अमेरिका और उत्तर कोरिया के रिश्ते एक बार फिर चर्चा में हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन के साथ अपने रिश्तों को अच्छा बताया है. उन्होंने संकेत दिया है कि इस साल दोनों नेताओं की फिर मुलाकात हो सकती है.
इसके साथ ही ट्रंप ने दक्षिण कोरिया के साथ होने वाले अमेरिकी सैन्य अभ्यास को सीमित करने का फैसला किया है. यह कदम इसलिए अहम है क्योंकि दक्षिण कोरिया अमेरिका का पुराना सहयोगी है. वहीं, उत्तर कोरिया लंबे समय से अमेरिका के लिए बड़ा सुरक्षा खतरा रहा है.
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ट्रंप-किम की दोस्ती फिर क्यों चर्चा में?
ट्रंप और किम की कहानी नई नहीं है. दोनों नेताओं की पहली बड़ी मुलाकात 2018 में सिंगापुर में हुई थी. इससे पहले 2017 में ट्रंप और किम के बीच काफी तीखी बयानबाजी हुई थी. ट्रंप ने उत्तर कोरिया को ‘फायर एंड फ्यूरी’ की चेतावनी तक दी थी.
लेकिन 2018 में दोनों नेताओं की मुलाकात के बाद माहौल बदल गया. इसके बाद 2019 में हनोई और फिर कोरियाई सीमा पर दोनों की मुलाकात हुई. हालांकि, उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम को लेकर कोई बड़ा समझौता नहीं हो सका. इसके बावजूद ट्रंप लगातार किम के साथ अपने रिश्तों को अच्छा बताते रहे हैं. अब एक बार फिर दोनों नेताओं के बीच बातचीत की संभावना ने नई चर्चा शुरू कर दी है.
दक्षिण कोरिया से अमेरिका क्यों नाराज?
दक्षिण कोरिया लंबे समय से अमेरिका का करीबी सैन्य सहयोगी है. दोनों देश उत्तर कोरिया के खतरे को देखते हुए नियमित सैन्य अभ्यास करते हैं. इन अभ्यासों का मकसद किसी हमले की स्थिति में दोनों देशों की सेना की तैयारी को मजबूत रखना है. लेकिन अब ट्रंप इन अभ्यासों को कम कर रहे हैं. इसकी एक वजह उन्होंने दक्षिण कोरिया की कुछ नीतियों को लेकर अपनी नाराजगी बताई है. ट्रंप की सोच साफ है कि अमेरिका के सहयोगियों को भी सुरक्षा के मामले में ज्यादा योगदान देना चाहिए.
सियोल के लिए खतरे की घंटी?
सैन्य अभ्यास कम होने से दक्षिण कोरिया में सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ सकती है. खासकर तब, जब उत्तर कोरिया लगातार अपनी मिसाइल और परमाणु ताकत बढ़ा रहा है. रूस के साथ भी किम की नजदीकी बढ़ी है. अगर अमेरिका दक्षिण कोरिया से सैन्य दूरी बढ़ाता है और उत्तर कोरिया से बातचीत आगे बढ़ाता है, तो सियोल को अपनी सुरक्षा रणनीति पर फिर से विचार करना पड़ सकता है.
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ट्रंप को क्या फायदा होगा?
ट्रंप के लिए किम से दोबारा बातचीत एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि हो सकती है. अगर वह उत्तर कोरिया को परमाणु हथियारों के मुद्दे पर बातचीत की मेज पर ला पाते हैं, तो इसे अपनी विदेश नीति की बड़ी सफलता के तौर पर पेश कर सकते हैं. लेकिन असली सवाल यही है कि क्या इस बार सिर्फ मुलाकात और तस्वीरें होंगी या परमाणु कार्यक्रम पर कोई ठोस समझौता भी होगा. यही तय करेगा कि ट्रंप की किम से बढ़ती नजदीकी अमेरिका के लिए कितनी फायदेमंद साबित होती है. (दीक्षा मिश्रा की रिपोर्ट)
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