मिडिल ईस्ट में टूरिज्म का 'ब्लैकआउट', हर दिन हजारों करोड़ का नुकसान, खाली पड़े दुबई-दोहा के होटल

लंबे समय तक तनाव रहने पर क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था, विमानन कंपनियों और अंतरराष्ट्रीय आवाजाही पर गहरा असर पड़ रहा है. यात्रा महंगी होने, मार्ग बदलने और सुरक्षा चिंताओं के कारण यात्रियों की संख्या घट रही है, जिससे कई देशों की आय और व्यापार गतिविधियां प्रभावित होने लगी हैं.

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जंग से मिडिल ईस्ट में सन्नाटा पसर गया है और पर्यटन-एयरलाइन इंडस्ट्री संकट में है. (प्रतीकात्मक तस्वीर) जंग से मिडिल ईस्ट में सन्नाटा पसर गया है और पर्यटन-एयरलाइन इंडस्ट्री संकट में है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

पीयूष अग्रवाल

  • नई दिल्ली,
  • 24 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 3:48 AM IST

अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध ने सिर्फ तेल बाजारों को ही नहीं, बल्कि वैश्विक यात्रा और पर्यटन क्षेत्र को भी प्रभावित किया है, खासकर मिडिल ईस्ट में. दुबई, दोहा और अबू धाबी जैसे शहर, जो कभी वैश्विक पर्यटन की धड़कन थे, आज सन्नाटे और उड़ानों के डायवर्जन का सामना कर रहे हैं

वर्ल्ड ट्रैवल एंड टूरिज्म काउंसिल (WTTC) के अनुसार, यात्रा की मांग में गिरावट के कारण इस क्षेत्र को हर दिन कम से कम 60 करोड़ डॉलर (600 मिलियन डॉलर) का नुकसान हो रहा है.

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मिडिल ईस्ट दुनिया के लगभग 5 प्रतिशत अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों को आकर्षित करता है और 14 प्रतिशत वैश्विक ट्रांजिट यातायात इस क्षेत्र से गुजरता है. दुबई, दोहा और अबू धाबी जैसे बड़े ट्रांजिट हब, जहां पहले हर दिन पांच लाख से ज्यादा यात्री आते-जाते थे, वहां एयरस्पेस बंद होने से पर्यटकों और ट्रांजिट यात्रियों दोनों पर असर पड़ा है.

संघर्ष शुरू होने के पहले दो दिनों के भीतर, खाड़ी देशों के हवाई क्षेत्र में बाधा आने से 5,000 से ज्यादा उड़ानें रद्द करनी पड़ीं.युद्ध शुरू होने से पहले अनुमान था कि 2026 में अंतरराष्ट्रीय पर्यटक इस क्षेत्र में लगभग 207 अरब डॉलर खर्च करेंगे. इस साल मिडिल ईस्ट में अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों की संख्या में लगभग 13 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान था, लेकिन अब यह अनुमान उलट गया है.

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Oxford Economics के अनुसार, अगर संघर्ष लंबा चलता है तो पर्यटकों की संख्या में 27 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है. इससे पहले के अनुमान की तुलना में 3.8 करोड़ (38 मिलियन) कम पर्यटक आ सकते हैं और राजस्व में 56 अरब डॉलर तक का नुकसान हो सकता है. 

खाड़ी देशों का हवाई क्षेत्र (Airspace) बंद होने के कारण उड़ानों को लंबे रूट से जाना पड़ रहा है. इससे न केवल यात्रा का समय बढ़ा है, बल्कि ईंधन की खपत भी बढ़ गई है. युद्ध के कारण पहले से ही ऊर्जा संकट गहरा गया है, ऐसे में एयरलाइंस बढ़ती लागत का बोझ यात्रियों पर किराया बढ़ाकर डाल सकती हैं.

इसके अलावा लोगों की धारणा और डर का भी असर पड़ रहा है. यात्रा की मांग तेजी से घटी है और उन जगहों के लिए भी बुकिंग रद्द हो रही हैं जो सीधे युद्ध से प्रभावित नहीं हैं. उद्योग से जुड़े अनुमान बताते हैं कि सुरक्षा चिंताओं और एडवाइजरी के कारण कई बाजारों में यात्राएं लगभग रुक गई हैं. अब इसका असर मिडिल ईस्ट से बाहर भी दिखने लगा है. इसका असर भारत पर भी पड़ रहा है.

यूरोप और उत्तरी अमेरिका जाने वाले भारतीय यात्रियों के लिए मिडिल ईस्ट एक बड़ा ट्रांजिट रूट है. अब उड़ानों के रूट बदलने से यात्रा का समय बढ़ रहा है और हवाई किराया महंगा हो रहा है.

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Air India ने भी ईंधन महंगा होने के कारण फ्यूल सरचार्ज लगा दिया है, जिससे हवाई यात्रा और महंगी हो गई है. यूरोप की एयरलाइंस ने भी चेतावनी दी है कि जेट फ्यूल की कीमतें बढ़ने और मिडिल ईस्ट से उड़ानों का रूट बदलने के कारण हवाई किराए बढ़ेंगे, क्योंकि एयरलाइंस अब बढ़ती लागत को खुद वहन नहीं कर पा रही हैं.

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