स्टेट में कुछ नहीं है. यहां कोई भी व्यक्ति अचानक बिल्डर बन सकता है, जब तक डेवलपर की बैकग्राउंड हिस्ट्री, उसके पिछले डिफॉल्ट्स और न्यूनतम नेटवर्थ की जांच नहीं होगी, तब तक यह सेक्टर पेशेवर नहीं बन पाएगा. एंट्री बैरियर का मतलब रेड-टेपिज्म नहीं, बल्कि खरीदारों के पैसे की सुरक्षा सुनिश्चित करना है, ताकि कोई भी पोंजी स्कीम की तरह पब्लिक डिपॉजिट न ले सके.
रवि का कहना है कि 'यह दुनिया का अकेला ऐसा बिज़नेस मॉडल है जहां ग्राहक उस चीज़ के लिए भुगतान पहले करता है जो अभी बनी ही नहीं है. 'सेल एंड बिल्ड' का यह तरीका सबसे ज्यादा जोखिम भरा है. इसके समाधान के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतों की जरूरत थी, लेकिन रेरा के आने के बाद लिटिगेशन का समय और बढ़ गया है. रेरा के आदेशों का पालन न हो पाना एक कड़वी सच्चाई है. मामला रेरा से शुरू होकर सुप्रीम कोर्ट तक सालों-साल खिंचता है, जिससे एक औसत मध्यमवर्गीय खरीदार थक-हारकर अपनी उम्मीद छोड़ देता है.'
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ब्लैक मनी और वेस्टेड इंटरेस्ट का गहरा जाल
रियल स्टेट में सुधार की राह में सबसे बड़ा रोड़ा 'वेस्टेड इंटरेस्ट' है. यह सेक्टर आज भी काले धन को पार्क करने का सबसे बड़ा जरिया बना हुआ है. सर्वे बताते हैं कि 2011 में भी 80% खरीदार असंतुष्ट थे और 2025 में भी यही स्थिति बनी हुई है. अफोर्डेबल हाउसिंग का गायब होना और लग्जरी हाउसिंग का बढ़ना इस बात का प्रमाण है कि बाजार केवल मुनाफे की ओर भाग रहा है. दुर्भाग्य यह है कि इस इकोसिस्टम में बोलने वाली अधिकांश आवाजें उन्हीं से जुड़ी हैं जिनका 'कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट' है. जब तक खरीदार के हितों को केंद्र में रखकर कड़े नीतिगत बदलाव नहीं होंगे, तब तक यह शोषण का चक्र चलता रहेगा.