अरब मुल्कों में पीने के पानी पर संकट! ईरान ने बढ़ाया जंग का दायरा तो बूंद-बूंद को तरसेंगे लोग

कुवैत ने ईरान पर उसके डिसैलिनेशन प्लांट को निशाना बनाने का आरोप लगाया है. अगर खाड़ी देशों के इन समुद्री पानी को मीठा बनाने वाले प्लांट्स पर हमले बढ़ते हैं, तो करोड़ों लोगों के सामने पीने के पानी का संकट खड़ा हो सकता है. आखिर गल्फ देशों के लिए ये प्लांट इतने अहम क्यों हैं, समझिए.

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ईरान के डिसैलिनेशन प्लांट पर हमला हुआ है. (Photo- ITG) ईरान के डिसैलिनेशन प्लांट पर हमला हुआ है. (Photo- ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 19 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 2:44 PM IST

ईरान और खाड़ी देशों के बीच बढ़ते तनाव ने अब एक नई चिंता खड़ी कर दी है. कुवैत ने आरोप लगाया है कि ईरानी बलों ने दूसरी बार उसके डिसैलिनेशन (समुद्र के खारे पानी को मीठा बनाने वाले) प्लांट को निशाना बनाया है. अगर ऐसे हमले जारी रहे तो इसका असर सिर्फ कुवैत तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे खाड़ी क्षेत्र में पीने के पानी का बड़ा संकट पैदा हो सकता है.

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दरअसल, खाड़ी देशों में प्राकृतिक मीठे पानी के स्रोत बहुत कम हैं. यहां बारिश बेहद कम होती है और मौसम ज्यादातर गर्म और शुष्क रहता है. इसलिए इन देशों में पीने के पानी की बड़ी जरूरत समुद्र के खारे पानी को साफ करके पूरी की जाती है. चिंता की बात ये है कि एक अमेरिकी हमले के बाद ईरान में पानी की किल्लत हो गई है. ऐसे में ईरान भी खाड़ी मुल्कों में वॉटर सप्लाई को बाधित करने की कोशिश कर सकता है.

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गल्फ रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट के मुताबिक, ग्राउंड वॉटर और डिसैलिनेशन से मिलने वाला पानी मिलाकर इस क्षेत्र की करीब 90 फीसदी पानी की जरूरत पूरी होती है. लेकिन जलवायु परिवर्तन की वजह से भूजल की गुणवत्ता लगातार खराब हो रही है. इसी वजह से खाड़ी देशों की निर्भरता अब पहले से ज्यादा डिसैलिनेशन प्लांट्स पर बढ़ गई है.

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खाड़ी तट पर 400 से ज्यादा डिसैलिनेशन प्लांट

संयुक्त अरब अमीरात (UAE) से लेकर कुवैत तक खाड़ी के तट पर 400 से ज्यादा डिसैलिनेशन प्लांट मौजूद हैं. अरब सेंटर वॉशिंगटन डीसी की 2023 की रिपोर्ट के मुताबिक, गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) के छह देश दुनिया की कुल डिसैलिनेशन क्षमता का करीब 60 फीसदी हिस्सा रखते हैं. वहीं, दुनिया में तैयार होने वाले कुल मीठे पानी का लगभग 40 फीसदी उत्पादन भी यही देश करते हैं.

किस देश में कितना पानी डिसैलिनेशन से आता है?

अल जजीरा की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इन प्लांट्स पर निर्भरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कुवैत के 90 फीसदी, ओमान के 86 फीसदी, सऊदी अरब के 70 फीसदी और यूएई के 42 फीसदी पीने के पानी की सप्लाई इन्हीं प्लांट्स से होती है. सऊदी अरब दुनिया में सबसे ज्यादा डिसैलिनेटेड पानी तैयार करता है.

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डिसैलिनेशन प्लांट पर हमले के बाद ईरान में पानी की किल्लत

हालांकि, ईरान भी अपने तटीय इलाकों, जैसे किश द्वीप और क़ेश्म द्वीप में डिसैलिनेशन प्लांट का इस्तेमाल करता है. लेकिन उसके पास नदियां, बांध और मीठे पानी के दूसरे स्रोत भी हैं. इसलिए खाड़ी के बाकी देशों के मुकाबले ईरान इन प्लांट्स पर उतना निर्भर नहीं है.

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ईरानी अधिकारियों के मुताबिक, लेटेस्ट अमेरिकी एयरस्ट्राइक में होर्मोजगान प्रांत के जास्क जिले के बुंजी गांव स्थित एक डिसैलिनेशन (समुद्री पानी को पीने योग्य बनाने वाला) प्लांट तबाह हो गया. होर्मोजगान वाटर एंड वेस्टवॉटर कंपनी के प्रमुख हमजेह पूर ने दावा किया कि हमले में प्लांट के पंप और बिजली का इंफ्रास्ट्रक्चर नष्ट हो गया, जिससे करीब 20 गांवों और लगभग 10 हजार लोगों की पीने के पानी की सप्लाई पूरी तरह ठप हो गई

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर डिसैलिनेशन प्लांट्स पर हमले जारी रहे तो करोड़ों लोगों तक पीने के पानी की सप्लाई प्रभावित हो सकती है. इसका असर सिर्फ लोगों पर ही नहीं, बल्कि उद्योगों, बिजली उत्पादन और पूरे खाड़ी क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा. यानी अब इस क्षेत्र में सिर्फ तेल ही नहीं, बल्कि पानी भी एक रणनीतिक हथियार बनता दिखाई दे रहा है.

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