'ब्रिक्स भारत के लिए ग्लोबल साउथ की आवाज बनने का मौका', बोले अमेरिकी एक्सपर्ट कुगेलमैन

ब्रिक्स के 18वें शिखर सम्मेलन में भारत को वैश्विक नेतृत्व को पुनः स्थापित करने का महत्वपूर्ण अवसर मिला है. इस सम्मेलन ने वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक अस्थिरता के बीच विकासशील देशों को एक नया विकल्प प्रदान किया है.

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ब्रिक्स समिट. (File photo: ITG) ब्रिक्स समिट. (File photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 12 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 6:32 AM IST

अमेरिकी और दक्षिण एशिया मामलों के विश्लेषक माइकल कुगेलमैन ने शनिवार को 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के जियो-पॉलिटिकल परिदृश्य का विश्लेषण करते हुए इसे भारत के लिए वैश्विक नेतृत्व को फिर से स्थापित करने का एक महत्वपूर्ण अवसर बताया है. अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ती अस्थिरता के बीच ये आयोजन विकासशील देशों को एक नया विकल्प देने का मंच बना है.

कुगेलमैन ने जोर दिया कि नई दिल्ली के लिए इस विस्तारित समूह में पश्चिमी एशिया तनाव और अमेरिका विरोधी रुख के बीच आम सहमति बनाकर ठोस संयुक्त बयान लाना सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौती साबित होगा.

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ग्लोबल साउथ  से जुड़ाव का सही वक्त

समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, कुगेलमैन ने कहा कि ब्रिक्स के लिए ये वक्त बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि वैश्विक आर्थिक और वित्तीय व्यवस्था के साथ-साथ पूरी वैश्विक व्यवस्था में अस्थिरता बढ़ी है.

उन्होंने कहा कि जब मौजूदा व्यवस्था के प्रति विशेष रूप से ग्लोबल साउथ में असंतोष बढ़ रहा है, तब ब्रिक्स नए योगदान दे सकता है. ये सम्मेलन भारत को अपने वैश्विक नेतृत्व को मजबूत करने और ग्लोबल साउथ के साथ अपने प्रयासों को दोगुना करने का सही मौका देता है, जो भारतीय विदेश नीति की पहली प्राथमिताएं हैं.

आम सहमति सबसे बड़ी चुनौती

कुगेलमैन ने चेतावनी दी कि भारत इस सम्मेलन की सफलता को एक ठोस संयुक्त बयान जारी करने की अपनी क्षमता का टेस्ट करेगा. साझा बयान हासिल करने के लिए ब्रिक्स के अंदर आम सहमति बहुत जरूरी है. उन्होंने कहा कि समूह की सदस्यता के विस्तार से भविष्य में चुनौतियां बढ़ गई हैं, क्योंकि ज्यादा देशों के बीच आम सहमति बनाना बेहद मुश्किल काम होता है.

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अमेरिकी संबंधों को साधने का टेस्ट

कुगेलमैन ने भारत के कूटनीतिक संतुलन के सामने दो खास चुनौतियों को उजागर किया है- पहली चुनौती ईरान और यूएई दोनों के ब्रिक्स में मौजूद होने के कारण ईरान युद्ध के मुद्दे पर साझा आधार तलाशने की है.

दूसरी बड़ी चुनौती अमेरिका फैक्टर है, क्योंकि रूस-ईरान और संभवतः चीन संयुक्त राज्य अमेरिका की कड़ी आलोचना वाली भाषा शामिल कराना चाहेंगे. पर भारत और अन्य सदस्य ऐसा नहीं चाहेंगे, क्योंकि भारत-अमेरिका के साथ व्यापार समझौते के लिए नाजुक बातचीत में जुटा हुआ है.

इससे पहले शुक्रवार को ब्रिक्स बिजनेस फोरम के लीडर्स सेशन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत ऐसे वक्त में आर्थिक पुल बना रहा है, जब दुनिया में व्यापार बाधाएं बढ़ रही हैं.

पीएम मोदी ने कहा कि भारत ने विभिन्न क्षेत्रों में आपूर्ति चेन को ज्यादा विविधतापूर्ण और विश्वसनीय बनाया है. इसके चलते भारत वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भी विकास और स्थिरता का भरोसा दे रहा है.

पीएम ने स्पष्ट किया कि वैश्विक व्यापार तभी आगे बढ़ सकता है जब समुद्री मार्ग सुरक्षित हों, आपूर्ति मार्ग खुले रहें और नाविक सुरक्षित हों. उन्होंने बताया कि भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता का विषय 'बिल्डिंग फॉर रेजिलिएंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन एंड सस्टेनेबिलिटी' है. पीएम ने जोर देते हुए कहा कि 2006 में शुरू हुआ ब्रिक्स अब काफी विस्तारित हो चुका है और इसके सदस्यों तथा साझेदारों का परिवार अब 21 देशों का हो गया है.

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