अमेरिका में 'ब्लू सुनामी' के बाद ट्रंप की पार्टी में होगा घमासान? जेडी वेंस और टेड क्रूज खोल रहे मोर्चा

2026 के मध्यावधि चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की करारी हार के बाद जेडी वेंस और टेड क्रूज़ के रुख ने ट्रंप से बढ़ती दूरी के संकेत दिए. कांग्रेस के दोनों सदनों पर डेमोक्रेटिक कब्जे ने ट्रंप के एजेंडे पर दबाव बढ़ाया और रिपब्लिकन नेतृत्व की अगली लड़ाई तेज कर दी.

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राष्ट्रपति ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी में फूट की आशंका है. (Photo- ITG) राष्ट्रपति ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी में फूट की आशंका है. (Photo- ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 05 नवंबर 2026,
  • अपडेटेड 4:41 PM IST

अमेरिका के 2026 मिडटर्म चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को ऐसा झटका लगा है, जिसने वॉशिंगटन की राजनीति के साथ पार्टी के भीतर भी हलचल बढ़ा दी है. डेमोक्रेट्स ने प्रतिनिधि सभा और सीनेट, दोनों पर कब्जा कर लिया है. टेक्सास, कंसास, साउथ कैरोलिना, आयोवा, नॉर्थ कैरोलिना और ओहायो जैसे रिपब्लिकन के मजबूत गढ़ों में मिली हार ने पार्टी के सामने नेतृत्व का संकट खड़ा कर दिया है. अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि ट्रंप सरकार संसद में कैसे काम करेगी, बल्कि यह भी है कि उनके बाद रिपब्लिकन पार्टी की कमान किसके हाथ में होगी.

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चुनाव के नतीजों के बाद पार्टी के भीतर अलग-अलग शक्ति केंद्र उभरने लगे हैं. उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और सीनेटर टेड क्रूज जैसे नेताओं के बयानों ने इस चर्चा को और तेज कर दिया है. जेडी वेंस को लंबे समय से ट्रंप का संभावित उत्तराधिकारी माना जाता रहा है, जबकि क्रूज ने चुनावी हार को पार्टी के लिए बड़ी चेतावनी बताया है. ऐसे में ट्रंप के रहते ही उनके बाद की राजनीति की जमीन तैयार होती दिख रही है.

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वेंस के सामने भी अपनी राजनीतिक साख बचाने की चुनौती

जेडी वेंस को ट्रंप के सबसे मजबूत राजनीतिक उत्तराधिकारियों में गिना जाता रहा है. उन्होंने मिडटर्म चुनाव में रिपब्लिकन उम्मीदवारों के लिए जमकर प्रचार किया था. वह रिपब्लिकन नेशनल कमेटी के फंड जुटाने वाले प्रमुख की जिम्मेदारी भी संभाल रहे थे. लेकिन पार्टी की इस बड़ी हार के बाद उनकी अपनी राजनीतिक स्थिति भी आसान नहीं रह गई है. ट्रंप सरकार की अलोकप्रियता से जुड़े रहने का असर वेंस की भविष्य की दावेदारी पर पड़ सकता है.

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वहीं, विदेश मंत्री मार्को रुबियो भी ट्रंप के बाद रिपब्लिकन पार्टी के संभावित नेताओं में शामिल हैं. फ्लोरिडा के रॉन डेसेंटिस और टेक्सास के सीनेटर टेड क्रूज के नाम भी पार्टी के अगले नेतृत्व को लेकर चर्चा में हैं. यानी पार्टी के भीतर सिर्फ एक उत्तराधिकारी की चर्चा नहीं है, बल्कि कई नेता अपनी जगह बनाने की कोशिश में हैं.

टेड क्रूज ने हार को बताया 'ब्लू सुनामी'

टेक्सास के सीनेटर टेड क्रूज ने रिपब्लिकन पार्टी की हार को 'ब्लू सुनामी' और 'वॉटरगेट स्तर की अस्वीकृति' बताया. उन्होंने कहा कि पार्टी इसलिए नहीं हारी क्योंकि उसके समर्थक वोट डालने नहीं निकले, बल्कि इसलिए क्योंकि पहले रिपब्लिकन को वोट देने वाले मतदाता अब डेमोक्रेट्स के साथ चले गए.

क्रूज ने महंगाई, भ्रष्टाचार, ईरान के साथ जंग और टैरिफ को मतदाताओं की नाराजगी की बड़ी वजह बताया. कंसास के एग्जिट पोल का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि लोगों के लिए रोजमर्रा का खर्च सबसे बड़ी चिंता थी. उन्होंने यह भी माना कि रिपब्लिकन पार्टी ने कामगारों, युवाओं, किसानों, ग्रामीण समुदायों और हिस्पैनिक मतदाताओं जैसे अपने पारंपरिक समर्थक समूहों को दूर कर दिया है.

क्रूज ने पार्टी को फिर से अपनी आर्थिक प्राथमिकताओं और कामगार वर्ग से जुड़े मुद्दों पर ध्यान देने की सलाह दी. हालांकि, उन्होंने यह चेतावनी भी दी कि डेमोक्रेट्स अपने बहुमत का इस्तेमाल ट्रंप और उनके प्रशासन के खिलाफ जांच, समन और महाभियोग की कार्रवाई के लिए कर सकते हैं. उन्होंने डेमोक्रेट्स की ऐसी कोशिशों का विरोध करने का भी ऐलान किया.

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ट्रंप के बाद की लड़ाई के लिए तैयार हो रहे नए शक्ति केंद्र

रिपब्लिकन पार्टी में उभरती हलचल सिर्फ नेताओं के बयानों तक सीमित नहीं है. पार्टी के भीतर कुछ रणनीतिकार ट्रंप की सबसे विवादित राजनीतिक शैली से दूरी बनाने और पारंपरिक आर्थिक रूढ़िवाद की ओर लौटने की वकालत कर रहे हैं. वहीं, कुछ नेताओं का मानना है कि ट्रंप का पार्टी पर प्रभाव इतनी आसानी से खत्म नहीं होगा.

इस बीच रॉकब्रिज नेटवर्क जैसे संगठन ट्रंप के बाद भी MAGA आंदोलन को जिंदा रखने की तैयारी कर रहे हैं. इसे कंजर्वेटिव रणनीतिकार क्रिस बस्किर्क ने स्थापित किया है. यह संगठन अमीर दानदाताओं, राजनीतिक रणनीतिकारों, डेटा विश्लेषकों और जमीनी कार्यकर्ताओं को एक नेटवर्क में जोड़ने की कोशिश कर रहा है. इसका मकसद सिर्फ चुनाव जीतना नहीं, बल्कि ऐसा राजनीतिक ढांचा तैयार करना है जो ट्रंप के बिना भी काम कर सके.

इससे जुड़े फंडिंग समूह टर्नआउट फॉर अमेरिका ने 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में जमीनी अभियानों पर कथित तौर पर 3.45 करोड़ डॉलर खर्च किए थे. इसमें घर-घर जाकर प्रचार और अहम राज्यों में मतदाताओं से संपर्क करना शामिल था.

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क्रिस बस्किर्क की 'अरिस्टोपॉपुलिज्म' की सोच में अमीर कारोबारियों की आर्थिक ताकत और कामगार वर्ग के चुनावी समर्थन को जोड़ने की बात है. यह मॉडल MAGA की आर्थिक राष्ट्रवाद वाली राजनीति को बनाए रखते हुए नेतृत्व को कारोबारियों, दानदाताओं और राजनीतिक रणनीतिकारों के नेटवर्क की ओर ले जा सकता है.

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ट्रंप अभी व्हाइट हाउस में, लेकिन पार्टी पर पकड़ को चुनौती

ट्रंप जनवरी 2029 तक राष्ट्रपति पद पर रहेंगे. संविधान के मुताबिक वह तीसरी बार राष्ट्रपति चुनाव नहीं लड़ सकते. उनके पास अभी भी राष्ट्रपति की शक्तियां और बड़ा समर्थक आधार है. इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि रिपब्लिकन पार्टी पर उनका प्रभाव खत्म हो गया है.

लेकिन जनवरी 2027 से कांग्रेस के दोनों सदनों में डेमोक्रेट्स का बहुमत होगा. इससे ट्रंप के विधायी एजेंडे और अहम नियुक्तियों पर निगरानी बढ़ेगी. डेमोक्रेट्स प्रशासन की नीतियों, ईरान जंग और ट्रंप परिवार के कारोबारी हितों की जांच भी कर सकते हैं.

इस चुनाव ने रिपब्लिकन पार्टी के सामने दो रास्ते रख दिए हैं. पहला, ट्रंप की लोकलुभावन और राष्ट्रवादी राजनीति पर भरोसा बनाए रखना. दूसरा, पार्टी को नए नेतृत्व और व्यापक मतदाता आधार के साथ आगे बढ़ाना. वेंस, क्रूज, रुबियो और डेसेंटिस जैसे नेताओं की मौजूदगी बताती है कि ट्रंप के बाद की कुर्सी को लेकर मुकाबला आसान नहीं होगा.

ट्रंप अभी पार्टी के सबसे बड़े नेता हैं, लेकिन चुनावी हार ने उनके विरोधियों और संभावित उत्तराधिकारियों को अपनी आवाज बुलंद करने का मौका दे दिया है. ऐसे में रिपब्लिकन पार्टी में आने वाले दिनों में नेतृत्व और विचारधारा को लेकर टकराव बढ़ सकता है. यही टकराव तय करेगा कि ट्रंप के बाद MAGA आंदोलन किसके हाथ में जाएगा.

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