एक अफ्रीका में समा जाए चीन, भारत, अमेरिका... फिर नक्शे में इतना छोटा क्यों! समझें 450 साल पुरानी 'बेइमानी'

दुनिया को जिस नक्शे पर हम अबतक देखते आए हैं क्या वास्तव में दुनिया की वैसी ही तस्वीर है जैसी धरती पर मौजूद है? जवाब चौंकाने वाला मगर सत्य है. दुनिया असल में एकदम ऐसी नहीं दिखती है. अफ्रीका का साइज इतना बड़ा है उसमें अमेरिका चीन और भारत एक साथ समा जाए फिर भी कुछ जगह बच जाए. लेकिन अफ्रीका अचानक बड़ा नहीं हुआ है. बस दुनिया ने उसे सही अनुपात में देखना शुरू किया है.

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UN में दुनिया के नए नक्शे को लेकर प्रस्ताव पारित हुआ है. (Photo: Social media) UN में दुनिया के नए नक्शे को लेकर प्रस्ताव पारित हुआ है. (Photo: Social media)

पन्ना लाल

  • नई दिल्ली,
  • 07 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 5:15 PM IST

विश्वास करना एकदम मुश्किल है. लेकिन बात सच है. स्कूल कॉलेज में दुनिया के जिस नक्शे को देखकर आपने देशों और महाद्वीपों का आकार समझा. वो सच था ही नहीं. ये नक्शा दुनिया के देशों का असली साइज नहीं बताता था. नक्शे की इस कहानी को अगर आप समझेंगे तो आपको यूरोप और अमरिका की चालबाजियां भी समझ में आएंगी. कैसे उन्होंने अपने देशों के साइज को असल से ज्यादा बढ़ा चढ़ाकर पेश किया है. 

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एक छोटा सा उदाहरण समझिए. वर्ल्ड मैप में आप अफ्रीका महादेश का नक्शा देखते होंगे और ग्रीनलैंड का भी मैप आपने देखा होगा. दुनिया के मानचित्र में ये दोनों भूभाग लगभग बराबर दिखाई देते हैं. 

लेकिन इस मानचित्र ने अबतक आपको भ्रम में रखा है और दुनिया की गलत तस्वीर दी है.

हकीकत ये है कि अफ्रीका ग्रीनलैंड से पूरे 14 गुना बड़ा है. जी हां... सही सुना आपने. पूरे 14 गुना बड़ा. ग्रीनलैंड का क्षेत्रफल 21 लाख 66 लाख 86 हजार किलोमीटर है. लेकिन अब सुनिए. अफ्रीका का क्षेत्रफल 3 करोड़, 3 लाख, 65 हजार किलोमीटर है. लेकिन वर्ल्ड मैप पर दोनों का आकार बराबर है. नीचे कि इस तस्वीर को देखिए और खुद समझिए.

असल में अफ्रीका का आकार तो इतना बड़ा है कि उसमें अमेरिका, चीन, भारत, जापान, मेक्सिको और यूरोप का बड़ा हिस्सा समा जाए और फिर भी जगह बचे. अफ्रीका का क्षेत्रफल लगभग 30.37 मिलियन वर्ग किलोमीटर है. जबकि अमेरिका (9.83 मिलियन), चीन (9.6 मिलियन), भारत (3.29 मिलियन) और पश्चिमी यूरोप के बड़े हिस्से (4.9 मिलियन) को मिलाकर भी कुल क्षेत्रफल 28 मिलियन से कम ही रहता है और ये सभी अफ्रीका के अंदर समा सकते हैं, फिर भी काफी जगह बच जाएगी.

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Photo: X/@IhabFathiSulima

अब सोचिए, एक बच्चा अगर स्कूल में वर्षों तक ऐसा नक्शा देखता रहे जिसमें दोनों लगभग बराबर दिखते हों, तो उसके दिमाग में दुनिया का आकार किस तरह बैठेगा? एक अफ्रीकी युवा तो यही सोचेगा कि उसका महादेश यूरोप के मुकाबले बहुत छोटा है.

यही सवाल इस पूरे विवाद का सामाजिक और राजनीतिक हिस्सा है. 

सवाल यह है कि हम पिछले 450 वर्षों से दुनिया का गलत नक्शा हम क्यों देख रहे थे. लेकिन उम्मीद है कि अब हमें दुनिया का सही नक्शा देखने को मिलेगा.

1569 में आया था मर्केटर मैप

जिस नक्शे को लेकर आज इतना विवाद है, उसकी जड़ करीब 450 साल पुरानी है.

1569 में जर्मन फ्लेमिश कार्टोग्राफर जेरार्डस मर्केटर ने एक ऐसा प्रोजेक्शन बनाया, जो खास तौर पर समुद्री यात्रियों के लिए बेहद उपयोगी था. 

इसका मूल उद्देश्य दुनिया को राजनीतिक रूप से बड़ा-छोटा दिखाना नहीं, बल्कि समुद्री यात्रा को आसान बनाना था.

मर्केटर के इस नक्शे में दिशाएं और कोण सही तरीके से दिखते थे. बाद में यूरोपीय समुद्री शक्तियों ने इसे नॉटिकल चार्टस के रूप में अपनाया. फिर इसकी लोकप्रियता बढ़ते-बढ़ते एटलस, स्कूलों की किताबों और दीवारों के वर्ल्ड मैप तक पहुंच गई. 20वीं सदी के अंत में इसका डिजिटल रूप  इंटरनेट मैपिंग का प्रमुख मानक बन गया.

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लेकिन जो नक्शा दिशा के लिए अच्छा था, वह दुनिया के देशों के आकार को दिखाने में गड़बड़ कर रहा था. 

इसकी वजह है धरती का गोल होना

धरती गोल है, लेकिन नक्शा तो फ्लैट होता है और हमें उसे कागज या मोबाइल की चपटी स्क्रीन पर दिखाना होता है. यहीं से समस्या शुरू होती है. 

मर्केटर के नक्शे में गोल पृथ्वी को 2D आकार में चपटा कर दिखाया गया है, लेकिन ऐसा करते हुए ऐसा करते हुए इस नक्शे ने महाद्वीपों के आकार को पूरी तरह से गलत प्रस्तुत कर दिया.  

मर्केटर मैप में जैसे-जैसे आप भूमध्य रेखा से उत्तर या दक्षिण की तरफ जाते हैं, जमीन का आकार नक्शे पर ज्यादा से ज्यादा बड़ा दिखाई देने लगता है. 

भूमध्य रेखा यानी कि Equator पृथ्वी की एक काल्पनिक रेखा है जो उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव के ठीक बीच में स्थित है. यह पृथ्वी को दो बराबर भागों में बांटती है. उत्तरी गोलार्ध और दक्षिणी गोलार्ध. 

मर्केटर के मानचित्र में भूमध्य रेखा के पास की जमीन अपने आकार के अनुसार लगभग सही दिखती है. लेकिन यहां से जैसे जैसे आप दूर होते हैं जमीन का साइज बड़ा दिखने लगता है.

यही कारण है कि स्कूलों में हमने जो सामान्य दुनिया का नक्शा देखा, उसमें भूमध्य रेखा से बहुत दूर स्थित ग्रीनलैंड बहुत विशाल दिखाई देता है. जब  भूमध्य रेखा के नजदीक स्थित अफ्रीका बहुत ही छोटा. 

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मैप के बहाने नैरेटिव का खेल 

आलोचक कहते हैं कि सदियों से यह मैप हमारी सोच को प्रभावित करता रहा है. क्षेत्रफल में छोटे होने की वजह से अफ्रीका और ग्लोबल साउथ के देश छोटे और कम महत्वपूर्ण लगते हैं, जबकि उत्तरी देशों का आकार बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है. इससे शिक्षा, मीडिया और जिओ-पॉलिटिक्स में पक्षपात की भावना पैदा होती है. 

जबकि नक्शे के समर्थक कहते हैं कि मैप सिर्फ कागज नहीं, बल्कि दुनिया को देखने का तरीका है. 

इस भेदभाव के खिलाफ अफ्रीका में लंबे समय से मुहिम चल रही थी. 

अफ्रीकी देशों का तर्क है कि सदियों से दुनिया को ऐसे नक्शे पर दिखाया गया जिसमें यूरोप और उत्तरी अमेरिका बहुत बड़े और अफ्रीका अपेक्षाकृत छोटा दिखता रहा. इसका मनोवैज्ञानिक असर भी पड़ सकता है. बच्चा बचपन से नक्शा देखता है और उसके दिमाग में दुनिया का एक visual hierarchy बनती है. 

उसे लगता है कि यूरोप बड़ा है, अफ्रीका छोटा है. जबकि वास्तविकता में अफ्रीका दुनिया के सबसे बड़े महाद्वीपों में है. वे इसे औपनिवेशिक मानसिकता से जोड़ते हैं. 

निष्पक्ष दुनिया निष्पक्ष मैप

अफ्रीकी देश टोगो के विदेश मंत्री ने कहा था कि एक निष्पक्ष दुनिया निष्पक्ष मैप से शुरू होती है. 

इसी असमानता के खिलाफ अफ्रीकी संघ और टोगो ने 'Correct the Map' यानी 'मैप को सही करो' अभियान चलाया. 2018 में नक्शाकार  Bojan Šavrič, Tom Patterson और Bernhard Jenny  ने ऐसा मानचित्र बनाया  जो क्षेत्रफल को ज्यादा सही अनुपात में दिखाता है. इसमें अफ्रीका अपनी असली विशालता के साथ नजर आता है, जबकि ग्रीनलैंड, यूरोप और कुछ हदतक अमेरिका अपेक्षाकृत सिकुड़ जाते हैं. 

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इस नक्शे को Equal Earth projection कहा जाता है. 

नक्शे पर दुनिया का नजरिया बदलने की इसी कोशिश के तहत 4 सितंबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में मतदान हुआ. इसे समर्थन में 164 देशों ने वोट दिया. अमेरिका अकेला देश था, जिसने इसका विरोध किया, जबकि 6 देशों एस्टोनिया, जॉर्जिया, लिथुआनिया, मोल्दोवा, सर्बिया और यूक्रेन ने मतदान से परहेज किया. 

संयुक्त राष्ट्र महासभा में इस प्रस्ताव को टोगो ने पेश किया था. 

टोगो ने 2026 के अंत तक अपने स्कूलों में इस्तेमाल होने वाले सभी नक्शे को बदल देने की घोषणा की है. ये उसे डीकॉलोनाइजेशन बताता है. 

फ्रांस के विदेश मंत्री ज्यां-नोएल बारो का बयान इस संबंध में महत्वपूर्ण है. उन्होंने कहा कि नक्शे बदलने से दुनिया नहीं बदल जाती. लेकिन गलत छवि को सुधारना अपने आप में सच्चाई की तरफ एक कदम है.

संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी प्रतिनिधि यरेना फेरेन्सेविच ने इसका विरोध करते हुए कहा, "असली समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय. यह संस्था 16वीं सदी के मैप प्रोजेक्ट्स पर बहस कर रही है."

बाध्यकारी नहीं है UN का प्रस्ताव

संयुक्त राष्ट्र के इस प्रस्ताव के बाद यह कहा जा रहा है कि UN ने मर्केटर मैप खत्म कर दिया लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है.

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UN महासभा का प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है. यानी ऐसा नहीं है कि दुनिया भर में अब मर्केटर मैप पर प्रतिबंध लग गया है या अगले दिन से हर स्कूल, कंपनी और वेबसाइट को अपना नक्शा बदलना ही होगा. 

इस प्रस्ताव का मकसद सरकारों, स्कूलों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और तकनीकी कंपनियों को Equal Earth जैसी equal-area projections को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना है, खासकर तब जब नक्शे पर महाद्वीपों के क्षेत्रफल की तुलना महत्वपूर्ण हो.

इसलिए सही बात यह है कि पुराना नक्शा बैन नहीं किया गया बल्कि दुनिया को दिखाने के लिए क्षेत्रफल को ज्यादा सही तरीके से दिखाने वाले नक्शे के इस्तेमाल को बढ़ाने का फैसला लिया गया है.   

नेवीगेशन जैसे क्षेत्रों में मर्केटर का इस्तेमाल जारी रह सकता है. 

भारत के नक्शे पर क्या असर पड़ेगा

भारत ने संयुक्त राष्ट्र में इस प्रस्ताव के समर्थन में मतदान किया है. भारत का बड़ा हिस्सा भूमध्य रेखा से बहुत दूर नहीं है. इसलिए भारत क्षेत्रफल, जमीन और अंतरराष्ट्रीय सीमाओं में कोई बदलाव नहीं होगा. 

हां नए नक्शे में भारत का मानचित्र थोड़ा अलग दिख सकता है.

भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि उसके इस समर्थन का मतलब किसी खास तरह के मानचित्र प्रोजेक्शन या राष्ट्रीय सीमाओं के चित्रण को मंज़ूरी देना नहीं है. इसके अलावा भारत ने कहा है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को भारत के राजनीतिक मानचित्र के अनुसार ही दिखाया जाए. इसमें किसी भी तरह का बदलाव भारत को मंजूर नहीं है.

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भारत ने कहा, "हमने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि इस प्रस्ताव का मतलब किसी खास नक्शे, प्रोजेक्शन या राष्ट्रीय सीमाओं के चित्रण को मंज़ूरी देना नहीं है. भारत के आधिकारिक नक्शे के अनुसार ही भारत के संप्रभु क्षेत्र को दिखाया जाना चाहिए, जिसमें जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के केंद्र-शासित प्रदेश भी शामिल हैं. कोई भी गलत या गुमराह करने वाला चित्रण स्वीकार्य नहीं है. भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर हमारा रुख़ स्पष्ट, सुसंगत और ऐसा है जिस पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता."

क्या Equal Earth पूरी तरह सही है?

क्या कोई भी मैप पूरी तरह से सही हो सकता है. इसका जवाब नहीं में है. और यही बात इस पूरी कहानी को और दिलचस्प बनाती है.

गोल धरती को सपाट कागज पर सही तरीके से नहीं उतारा जा सकता है. 

Equal Earth क्षेत्रफल को ज्यादा सही रखता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इसमें हर देश की आकृति, दूरी और दिशा भी बिल्कुल सही होगी. कोई भी मानचित्र चारों गुणों (आकार, क्षेत्र, दूरी, दिशा) को एक साथ पूरी तरह सही नहीं रख सकता.

किसी मानचित्र में एरिया सही रहेगा तो शेप बिगड़ सकता है, शेप सही होगा तो दो जगहों की दूरी में गड़बड़ी आ जाएगी. किसी में डायरेक्शन सही रहेगा तो एरिया बिगड़ सकता है.

इसका सबसे सटीक प्रतिनिधित्व ग्लोब ही है, लेकिन वह व्यावहारिक उपयोग जैसे पुस्तक, फोन, नेविगेशन के लिए असुविधाजनक है.  इसलिए मैप में हमेशा समझौता होते हैं.

इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि- कौन सा नक्शा सही है, बल्कि सवाल यह है कि किस काम के लिए कौन सा नक्शा सही है? मर्केटर का नक्शा समुद्री यात्राओं के लिए सही है तो Equal earth क्षेत्रफल को दर्शाने के लिए ठीक है. 

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