भारत में आईफोन बनने की चर्चा अब सिर्फ एक फोन की मैन्युफैक्चरिंग तक सीमित नहीं है. यह इस बात की भी परीक्षा है कि सरकारी प्रोत्साहन से देश में नई फैक्ट्रियां, नौकरियां और निर्यात कितनी तेजी से बढ़ सकते हैं. केंद्र सरकार की प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम के तहत मोबाइल कंपनियों को उत्पादन बढ़ाने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन दिया गया.
केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव के मुताबिक, मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग के लिए सरकार ने 19,000 करोड़ रुपये के प्रोत्साहन दिए, जबकि इस क्षेत्र से 25,000 करोड़ रुपये का डायरेक्ट टैक्स और 3 लाख करोड़ रुपये का GST कलेक्शन हुआ. उन्होंने यह भी बताया कि इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में 25 लाख लोग काम कर रहे हैं, जिनमें 12 लाख मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े हैं.
लेकिन इस कहानी का दूसरा पहलू भी है. सवाल यह है कि क्या भारत केवल विदेशों से पुर्जे मंगाकर फोन जोड़ रहा है या धीरे-धीरे उन पुर्जों और तकनीक का उत्पादन भी देश में बढ़ा रहा है, जिनसे किसी फोन की असली वैल्यू बनती है? यही बहस 'मेक इन इंडिया' और 'मेड इन इंडिया' की प्रगति को समझने के लिए अहम है.
क्या है PLI स्कीम?
PLI का पूरा नाम प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव है. आसान भाषा में समझें तो यह ऐसी योजना है, जिसमें पात्र कंपनियों को देश में उत्पादन बढ़ाने पर सरकार की ओर से आर्थिक प्रोत्साहन दिया जाता है. इसका मकसद कंपनियों को भारत में फैक्ट्रियां लगाने, उत्पादन बढ़ाने, निवेश करने और दूसरे देशों के मुकाबले भारत को मैन्युफैक्चरिंग के लिए ज्यादा आकर्षक जगह बनाने में मदद करना है.
उदाहरण के लिए, अगर कोई कंपनी भारत में मोबाइल फोन बनाती है और योजना की शर्तों को पूरा करती है, तो उसे तय नियमों के अनुसार प्रोत्साहन मिल सकता है. इससे कंपनी के लिए भारत में उत्पादन बढ़ाने का आर्थिक फायदा बढ़ता है. सरकार को उम्मीद रहती है कि इसके बदले देश में निवेश आएगा, रोजगार बनेगा, उत्पादन बढ़ेगा और निर्यात को बढ़ावा मिलेगा. यानी सरकार सीधे हर फोन बनाने का खर्च नहीं उठाती, बल्कि तय शर्तों के तहत उत्पादन बढ़ाने वाली कंपनियों को प्रोत्साहित करती है.
PLI से बदली मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग की तस्वीर
कुछ साल पहले तक भारत अपनी मोबाइल फोन की जरूरतों के बड़े हिस्से के लिए आयात पर निर्भर था. अब तस्वीर काफी बदल चुकी है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2014-15 में देश में मोबाइल फोन की मांग का करीब 75 फीसदी हिस्सा आयात से पूरा होता था. वित्त वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा घटकर करीब 0.02 फीसदी रह गया.
मोबाइल फोन का उत्पादन भी तेजी से बढ़ा है. सरकार के मुताबिक, 2014-15 में देश में करीब 18,000 करोड़ रुपये के मोबाइल फोन बनते थे, जबकि 2024-25 में यह उत्पादन बढ़कर लगभग 5.5 लाख करोड़ रुपये हो गया. इसी अवधि में इलेक्ट्रॉनिक्स सामान का कुल उत्पादन भी करीब 1.9 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 11.3 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया.
इस बदलाव में PLI स्कीम की भूमिका अहम रही है. इसके जरिए कंपनियों को भारत में बड़े पैमाने पर मोबाइल बनाने के लिए प्रोत्साहन मिला. साथ ही, देश में पहले से मौजूद फैक्ट्रियों का विस्तार हुआ और विदेशी कंपनियों की सप्लाई चेन भारत की ओर बढ़ी.
भारत में बढ़ रही आईफोन की मैन्युफैक्चरिंग
इस बदलाव का सबसे चर्चित उदाहरण एप्पल का आईफोन है. कंपनी और उसके मैन्युफैक्चरिंग पार्टनर भारत में उत्पादन बढ़ा रहे हैं. इससे भारत को वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स सप्लाई चेन में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने का मौका मिला है. ब्लूमबर्ग की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, अब दुनिया में बनने वाले करीब हर चार में से एक आईफोन का उत्पादन भारत में हो रहा है. यह इस बात का संकेत है कि भारत केवल घरेलू बाजार के लिए फोन नहीं बना रहा, बल्कि वैश्विक मांग पूरी करने वाली मैन्युफैक्चरिंग व्यवस्था का भी हिस्सा बन रहा है.
एप्पल के लिए भी भारत में उत्पादन बढ़ाने का एक कारण चीन पर अपनी निर्भरता कम करना है. कंपनियां इसे 'चाइना प्लस वन' रणनीति कहती हैं. इसका मतलब है कि चीन में मौजूद उत्पादन व्यवस्था के साथ दूसरे देशों में भी फैक्ट्रियां और सप्लाई चेन तैयार की जाएं, ताकि किसी एक देश पर निर्भरता कम हो. भारत के लिए इसका फायदा निवेश, रोजगार, तकनीकी अनुभव और निर्यात के अवसरों के रूप में सामने आ सकता है.
कितना बढ़ा निवेश, उत्पादन और निर्यात?
PLI स्कीम के नतीजे समझने के लिए इसके आधिकारिक आंकड़े अहम हैं. सरकार की ओर से जुलाई 2025 में संसद में दी गई जानकारी के मुताबिक, जून 2025 तक बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग की PLI स्कीम के तहत 12,390 करोड़ रुपये का निवेश आया था. इस दौरान कुल उत्पादन 8.44 लाख करोड़ रुपये और योजना के तहत निर्यात 4.65 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया था.
इसके बाद मार्च 2026 तक के सरकारी आंकड़ों में योजना के तहत कुल निवेश 20,587 करोड़ रुपये, उत्पादन 11.61 लाख करोड़ रुपये और निर्यात 6.43 लाख करोड़ रुपये बताया गया. ये आंकड़े योजना की पूरी अवधि के दौरान दर्ज कुल उपलब्धियों को दिखाते हैं, न कि केवल एक साल के नतीजों को. निर्यात बढ़ने का मतलब है कि भारत में बने फोन दूसरे देशों में भी बिक रहे हैं. इससे देश को विदेशी बाजारों में अपनी जगह बनाने का मौका मिलता है और कंपनियों को बड़े पैमाने पर उत्पादन करने का प्रोत्साहन मिलता है.
भारत को PLI स्कीम से कितना फायदा?
मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग पर सरकारी प्रोत्साहन को लेकर हाल में बहस तेज हुई. ब्लूमबर्ग की एक वीडियो रिपोर्ट में सवाल उठाया गया कि जब आईफोन के कई महंगे और अहम पुर्जे विदेशों से आते हैं, तो भारत को तैयार फोन बनाने से वास्तविक आर्थिक फायदा कितना मिल रहा है. इसके जवाब में केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने 27 अक्टूबर को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर मोबाइल PLI स्कीम के आंकड़े साझा किए.
उनके मुताबिक, सरकार ने मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग के लिए 19,000 करोड़ रुपये के प्रोत्साहन दिए. इसके मुकाबले 25,000 करोड़ रुपये का डायरेक्ट टैक्स और 3 लाख करोड़ रुपये का GST कलेक्शन हुआ. उन्होंने मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में 12 लाख और पूरे इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में 25 लाख लोगों के रोजगार का भी जिक्र किया.
सरकार के पक्ष में यह आंकड़ा इसलिए अहम है, क्योंकि इससे पता चलता है कि मोबाइल उद्योग से टैक्स रेवेन्यू और रोजगार जैसे फायदे भी जुड़े हैं. हालांकि, टैक्स कलेक्शन और प्रोत्साहन की तुलना को पूरी योजना का शुद्ध आर्थिक मुनाफा नहीं माना जा सकता. इसके लिए यह भी देखना होगा कि सरकारी खर्च कितना था, उससे कितनी अतिरिक्त आर्थिक गतिविधि पैदा हुई और आयातित पुर्जों पर कितना पैसा विदेश गया.
फिर भारत को किस बात की चुनौती है?
भारत में फोन बनाने की क्षमता बढ़ी है, लेकिन फोन के सभी अहम पुर्जे देश में नहीं बनते. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में मेमोरी चिप, प्रोसेसर, डिस्प्ले, कैमरा लेंस और बैटरी जैसे पुर्जों के आयात पर निर्भरता का मुद्दा उठाया गया. इसे आसान उदाहरण से समझिए. अगर कोई फोन भारत में जोड़ा जाता है, लेकिन उसके सबसे महंगे पुर्जे विदेशों से आते हैं, तो फोन की पूरी कीमत भारत में पैदा नहीं होती.
भारत को फैक्ट्री में काम करने वालों की मजदूरी, स्थानीय सेवाओं, कुछ पुर्जों की सप्लाई और दूसरे कामों से आर्थिक फायदा मिलता है, लेकिन बड़ी वैल्यू का कुछ हिस्सा उन देशों को जाता है जहां अहम पुर्जे बनाए जाते हैं. यही वजह है कि केवल कितने फोन बने, यह देखना काफी नहीं है. यह भी देखना जरूरी है कि फोन के कितने पुर्जे भारत में बने, स्थानीय कंपनियों को कितना काम मिला और देश में डिजाइन, इंजीनियरिंग तथा तकनीक की क्षमता कितनी बढ़ी.
सेमीकंडक्टर, चिप बनाने में लंबा रास्ता
इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में अगला बड़ा कदम सेमीकंडक्टर चिप बनाने की क्षमता बढ़ाना है. चिप मोबाइल फोन, कंप्यूटर, कार और कई दूसरे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का अहम हिस्सा होती है. लेकिन इसे बनाने के लिए महंगी मशीनें, विशेष सामग्री, तकनीकी जानकारी और मजबूत सप्लाई चेन चाहिए. ब्लूमबर्ग के कॉलमिस्ट एंडी मुखर्जी ने अपनी रिपोर्ट में तर्क दिया कि भारत को केवल महंगी चिप फैक्ट्रियों पर ध्यान देने के बजाय इंजीनियरिंग, डिजाइन और रोजगार पैदा करने वाले दूसरे उद्योगों में भी निवेश करना चाहिए.
वहीं, भारत में अपनी सेमीकंडक्टर क्षमता विकसित करने के समर्थकों का कहना है कि जरूरी तकनीक और सप्लाई चेन के लिए पूरी तरह विदेशों पर निर्भर रहना लंबे समय में जोखिम पैदा कर सकता है. इसलिए चुनौती सिर्फ चिप बनाने की फैक्ट्री लगाने की नहीं है. भारत को स्किल्ड वर्कफोर्स, रिसर्च, डिजाइन, इक्विपमेंट, लोकल सप्लायर और टेक्निकल एक्सपर्टीज भी विकसित करनी होगी.
मेक इन इंडिया से मेड इन इंडिया तक का सफर
'मेक इन इंडिया' का मकसद कंपनियों को भारत में उत्पादन के लिए आकर्षित करना और देश को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना है. वहीं, 'मेड इन इंडिया' को मजबूत करने का मतलब है कि भारत में बनने वाले उत्पादों के साथ-साथ उनके पुर्जों, डिजाइन, तकनीक और स्थानीय सप्लाई चेन में भी देश की हिस्सेदारी बढ़े. PLI स्कीम ने इस सफर में कंपनियों को उत्पादन बढ़ाने का आर्थिक प्रोत्साहन दिया. मोबाइल फोन के उत्पादन और निर्यात में हुई बढ़ोतरी, विदेशी कंपनियों का भारत में विस्तार और रोजगार के अवसर इस बदलाव के अहम संकेत हैं.