
रात का सफर था. मंजिल महोबा थी. बस में बैठे यात्रियों को क्या पता था कि उनमें से कुछ के लिए ये जिंदगी का आखिरी सफर होगा. यमुना एक्सप्रेस-वे पर दौड़ती बस अचानक आग के गोले में बदल गई. देखते ही देखते लपटों ने पूरी बस को अपनी चपेट में ले लिया. अंदर चीख-पुकार मच गई. किसी को बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिला. कोई खिड़की तोड़ने लगा. कोई मदद के लिए चिल्लाता रहा. लेकिन आग इतनी तेजी से फैली कि कई यात्रियों को संभलने तक का मौका नहीं मिला. इस हादसे में 9 लोगों की जान चली गई.
ग्रेटर नोएडा के यमुना एक्सप्रेस-वे पर बुधवार रात जो हुआ, वह सिर्फ एक बस हादसा नहीं था. यह उस व्यवस्था पर बड़ा सवाल है, जिसमें यात्री सुरक्षा के नाम पर नियम तो खूब बनाए जाते हैं, लेकिन सड़क पर उतरने के बाद उनकी निगरानी और पालन का जिम्मा हवा हो जाता है. स्लीपर बसें आरामदायक सफर का दावा करती हैं. लेकिन जब यही बसें आग पकड़ती हैं, तो कई बार चलती हुई मौत का डिब्बा बन जाती हैं. सवाल केवल बस चालक और ऑपरेटर का नहीं, सवाल उस सिस्टम का भी है, जो ऐसी बसों को सड़क पर उतरने की इजाजत देता है.
आखिर यात्री सुरक्षा से खिलवाड़ की जिम्मेदारी किसकी है. उन बस ऑपरेटिंग कंपनियों की, जो मुनाफे के लिए सुरक्षा से समझौता करती हैं और बॉडी मेकर्स से अपनी सुविधा के हिसाब से बस तैयार करवाती हैं. या फिर उस सिस्टम की, जो नियम होने के बावजूद उनकी निगरानी नहीं कर पाता. केंद्र सरकार ने स्लीपर बसों की सुरक्षा के लिए सख्त नियम बनाए हैं. लोकल और मैनुअल बॉडी बिल्डर्स पर भी शिकंजा कसने की कोशिश हुई है. फिर भी सड़क पर सवाल वही है. नियम कागज पर हैं या वास्तविकता सड़क पर धू-धू कर जल रही है.
कैसे और कब हुआ हादसा
जेवर थाना क्षेत्र में दिल्ली से महोबा जा रही राज कल्पना ट्रैवल्स की स्लीपर बस (BR 32 PA 8647) में करीब 11.30 बजे आग लग गई. शुरुआती पुलिस जांच के मुताबिक बस के एसी में स्पार्क या ब्लास्ट के बाद इंजन के लुब्रिकेंट ऑयल ने आग पकड़ ली और देखते ही देखते लपटें पूरी बस में फैल गईं. बस में करीब 30-35 यात्री सवार थे. हादसे में 9 यात्रियों की मौत हो गई, जबकि कई लोगों को रेस्क्यू कर सुरक्षित बाहर निकाला गया. पुलिस ने चालक और परिचालक को हिरासत में लेकर कार्रवाई शुरू कर दी है.
सवाल सिर्फ आग नहीं... एक्जिट भी है
आग किसी भी वाहन में लग सकती है. शॉर्ट सर्किट हो सकता है, इंजन में तकनीकी खराबी आ सकती है या किसी दूसरे कारण से आग भड़क सकती है. लेकिन असली सवाल यह है कि आग लगने के बाद यात्री कितनी जल्दी बस या किसी भी वाहन से बाहर निकल सकता है. यही वह सवाल है, जिसका जवाब स्लीपर बसों के लगातार सामने आ रहे हादसों में सबसे ज्यादा डरावना दिखाई देता है.
स्लीपर बस में यात्री सीट पर नहीं, एक छोटे से बंद स्पेस में लेटा होता है. रात के सफर में ज्यादातर लोग सो रहे होते हैं. आग लगने पर कुछ सेकेंड का धुआं ही स्थिति को जानलेवा बना सकता है. अगर इमरजेंसी गेट छोटा हो, रास्ता सामान या सीट से घिरा हो, खिड़की आसानी से न खुले, फायर डिटेक्शन सिस्टम न हो या यात्रियों को तुरंत अलार्म न मिले, तो बस का हर सेकेंड मौत के खतरे को बढ़ाता है. और यही वजह है कि स्लीपर बसों की डिजाइन और बॉडी सिर्फ खूबसूरत या ज्यादा बर्थ फिट करने का मामला नहीं हो सकती. यह सीधे तौर पर जिंदगी और मौत का सवाल है.

पसंद की बॉडी... सुरक्षा ताक पर
देश में लंबे समय तक बस बॉडी बनाने का एक बड़ा हिस्सा ऐसे लोकल और मैनुअल बॉडी बिल्डर्स के हाथों में रहा, जहां ऑपरेटर अपनी जरूरत और पसंद के हिसाब से बस तैयार कराते रहे. कितनी बर्थ चाहिए, अंदर कितना स्पेस चाहिए, केबिन कैसा होगा, सामान कहां रखा जाएगा और यात्रियों को किस तरह बैठाया या लिटाया जाएगा, इन सब चीजों में बस ऑपरेटर की डिमांड की सबसे अहम होती है और ऑपरेटर का एकमात्र लक्ष्य ज्यादा सीटिंग कैपेसिटी और मुनाफे पर टिका होता है.
समस्या तब शुरू होती है, जब ज्यादा यात्री, ज्यादा बर्थ और ज्यादा कमाई की कोशिश में सुरक्षा से जुड़े जरूरी हिस्सों के लिए जगह कम पड़ने लगती है. इमरजेंसी एग्जिट कहां होगा, उसका आकार कितना होगा, यात्री वहां तक आसानी से पहुंच पाएंगे या नहीं, आग का पता लगाने और बुझाने की व्यवस्था कैसी होगी, अंदर इस्तेमाल होने वाला मैटेरियल कितना सुरक्षित होगा और दुर्घटना की स्थिति में मेन डोर खुल पाएगा या नहीं, ये सवाल बस की सजावट से कहीं ज्यादा जरूरी होती हैं.
सरकार ने बनाए है नियम
ऐसा नहीं है कि, सरकार ने इन सभी बातों के लिए नियम नहीं बनाए हैं. बल्कि हाल के दिनों में हुए बस हादसों से जागी सरकार ने खुद फरवरी 2026 में राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को AIS:052 और AIS:119 के पालन को लेकर एडवाइजरी जारी की थी. सरकार ने कुछ स्लीपर बसों में आग लगने की घटनाओं की जांच में पाया कि एक बस की लंबाई नियम सीमा से ज्यादा थी, इमरजेंसी दरवाजे निर्धारित आकार के अनुरूप नहीं थे, सीटों ने इमरजेंसी दरवाजे तक पहुंचने का रास्ता क्लीयर नहीं था, दो की जगह सिर्फ एक रूफ हैच था और जरूरी फायर डिटेक्शन एंड सप्रेशन सिस्टम भी नहीं लगा था.
जनवरी में सरकार ने इसलिए बदले थे नियम
स्लीपर कोच बसों में लगातार हो रहे आग के हादसों के बाद जनवरी 2026 में केंद्र सरकार ने नियमों को सख्त किया था. उस समय बताया गया था कि पिछले छह महीनों में स्लीपर कोच से जुड़े छह आग हादसों में 145 लोगों की मौत हुई थी. इसके बाद सरकार ने फैसला किया कि स्लीपर कोच बसों का निर्माण केवल केंद्र से मान्यता प्राप्त ऑटोमोबाइल कंपनियों या मान्यता प्राप्त सुविधाओं में ही किया जाएगा. स्थानीय और गैर-मान्यता प्राप्त बॉडी बिल्डर्स के जरिए नई स्लीपर बस तैयार करने की व्यवस्था पर रोक लगा दिया गया.
नए नियमों के अनुसार सभी स्लीपर बसों को AIS-052 बस बॉडी कोड और मॉडिफाइड बस बॉडी कोड का पालन करना अनिवार्य होगा. यह मॉडिफाइड कोड 1 सितंबर 2025 से लागू हो चुका है. इसके बिना किसी भी स्लीपर बस को ऑपरेट नहीं किया जा सकेगा. यानी ऐसी बसें जो इस कोड का पालन नहीं करती हैं वो सड़कों पर नहीं दिखेंगी. सरकार ने यह भी निर्देश दिया है कि देश में चल रही सभी मौजूदा स्लीपर बसों को अनिवार्य रूप से नए सेफ्टी डिवाइसेज से लैस किया जाए. इनमें फायर डिटेक्शन सिस्टम, इमरजेंसी लाइटिंग, ड्राइवर को नींद का अलर्ट देने वाला सिस्टम यानी ADAS, इमरजेंसी एग्जिट और सेफ्टी हैमर शामिल हैं.
क्या है AIS-052 बस बॉडी कोड
ऑटोमोटिव इंडस्ट्री स्टैंडर्ड (AIS-052) भारत का आधिकारिक बस बॉडी सेफ़्टी और डिजाइन कोड है. इसमें बस के मैन्युफैक्चरिंग, स्ट्रक्चर और सेफ्टी से जुड़े जरूरी स्टैंडर्ड तय किए गए हैं. चाहे बस फैक्ट्री में बनी हो या कोच बिल्ट हो, रजिस्ट्रेशन और सड़क पर चलने से पहले इन नियमों का पालन जरूरी होता है. यह स्टैंडर्ड केंद्रीय मोटर वाहन नियमों के तहत सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय द्वारा जारी किया गया है.
3,855 मौतें... आंकड़ा छोटा नहीं है.
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने सितंबर 2026 में कहा कि 2024 में बसों से जुड़े हादसों में 3,855 लोगों की मौत हुई, और उन्होंने बस बॉडी से जुड़े नियमों के सख्त पालन पर जोर दिया. संशोधित बस बॉडी कोड 1 सितंबर 2025 से लागू हुआ है. जिसके बाद बस बॉडी कोड में सुधार किया गया. पहले मैनुअल बस बॉडी बिल्डर सेल्फ सर्टिफिकेशन के जरिए बस का रजिस्ट्रेशन करा सकते थे. लेकिन अब नए नियम के तहत अब बस को रजिस्ट्रेशन तभी मिलेगा जब उसे किसी टेस्टिंग एजेंसी से टाइप अप्रूवल सर्टिफिकेशन मिलेगा. इसे अनिवार्य कर दिया गया है.
नए सेफ्टी सिस्टम में हर बस के लिए अलग चेकलिस्ट तैयार होगी. इस चेकलिस्ट को एक पोर्टल पर अपलोड किया जाएगा. बस के फिजिकल और वीडियो इंस्पेक्शन के बिना उसका रजिस्ट्रेशन नहीं होगा. गडकरी ने कहा कि वीडियो रिकॉर्डिंग के जरिए यह जांचा जाएगा कि बस तय मानकों पर खरी उतर रही है या नहीं.
फिर सड़क पर वही सवाल क्यों खड़ा है?
कागज पर नियम मौजूद हैं. बस बॉडी कोड मौजूद है. फिटनेस जांच की व्यवस्था है. रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया है. इमरजेंसी एग्जिट, फायर सेफ्टी और बॉडी स्ट्रक्चर से जुड़े मानक हैं. फिर भी अगर यात्रियों को लेकर दौड़ रही बस आग लगने के बाद कुछ ही मिनटों में मौत का जाल बन जाती है, तो सवाल केवल बस ऑपरेटर पर नहीं रुकता.
सवाल यह भी है कि फिटनेस सर्टिफिकेट किस आधार पर जारी हुआ. बस की बॉडी किसने बनाई. उसमें क्या बदलाव किए गए. क्या मूल डिजाइन से छेड़छाड़ हुई. क्या इमरजेंसी एग्जिट वास्तव में इस्तेमाल करने लायक था. क्या फायर सेफ्टी सिस्टम काम कर रहा था. क्या बस में तय संख्या से ज्यादा यात्री थे. क्या ड्राइवर और स्टाफ को आपात स्थिति से निपटने की ट्रेनिंग थी. और सबसे बड़ा सवाल, इन सबकी जांच सड़क पर बस दौड़ने से पहले हुई थी या सिर्फ कागजों पर.
केंद्र की फरवरी की एडवाइजरी में भी कहा गया था कि कुछ सुरक्षा खामियां वाहन के सर्टिफिकेशन के समय ही पकड़ी जानी चाहिए.
यात्री जब स्लीपर बस का टिकट खरीदता है, तो वह सिर्फ दिल्ली से महोबा, लखनऊ से दिल्ली या किसी दूसरे शहर तक पहुंचने के लिए सीट नहीं खरीदता. वह अपनी जिंदगी कुछ घंटों के लिए उस ऑपरेटर, उस बस, उस ड्राइवर और उस पूरी व्यवस्था के भरोसे छोड़ता है. इसलिए बस में AC कितना अच्छा है, सीट कितनी आरामदायक है, स्क्रीन कितनी बड़ी है या बर्थ कितनी लगाई गई हैं, इससे पहले सवाल होना चाहिए कि मुसीबत आने पर बाहर निकलने का रास्ता कितना सुरक्षित है.