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India vs China Manufacturing: चीन कहां और भारत कहां... मैन्युफैक्चरिंग की दौड़ में हब बनेंगे कब? इनसाइड स्टोरी

India’s Manufacturing Dream: मैन्युफैक्चरिंग के बल पर ही भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का सपना देख रहा है. इसी कड़ी में भारत ने 'मेक इन इंडिया', 'आत्मनिर्भर भारत' और 'PLI स्कीम' जैसे नारों के साथ अपनी औद्योगिक रफ्तार तो बढ़ाई है.

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मैन्युफैक्चरिंग के बल पर भारत बनेगा विकसित राष्ट्र. (Photo: AI)
मैन्युफैक्चरिंग के बल पर भारत बनेगा विकसित राष्ट्र. (Photo: AI)

एक जिद है, भारत को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना है. दुनिया की नजरें भी भारत पर टिकी हैं, वैसे किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए उसका मैन्युफैक्चरिंग हब बनना बेहद जरूरी है. लेकिन एक सवाल साधारण-सा है, क्या भारत अगला 'ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब' बन पाएगा? 

दरअसल, जब देश में गाड़ियां, मोबाइल और कपड़े जैसी चीजें बनने लगती हैं, तो विदेशों से सामान खरीदने का भारी खर्च बचता है. इससे देश के भीतर लाखों युवाओं को नौकरियां मिलती हैं, लोगों की आमदनी बढ़ती है और बाजार में लिक्विडिटी की दिक्कत नहीं होती है. वहीं जब हम अपनी जरूरतों को पूरा करके एक्सपोर्ट करने लग जाते हैं, तो विदेशी मुद्रा भी देश में आती है. यही वजह है कि भारत का मैन्युफैक्चरिंग हब बनना हमारी आर्थिक मजबूती और आत्मनिर्भरता की सबसे बड़ी कुंजी है. 

मैन्युफैक्चरिंग की दम पर ही भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का सपना देख रहा है. इसी कड़ी में भारत ने 'मेक इन इंडिया', 'आत्मनिर्भर भारत' और 'PLI स्कीम' जैसे नारों के साथ अपनी औद्योगिक रफ्तार तो बढ़ाई है, लेकिन असली सवाल यही है कि यह सपना कब और कैसे पूरा होगा? इस दौड़ में भारत दुनिया में कहां खड़ा है? चीन से कितने पीछे हैं? हमारे सामने क्या चुनौतियां हैं?

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दुनिया की दौड़ में भारत कहां और चीन से कितना पीछे?
अगर आंकड़ों को देखें तो मैन्युफैक्चरिंग की दौड़ में भारत ने शुरुआती बढ़त बना ली है, लेकिन मंजिल अभी बहुत दूर है. पूरी दुनिया के कुल मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट में भारत की हिस्सेदारी अभी भी करीब 2% के आसपास ही है. वैसे तो भारत दुनिया का 5वां सबसे बड़ा मैन्युफैक्चरिंग वाला देश बन चुका है, लेकिन इसका दायरा अभी छोटा है.

दूसरी ओर चीन को यूं ही 'वर्ल्ड की फैक्ट्री' नहीं कहा जाता है. वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग में चीन का हिस्सा करीब 30% का है. चीन का सालाना औद्योगिक उत्पादन 4.5 ट्रिलियन डॉलर से अधिक है, जबकि भारत का करीब 500 अरब डॉलर का है. यानी चीन भारत उत्पादन के मामले में लगभग करीब 9 गुना बड़ा है.

सच्चाई यह है कि हम रातो-रात चीन को पछाड़ नहीं सकते हैं, लेकिन बदलाव की शुरुआत हो चुकी है. वैश्विक कंपनियां अब 'चीन + 1' की नीति अपना रही हैं, यानी वे चीन के अलावा किसी दूसरे देश में अपनी फैक्ट्रियां लगाना चाहती हैं. जहां भारत के पास एक सुनहरा मौका है. खासकर अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते व्यापारिक तनाव का फायदा भारत को उठाना है. तमाम अमेरिकी कंपनियां जो कि चीन में हैं, वो भारत को भी एक अच्छे विकल्प के तौर पर देख रही हैं.  

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अमेरिका की भी मंशा एक तरफ चीन के एकाधिकार को तोड़ना है, लेकिन दूसरी तरफ वह भारत को भी एक 'आर्थिक महाशक्ति' नहीं बनने देना चाहता है. हाल ही में अमेरिकी संसद में पारित 'ग्राहम सैंक्शनिंग एक्ट' कानून रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाने का अधिकार देते हैं, जो कि भारत के लिए भी एक चुनौती है. क्योंकि मैन्युफैक्चरिंग का सीधा संबंध ऊर्जा से है, भारत अपनी जरूरत का 85% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है. जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो भारत में माल ढुलाई, बिजली की दरें और कच्चे माल की कीमतें सीधे बढ़ जाती हैं. इससे भारत में बने सामान की लागत बढ़ जाती है और वह चीन, वियतनाम या बांग्लादेश के सामान से महंगा होने लगता है. 

महंगा तेल खरीदने में भारत का बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार खर्च हो जाता है. जब सरकार और कंपनियों का पैसा तेल बिल चुकाने में चला जाता है, तो इन्फ्रास्ट्रक्चर, नई टेक्नोलॉजी और रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) में निवेश करने के लिए पूंजी कम पड़ जाती है. 

भारत ने कैसे बदली अपनी चाल?
बीते एक दशक में भारत ने अपनी औद्योगिक नीतियों में बड़े बदलाव किए हैं. मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत के तहत देश में उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रक्रियाओं को लगातार आसान बनाया गया है और 'ईज ऑफ डूइंग' बिजनेस पर खासा जोर दिया गया है. 

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PLI स्कीम्स के तहत इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, ऑटोमोबाइल, फार्मा और सोलर पैनल जैसे 14 से अधिक सेक्टरों के लिए अरबों डॉलर के प्रोत्साहन दिए गए हैं. इसी का नतीजा है कि भारत अब मोबाइल फोन का दूसरा सबसे बड़ा निर्माता बन चुका है और आईफोन का बड़ा हिस्सा भारत में ही असेंबल हो रहा है.

मैन्युफैक्चरिंग में भारत तभी आगे बढ़ेगा, जब इन्फ्रास्ट्रक्चर मजबूत होगा. इसी कड़ी में पिछले एक दशक में एक्सप्रेस-वे, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, पीएम गतिशक्ति और नए पोर्ट्स बनने से देश के भीतर सामान ले जाने की लागत और समय दोनों कम हुए हैं. इस बीच भारत ने चिप मैन्युफैक्चरिंग में भारी निवेश भी आकर्षित किया है, जो भविष्य की तकनीक की रीढ़ है.

मैन्युफैक्चरिंग की राह की ये 4 बड़ी चुनौतियां
तमाम कोशिशों के बावजूद भारत की GDP में मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी पिछले कई वर्षों से 16% से 17% के आसपास अटकी हुई है. इसके पीछे मुख्य तौर पर 4 बड़ी रुकावटें हैं.

1. महंगी लॉजिस्टिक्स लागत: भारत में प्रोडक्ट्स को फैक्ट्री से पोर्ट्स तक पहुंचाने का खर्च जीडीपी का लगभग 13-14% बैठता है, जबकि चीन या वियतनाम में यह 8-9% है. इस खाई को कम करना सबसे जरूरी है.

2. जटिल कानून और नौकरशाही: पिछले कुछ वर्षों में नियमों को आसान बनाने पर जोर दिया गया है. लेकिन अभी भी राज्य स्तर पर अब भूमि अधिग्रहण, श्रम कानून और पर्यावरण मंजूरी में महीनों लग जाते हैं. जिस पर तेजी से काम हो रहा है. 

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3. स्किल गैप: भारत के पास युवाओं की भारी आबादी है, परंतु आधुनिक फैक्ट्रियों और ऑटोमेशन के लिए जिस कुशल कार्यबल की जरूरत है, उसकी कमी है.

4. MSMEs की कमजोरी: छोटे और मध्यम उद्योग (MSMEs) किसी भी देश की मैन्युफैक्चरिंग की रीढ़ होते हैं. चीन को औद्योगिक हब बनाने में छोटे उद्योगों का बड़ा हाथ है. मौजूदा दौर में भी भारत के MSME सेक्टर को आसानी से सस्ता लोन मिलने में और हाईटेक टेक्नोलॉजी अपनाने में कठिनाई आती हैं. 

कब तक पूरा होगा सपना?
भारत सरकार ने लक्ष्य रखा है कि मैन्युफैक्चरिंग का योगदान देश की जीडीपी में बढ़ाकर 25% किया जाए. एक्सपर्ट्स और ग्लोबल थिंक-टैंक की रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत अगले 5 वर्षों में इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, डिफेंस और फार्मा सेक्टर में दुनिया का प्रमुख सप्लाई हब बन सकता है. इसके अलावा अगर भारत 10% की सालाना औद्योगिक वृद्धि दर को बनाए रखता है, तो 2035 से 2040 के बीच भारत जीडीपी में 25% मैन्युफैक्चरिंग हिस्सेदारी का लक्ष्य हासिल कर सकता है. लेकिन ये लक्ष्य आसान नहीं है, हर लेवल पर 100 फीसदी परफॉर्मेंस की जरूरत होगी.

क्या यह सपना सच होगा?
हां, यह सपना सच हो सकता है, लेकिन इसके लिए नीति और रणनीति दोनों में बदलाव की जरूरत है. भारत को सिर्फ अपने घरेलू बाजार के लिए सामान बनाने के बजाय 'एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड' बनना होगा. हमें कपड़े और जूते जैसे उन उद्योगों पर भी विशेष ध्यान देना होगा, जो ज्यादा से ज्यादा नौकरियां पैदा करते हैं, इसके अलावा टेक्नोलॉजी रिलेटेड बिजनेस, खासकर सेमीकंडक्टर सेक्टर में भारत को मजबूती से पैर जमाने होंगे. 

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ऐसे में अगर केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर श्रम और जमीन सुधारों को पूरी सही से लागू करती हैं और स्थानीय MSMEs को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाती हैं, तो भारत निश्चित रूप से दुनिया का अगला बड़ा मैन्युफैक्चरिंग हब बन जाएगा. इसमें वक्त लगेगा, लेकिन भारत की दिशा सही है.
 

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