सऊदी अरब के खिलाफ हूतियों के मार्च के बीच मक्का पैक्ट को पहला कमांडर मिल गया है. पाकिस्तान ने अपने रिटायर्ड जनरल नौमान महमूद को मक्का डिफेंस अलायंस का पहला सेक्रेटरी जनरल बनाया है. नौमान महमूद को भले ही पाकिस्तान ने मक्का पैक्ट का सेक्रेटरी जनरल करार दिया है लेकिन इस समझौते का उद्देश्य सैन्य होने की वजह से सेक्रेटरी जनरल का काम 'कमांडर' जैसा ही है. जिसके नेतृत्व में तीनों देशों की सेनाएं जरूरत पड़ने पर सामूहिक हमला कर सकती है.
बता दें कि अगस्त में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की ने समझौता किया है कि इन तीनों में किसी एक देश पर किया गया हमला तीनों देश पर हमला माना जाएगा और तीनों मिलकर इसका जवाब देंगे.
अब पाकिस्तान ने लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) नौमान महमूद को मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट का पहला सेक्रेटरी जनरल नियुक्त किया गया है.
लेकिन इस नियुक्ति की कहानी सिर्फ 2026 के नए रक्षा समझौते तक सीमित नहीं है. नौमान महमूद का परिवार भारत-पाकिस्तान युद्ध की एक पुरानी और बेहद दिलचस्प कहानी से जुड़ा है. उनके पिता लेफ्टिनेंट कर्नल राजा सुल्तान महमूद 1971 की जंग में भारतीय सेना से लड़ते हुए मारे गए थे.
राजा सुल्तान महमूद पाकिस्तान की 32 बलूच रेजिमेंट के कमांडिंग ऑफिसर थे. दिसंबर 1971 में पूर्वी पाकिस्तान के पीरगंज इलाके में भारतीय सेना और पाकिस्तानी सैनिकों के बीच भीषण लड़ाई हुई थी. पाकिस्तान के Army Institute of Military History के मुताबिक, इसी लड़ाई में सुल्तान महमूद ने अपनी टुकड़ी का नेतृत्व करते हुए भारतीय मोर्चे की तरफ बढ़ने का फैसला किया.
लेकिन भारत की सेना दिलेरी से मोर्चे पर डटी हुई थी. पाकिस्तानी सैन्य रिकॉर्ड में दर्ज विवरण के मुताबिक सुल्तान महमूद भारतीय गोरखा राइफल्स की पोजिशन तक पहुंच गए थे. इसी दौरान हुई मुठभेड़ में वह मारे गए. उनके शव की पहचान बाद में उनके रैंक बैज और अन्य सामान से की गई.
इस कहानी का एक अहम हिस्सा भारतीय सेना से भी जुड़ा है. गोरखा राइफल्स से जुड़े भारतीय सैन्य अधिकारी इत्तबार सिंह ने वर्षों बाद नौमान महमूद को एक पत्र लिखा था. 2012 में लिखे गए इस पत्र में उन्होंने नौमान के पिता की आखिरी लड़ाई का जिक्र किया और बताया कि सुल्तान महमूद भारतीय सैनिकों के मोर्चे के बेहद करीब पहुंचकर मारे गए थे.
नौमान महमूद को पाकिस्तान की ओर से मक्का डिफेंस अलायंस का सेक्रेटरी जनरल बनाए जाने के बाद भारत-पाकिस्तान के कई पत्रकारों ने सोशल मीडिया पर इस घटना का जिक्र किया है.
Cuirassier नाम के एक यूजर ने लिखा है कि, "बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान गोरखा राइफल्स की टुकड़ी पर बेयोनेट से हमला करने वाले एक पाकिस्तानी अफ़सर को उतने ही बहादुर अफ़सर कैप्टन जतिंदर नाथ सूद ने 'खुकरी' से घायल कर दिया. पाकिस्तानी अफ़सर का शरीर और चेहरा खून से पूरी तरह लथपथ था और उसे पाकिस्तान की 205वीं इन्फैंट्री ब्रिगेड के कमांडर ब्रिगेडियर तजम्मुल हुसैन मलिक समझ लिया गया था. उसके अंतिम संस्कार के समय उसके पास मिले दस्तावेज़ों और खून से सने एपॉलेट्स से उसकी सही पहचान PA-4863 लेफ्टिनेंट कर्नल राजा सुल्तान महमूद के तौर पर हुई."
यानी जिस वक्त नौमान महमूद छोटे बच्चे थे, उसी वक्त उनके पिता भारत-पाकिस्तान की जंग में मारे जा चुके थे. बाद में नौमान ने खुद पाकिस्तान सेना में करियर बनाया और सेना में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं.
नौमान महमूद ने 1987 में पाकिस्तान सेना में कमीशन लिया. वह इन्फैंट्री से जुड़े रहे और उत्तर वजीरिस्तान में एक डिवीजन की कमान भी संभाली. वह पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI की Analysis Directorate के महानिदेशक भी रहे. इसके अलावा GHQ में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाने के बाद उन्होंने पेशावर स्थित XI Corps की कमान संभाली. बाद में वह नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष भी रहे.
अब रिटायरमेंट के बाद उनकी नई भूमिका सऊदी अरब में है. उन्हें मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट के सचिवालय का पहला सेक्रेटरी जनरल बनाया गया है. इस समझौते का सचिवालय रियाद में है और इसकी शुरुआती अवधि में पाकिस्तान की ओर से नियुक्त अधिकारी इस जिम्मेदारी को संभालेगा.
इस समझौते की अहमियत इसलिए भी है क्योंकि इस एग्रीमेंट से पाकिस्तान की कमिटमेंट की परीक्षा होने वाली है. पाकिस्तान ने मक्का पैक्ट पर समझौता किया है. इधर हूतियों ने सऊदी पर हमला भी कर दिया है, लेकिन पाकिस्तान ने मक्का पैक्ट एक्टिवेट नहीं किया.
ऐसे में आगे सेक्रेटरी जनरल का पद केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि तीनों देशों के बीच रक्षा समन्वय के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है.
पन्ना लाल