उत्तर प्रदेश के प्रयागराज का चर्चित इलाका कसारी-मसारी एक बार फिर सुर्खियों में है. क्योंकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस इलाके का नाम बदलकर 'श्रीकृष्णपुरी' कर दिया है. अब इस नाम को लेकर सपा कांग्रेस ने बीजेपी पर निशाना साध हैं तो वहीं स्थानीय लोगों ने नाम का स्वागत किया है और कहा है नामकरण हुआ है तो उम्मीद है विकास भी कसारी मसारी को मिलेगा.
दरअसल, प्रयागराज के कसारी मसारी इलाके में जब अतीक अहमद का वर्चस्व चलता था और अतीक अहमद चुनाव लड़ता था तो किसी की हिम्मत नहीं होती थी कि उसके इलाके में उसके खिलाफ कोई बोल दे या फिर किसी भी पार्टी का कोई झंडा लगा दे. लेकिन अब अतीक अहमद के घर से लेकर पूरे कसारी मसारी में बीजेपी के बैनर और पोस्टर नजर आते हैं. इसका नाम भी बदल दिया गया.
कैसे पड़ा कसारी-मसारी नाम?
प्रयागराज के कसारी मसारी इलाके के रहने वाले के बुजुर्गों और स्थानीय इतिहास के अनुसार कसारी और मसारी दो सगे भाई थे, जो बड़े सूफी संत (फकीर) थे. दोनों संत मूल रूप से उत्तर प्रदेश के फैजाबाद (वर्तमान अयोध्या) के रहने वाले थे, जो बाद में प्रयागराज आकर बस गए थे. आम लोगों की सेवा करने के कारण दोनों भाई जनता के बीच बेहद लोकप्रिय हो गए.
इनके निधन के बाद उन्हें इसी इलाके में दफनाया गया और उनकी याद में इस पूरे क्षेत्र का नाम 'कसारी-मसारी' पड़ गया. इसी ऐतिहासिक कसारी-मसारी कब्रिस्तान में ही अतीक अहमद, उसके भाई अशरफ और उनके पिता को भी सुपुर्द-ए-खाक किया गया है. प्रयागराज का कसारी मसारी प्रयागराज के सबसे पुराने मोहल्लों में गिना जाता है और इसे पारंपरिक रूप से मुस्लिम गद्दी बिरादरी का गढ़ माना जाता है.
कभी कसारी मसारी में कई इलाके आते थे लेकिन परिसीमन बदलने के बाद कई इलाके कसारी मसारी से कट गए. शुरुआत में ये पूरी तरह मुस्लिम बहुल क्षेत्र था, लेकिन बाद में गद्दी बिरादरी के लोगों ने अपनी पुश्तैनी जमीनों पर प्लॉटिंग की, जिसे कई हिंदू परिवारों ने खरीदा और मकान बनाए. वर्तमान में यहां हिंदू और मुस्लिम दोनों की मिलीजुली आबादी निवास करती है.
बाद में चकिया जाकर बस गया था अतीक
अतीक अहमद का पुश्तैनी जुड़ाव कसारी-मसारी से रहा है और बाद में उसका परिवार पास के चकिया मोहल्ले में जाकर बस गया था. हालांकि पहले चकिया भी कसारी मसारी गांव का हिस्सा था. 90 के दशक में कहा जाता था कि उत्तर प्रदेश की राजनीति का एक बड़ा केंद्र कसारी-मसारी, चकिया हुआ करता था. उस दौर में अतीक का इतना खौफ था कि जिस जमीन पर उसकी नजर पड़ती, वह उसकी हो जाती थी.
अतीक ने 1989 में इलाहाबाद पश्चिमी सीट से निर्दलीय चुनाव जीतकर सियासी सफर शुरू किया. उस चुनाव में उसके सामने चांद बाबा भी थे, जिनकी बाद में हत्या हो गई. इसके बाद अतीक 1991 और 1993 में निर्दलीय, 1996 में समाजवादी पार्टी और 2002 में अपना दल के टिकट पर इसी सीट से विधायक चुना गया. 2004 में वह फूलपुर लोकसभा सीट से सांसद बना.
उमेश पाल हत्याकांड के बाद कसारी मसारी क्षेत्र में महीनों तक पुलिस और आरएएफ (RAF) तैनात रही. प्रशासन ने इलाके में सख्त कार्रवाई करते हुए 17 से अधिक संपत्तियों पर बुलडोजर चलाया. अतीक, उसके भाई अशरफ और करीबी रिश्तेदारों के अवैध मकान व कब्जे ध्वस्त किए गए. गिरोह से जुड़े 20 से अधिक सदस्यों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया.
नाम बदलने पर स्थानीय लोगों ने क्या कहा?
स्थानीय निवासियों से जब नाम बदलने पर सवाल किया गया तो उन्होंने मिली जुली प्रतिक्रिया दी. आज भी कसारी मसारी का नाम लेते ही लोगों के मन में एक विशेष वर्ग की तस्वीर बस जाती है. लेकिन अब यहां की भी तस्वीर और बोलचाल बदल रही है. सर पर टोपी बड़ी सी दाढ़ी, लेकिन यह भी अब योगी के नाम बदलने की तारीफ कर रहे हैं और यह कह रहे हैं नाम बदल रहा है उम्मीद है. कसारी मसारी की विकास की तस्वीर भी बदलेगी.
वहीं सपा कांग्रेस का कहना है कि केवल नाम बदलने से जमीनी हकीकत नहीं बदलती. पहले भी कई योजनाओं और विकास के दावे किए गए, लेकिन असल में कुछ नहीं बना. बुनियादी विकास होना ज्यादा जरूरी है. कुछ लोगों ने इसे बेहतर बताया और कहा कि इससे कसारी मसारी नाम का खौफ खत्म होगा. अब हालात सुधरे हैं और इलाके में शांति व सुरक्षा का माहौल बना है, जिससे वे नाम बदलने और बदलाव से खुश हैं.
आनंद राज