भगवान श्रीराम की नगरी अयोध्या में रामलीला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा का जीवंत प्रतीक है. यहां 151वें वर्ष में प्रवेश कर रही रामलीला अपनी ऐतिहासिक विरासत और विशिष्ट परंपराओं के चलते श्रद्धालुओं के लिए खास महत्व रखती है. इस रामलीला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें भगवान श्रीराम, हनुमान और अन्य पात्रों की भूमिका निभाने वाले कलाकार बाहर से नहीं, बल्कि स्थानीय क्षेत्र के ही रहने वाले हैं. बचपन से रामलीला से जुड़ने वाले बच्चे बड़े होकर इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हैं.
151 वर्षों से सहेजी जा रही रामलीला की विरासत
अयोध्या की इस रामलीला का मंचन वर्षों से स्थानीय लोगों की सहभागिता से होता आ रहा है. अभिनय करने वाले कलाकारों से लेकर गायन और वादन करने वाले लोगों तक, सभी इसी क्षेत्र से जुड़े हैं. यही वजह है कि रामलीला यहां की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन चुकी है.
स्थानीय कलाकार अवनीश मिश्रा बताते हैं कि बचपन से ही बच्चों में भगवान श्रीराम के प्रति आस्था और रामलीला के प्रति लगाव पैदा होता है. समय के साथ यही बच्चे मंचन से जुड़ते हैं और इस प्राचीन परंपरा को आगे बढ़ाते हैं. स्थानीय लोगों की भागीदारी ने रामलीला की निरंतरता बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई है.
हनुमान जी का मुकुट है आस्था का विशेष प्रतीक
इस रामलीला की सबसे खास परंपराओं में से एक हनुमान जी का प्राचीन मुकुट है. अवनीश मिश्रा के मुताबिक रामलीला की शुरुआत से जुड़ी परंपरा के अनुसार यह मुकुट यहां स्थापित है और इसकी प्रतिदिन पूजा की जाती है. रामलीला का समय आने पर यही मुकुट हनुमान जी की भूमिका निभाने वाले कलाकार को पहनाया जाता है.
मुकुट धारण करने की इस परंपरा को केवल वेशभूषा का हिस्सा नहीं, बल्कि श्रद्धा और मर्यादा से जुड़ा अनुष्ठान माना जाता है. यही वजह है कि हनुमान जी का किरदार निभाने वाले कलाकार को मुकुट धारण करने के साथ कुछ विशेष नियमों का पालन भी करना होता है.
मुकुट पहनने वाले कलाकार को रखना पड़ता है मर्यादा का ध्यान
अवनीश मिश्रा बताते हैं कि हनुमान जी की भूमिका निभाने वाले कलाकार को अपने आचरण और व्यवहार में मर्यादा बनाए रखनी होती है. मन में किसी प्रकार का गलत विचार न आए और आचरण शुद्ध रहे, इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है.
वे रामचरितमानस की चौपाई— 'बिनु सत्संग विवेक न होई, राम कृपा बिनु सुलभ न सोई'—का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि भगवान की कृपा और भक्ति के लिए सत्संग, सदाचार और मर्यादा का विशेष महत्व है. भगवान श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है. ऐसे में उनके परम भक्त हनुमान जी की भूमिका निभाने वाले कलाकार से भी मर्यादित आचरण की अपेक्षा की जाती है.
स्थानीय कलाकारों की आस्था से जीवंत है परंपरा
अवनीश मिश्रा का कहना है कि भगवान श्रीराम की नगरी में रामलीला के मंचन से जुड़ना उनके लिए सौभाग्य की बात है. उनका मानना है कि प्रभु श्रीराम की कृपा से ही उन्हें इस धार्मिक कार्य में योगदान देने का अवसर मिला है.
इस रामलीला की खासियत यह है कि इसकी परंपरा को जीवित रखने के लिए स्थानीय लोग स्वयं आगे आते हैं. छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, अनेक लोग किसी न किसी रूप में इस आयोजन से जुड़े रहते हैं. कोई अभिनय करता है, कोई भजन गाता है तो कोई वाद्य यंत्रों के माध्यम से रामलीला को जीवंत बनाता है.
आस्था, परंपरा और मर्यादा का संगम है अयोध्या की रामलीला
अयोध्या की यह 151 वर्ष पुरानी रामलीला बताती है कि धार्मिक परंपराएं केवल मंचन तक सीमित नहीं होतीं, बल्कि लोगों की आस्था, संस्कार और सामूहिक सहभागिता से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती हैं.
प्राचीन मुकुट की पूजा, हनुमान जी की भूमिका निभाने वाले कलाकार के लिए मर्यादा के नियम और स्थानीय कलाकारों की निरंतर भागीदारी इस रामलीला को विशिष्ट पहचान देते हैं. भगवान श्रीराम की नगरी में सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का यह प्रयास आज भी लोगों को अपनी परंपराओं से जोड़ रहा है.
मयंक शुक्ला