बिहार के कटिहार जिले के मोरसंडा गांव से एक बेहद विचलित और रूह को कंपा देने वाला मंजर सामने आया है. आजादी के सात दशकों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यहां के ग्रामीणों को अपनों की अर्थी के अंतिम संस्कार के लिए जान जोखिम में डालकर उफनती नदी पार करनी पड़ रही है. इस घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जो बिहार में बड़े-बड़े दावों की जमीनी हकीकत की पोल खोल रहा है.
मोरसंडा पंचायत से गुजरने वाली बरंडी नदी सिर्फ एक जलधारा नहीं, बल्कि तीन पंचायतों के कई गांवों को आपस में जोड़ने वाली मुख्य जीवनरेखा है. प्रखंड मुख्यालय फलका आने-जाने के लिए यह नदी मात्र 4 किलोमीटर का सबसे छोटा रास्ता है. लेकिन, नदी पर पुल न होने के कारण यदि कोई ग्रामीण पानी में उतरे बिना मुख्यालय जाना चाहे, तो उसे 12 किलोमीटर का लंबा चक्कर लगाना पड़ता है.
बाढ़ प्रभावित इस इलाके की विडंबना यह है कि हर साल बाढ़ आने पर ग्रामीण प्रशासनिक मदद के इंतजार में हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठते. वे अपने निजी कोष से चंदा इकट्ठा करते हैं और आपस में मिलकर बांस का अस्थाई 'चचरी पुल' बनाते हैं. हालांकि, वह भी पानी के तेज बहाव में टिक नहीं पाता.
कंधे पर अर्थी और छाती तक पानी
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो की जब गहनता से तहकीकात की गई, तो दिल को झकझोर देने वाली सच्चाई सामने आई. बीते दिनों मोरसंडा पंचायत के 50 वर्षीय अरविंद महलदार की मृत्यु हो गई थी. परिजन और ग्रामीण उनके शव को अंतिम संस्कार के लिए बरंडी नदी स्थित 'कमला घाट श्मशान' ले जा रहे थे.
नदी पर पुल का नामोनिशान न होने के कारण, दर्जनों ग्रामीणों को शव की अर्थी को अपने कंधों पर उठाकर नदी के गहरे पानी के बीच से गुजरना पड़ा. देखें VIDEO:-
वीडियो में साफ दिख रहा है कि नदी में अच्छा-खासा पानी होने के बावजूद लोग अत्यंत सावधानी से पैर आगे बढ़ा रहे हैं. इस दौरान गहरे पानी के बहाव के कारण कोई भी बड़ा हादसा होने की आशंका लगातार बनी हुई थी.
'मेरी उम्र 40 साल हुई पर पुल नहीं देखा'
क्षेत्र के भौगोलिक और राजनीतिक नक्शे की उलझन भी इस विकास में बड़ी बाधा है. यह इलाका लोकसभा क्षेत्र के लिहाज से पूर्णिया में आता है, जहां के सांसद पप्पू यादव हैं और विधानसभा के नक्शे पर यह कटिहार जिले की कोढ़ा सीट के अंतर्गत आता है, जहां की विधायक कविता देवी हैं.
स्थानीय जनप्रतिनिधि मनोज बताते हैं, "देश के आजाद होने के बाद से अब तक हमारे दादा और पिता जी इसी आस में गुजर गए.मेरी खुद की उम्र 40 साल हो गई है, लेकिन अब हम लोग अपने जीवनकाल में यहां पुल देख पाएंगे या नहीं, भगवान जाने."
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स्थानीय निवासी सुमन का कहना है, "जहां चालू नदी है, वहां पुल के बगल में पुल बन जाता है. लेकिन हम लोग पिछले 20 साल से इस नदी के पानी में पैदल चल रहे हैं, यहां पुल का कोई नामोनिशान नहीं है. बाढ़ के समय हम खुद बांस का पुल बनाते हैं, पर वह भी टूट गया है. अभी एक नाव भी डूब गई, स्थिति इतनी खराब है कि लोग तैरकर आ रहे हैं. सांसद पप्पू यादव ने चुनाव जीतने पर 1 महीने के भीतर काम चालू कराने का वादा किया था, जो अधूरा है. विधायक महोदया ने विधानसभा में आवाज उठाई तो प्रोसेस चलने की बात कही गई, लेकिन जमीन पर कुछ नहीं बदला." देखें VIDEO:-
विधायक कविता देवी का पक्ष
इस पूरे मामले में स्थानीय भाजपा विधायक कविता देवी ने अपनी सफाई और संकल्प को दोहराते हुए कहा, "यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है जो ऐसी स्थिति आ गई है. मैंने खुद बिहार विधानसभा में दो-दो बार इस पुल का सवाल पूरी प्रमुखता से उठाया है. जनता के आशीर्वाद से मैं दोबारा जीतकर आई हूं और इस बार मेरा प्रण है कि वह पुल मैं बनवाकर ही रहूंगी. इस सवाल पर सदन के भीतर माननीय मंत्री जी से मेरा टकराव और कहा-सुनी भी हुई थी, क्योंकि विभाग के अधिकारियों द्वारा इस पुल को लेकर ग्राउंड से गलत रिपोर्ट बनाकर दी जा रही थी, जिसके कारण काम स्वीकृत नहीं हो पा रहा था. लेकिन अब मुझे आश्वासन मिला है, वह पुल जरूर बनेगा."