अमेरिका सीधे तौर पर भारत को टैरिफ की धमकी नहीं देता है. लेकिन भारत की रूस से दोस्ती, ईरान से अच्छे संबंध अमेरिका को हमेशा खलते रहता है. भारत को रोकने के लिए तरह-तरह हथकंडे अपनाए जा रहे हैं. इसी महीने अमेरिकी संसद ने 'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट' पारित किया गया, इस पर एक्ट पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हस्ताक्षर कर चुके हैं.
दरअसल, यह कानून अमेरिकी प्रशासन को रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर 100% तक का टैरिफ लगाने का अधिकार देता है. जानकारों की मानें तो इस एक्ट के जरिये अमेरिका का मुख्य निशाना भारत और चीन है.
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह कदम सिर्फ रूस-यूक्रेन नीति से जुड़ा है, या इसके पीछे भारत के आर्थिक उभार को रोकने की अमेरिकी रणनीति है? इतिहास बताता है कि जब-जब अमेरिका को आर्थिक तौर पर चुनौती मिलती है, वो दबाव वाली नीति अपनाने से पीछे नहीं हटता है. साल 2001 में जॉर्ज डब्ल्यू. बुश प्रशासन ने 1998 के पोखरण-द्वितीय परमाणु परीक्षण के बाद भारत पर लगाए गए अमेरिकी प्रतिबंधों को हटा लिया था.
अब ठीक 25 साल बाद अमेरिका एक बार फिर भारत पर टैरिफ के जरिये दबाव बनाना चाह रहा है. इस बार कारण भारत द्वारा रूस से रियायती दरों पर कच्चे तेल की खरीद है.
'चीन वाली गलती भारत के साथ नहीं दोहराएंगे'
एक्सपर्ट के मुताबिक अमेरिका के इस कड़े रुख की एक बड़ी वजह यह डर है कि भारत वैश्विक स्तर पर अमेरिका को चुनौती देने वाला अगला एशियाई आर्थिक दिग्गज न बन जाए. इसी साल मार्च में अमेरिका के उप-विदेश मंत्री क्रिस्टोफर लैंडौ के एक बयान पर गौर करें, तो तस्वीर साफ हो जाएगी, उन्होंने साफ कहा था, 'अमेरिका भारत के साथ वह गलती नहीं दोहराएगा जो उसने 20 साल पहले चीन के साथ की थी.'
दरअसल, 1970 और 1990 के दशक में अमेरिका ने चीन के लिए दुनिया के लगभग सभी बड़े मार्केट खोल दिए, टेक्नोलॉजी से भी मदद की, और पश्चिमी निवेश भी आसानी से चीन तक पहुंचा. नतीजा यह हुआ कि 1980 में चीन की अर्थव्यवस्था जो अमेरिका की तुलना में महज 7% ($191 अरब) थी, वह 2025 तक बढ़कर $19.5 ट्रिलियन पहुंच गई, जबकि अमेरिकी की जीडीपी $30.8 ट्रिलियन की है.
यही नहीं, ग्लोबल मैन्यूफैक्चरिंग में चीन की हिस्सेदारी 1990 में 3% थी, जो साल 2023 में बढ़कर 31.8% हो गई, जबकि इस दौरान अमेरिका का हिस्सा घटता गया. अमेरिका की उम्मीद थी कि समृद्ध होने के बाद चीन लोकतांत्रिक बनेगा, लेकिन चीन एक मजबूत आर्थिक और सैन्य प्रतिद्वंद्वी बनकर उभर गया. एक्सपर्ट्स की मानें तो इसी अनुभव से सतर्क अमेरिका अब भारत के साथ बेहद सतर्क और सख्त नीति अपना रहा है.
भारत की 'सामरिक स्वायत्तता' और ऊर्जा सुरक्षा
अमेरिका भले ही अपने सहयोगियों से अपनी नीतियों के प्रति पूर्ण निष्ठा की अपेक्षा रखता हो, लेकिन भारत की विदेश नीति हमेशा अपनी 'सामरिक स्वायत्तता' पर आधारित रही है. भारत अमेरिका से सैन्य उपकरण, फ्रांस से राफेल लड़ाकू विमान, रूस से कच्चा तेल और चीन से इलेक्ट्रॉनिक्स अपनी राष्ट्रीय जरूरतों के हिसाब से खरीदता है.
अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा के मुताबिक 1.4 अरब भारतीयों के लिए ऊर्जा एक मौलिक सामरिक आवश्यकता है, भारत इनकी जरूरतों को पूरा करने के लिए समावेशी रणनीति अपनाता है. क्योंकि भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 85% से अधिक आयात करता है. जुलाई 2026 में भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी लगभग 52% थी, भारत का स्पष्ट रुख है कि उसके नागरिकों के लिए ऊर्जा सुरक्षा और किफायती दरें सबसे पहली प्राथमिकता हैं.
क्या अमेरिका का यह दबाव काम करेगा?
बता दें, 1998 में पोखरण परीक्षण के बाद भी अमेरिका ने भारत पर कड़े प्रतिबंध लगाए थे. सैन्य बिक्री, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और कर्ज देने पर रोक लगा दी गई थी. लेकिन भारत अपनी मजबूत घरेलू अर्थव्यवस्था के बल पर उस संकट से उबरा और अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखी. आगे चलकर 2001 में अमेरिका को ही वे प्रतिबंध हटाने पड़े और 2008 में दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक असैन्य परमाणु समझौता हुआ.
ऐसे में अब अमेरिका की ओर से 100% टैरिफ का डर दिखाकर भारत को रूस से तेल खरीदने से रोकने की कोशिश द्विपक्षीय संबंधों में तनाव पैदा कर सकती है. विदेश नीति विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका को यह समझना होगा कि भारत को दबाने या उसकी आर्थिक बढ़ोतरी को सीमित करने के प्रयास सफल नहीं होंगे.
भारत-अमेरिका साझेदारी केवल तभी मजबूत रह सकती है जब यह एकतरफा दबाव के बजाय परस्पर हितों और सम्मान पर आधारित हो. भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक विकास से समझौता किए बिना अपनी राह पर आगे बढ़ता रहेगा.