सब्सिडी लेकर पढ़ाई की, सरकारी हॉस्पिटल में सर्विस देने से बच नहीं सकते डॉक्टर: HC

कम फीस में मेडिकल की पढ़ाई करने वाले डॉक्टरों के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सरकारी सेवा बॉन्ड को लेकर अहम फैसला दिया है. कोर्ट ने साफ किया कि सिर्फ पोस्टिंग में देरी होने से बॉन्ड की जिम्मेदारी खत्म नहीं होगी. हालांकि, डॉक्टर को काउंसलिंग में उचित मौका देने और काम किए गए 89 दिनों को सेवा अवधि में जोड़ने का निर्देश दिया गया है.

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इलाहाबाद हाईकोर्ट में छात्रा ने याचिका दायर की थी. (Photo- ITG) इलाहाबाद हाईकोर्ट में छात्रा ने याचिका दायर की थी. (Photo- ITG)

aajtak.in

  • प्रयागराज,
  • 22 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 2:41 PM IST

इलाहाबाद हाई कोर्ट में पोस्ट-ग्रेजुएट मेडिकल के दाखिले में सेवा बॉन्ड को लेकर सुनवाई हुई है. कोर्ट ने कहा है कि एडमिशन के समय किए गए अनिवार्य सरकारी सेवा बॉन्ड की शर्त पूरी करनी होगी. यदि किसी डॉक्टर को कोर्स पूरा करने के बाद तीन महीने के भीतर पोस्टिंग नहीं मिलती है, तो वे स्वत: अपनी बॉन्ड प्रतिबद्धताओं से मुक्त नहीं होते हैं. डॉक्टरों को सरकार द्वारा निर्धारित अनिवार्य अवधि तक सरकारी अस्पतालों या स्वास्थ्य केंद्रों में सेवा देनी ही होगी 

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अन्यथा उन्हें बॉन्ड की भारी राशि, जो कि विशेषता के आधार पर लाखों या करोड़ रुपये तक हो सकती है,  का भुगतान करना होगा. केवल प्रशासनिक देरी के कारण डॉक्टर को बॉन्ड की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता. लखनऊ में जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की बेंच ने यह फैसला डॉ. अपरूपा सेन गुप्ता की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया. डॉ. सेन गुप्ता ने (संजय गांधी सन्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान) SGPGI, लखनऊ से MD (डॉक्टर ऑफ मेडिसिन) में ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन की पढ़ाई पूरी की थी.

अनिवार्य सरकारी सेवा की शर्तो का क्या है उद्देशय?

याचिकाकर्ता ने कोर्ट में कहा था कि कोर्स पूरा होने के तीन महीने के अंदर सरकार ने उन्हें पोस्टिंग नहीं दी. इसलिए उनका दो साल का अनिवार्य सरकारी सेवा बॉन्ड खत्म माना जाना चाहिए. कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया. बेंच ने कहा कि दो साल की अनिवार्य सरकारी सेवा की शर्त का उद्देशय सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की उपलब्धता बनाए रखना और मरीजों को समय पर स्वास्थय सेवाएं उपलब्ध कराना है. 

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कोर्ट ने यह भी कहा कि डॉक्टर ने आगे (पोस्ट डॉक्टरल सर्टिफिकेट) PDCC, कोर्स करने के लिए सरकार से नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC), लिया था. इस NOC में स्पष्ट था कि कोर्स के दौरान बिताया गया समय सरकारी सेवा बॉन्ड की अवधि में शामिल नहीं किया जाएगा. बेंच ने कहा कि उत्तर प्रदेश में ऐसा कोई नियम नहीं है, जिसके तहत तीन महीने के भीतर पोस्टिंग नहीं मिलने पर डॉक्टर को अपने आप बॉन्ड की जिम्मेदारी से छुट्टी मिल जाए.

कोर्ट ने राज्य सरकार को कब तक यह प्रक्रिया पूरी करने का दिया निर्देश?

हालांकि, कोर्ट ने डॉक्टर को बॉन्ड सर्विस की काउंसलिंग में शामिल होने का मौका नहीं दिए जाने पर आपत्ति जताई. कोर्ट ने पाया कि 1 जून 2026 का काउंसलिंग नोटिफिकेशन 2022 बैच के MD/MS और 2023 बैच के डिप्लोमा उम्मीदवारों के के लिए था, जबकि डॉ. सेन गुप्ता 2021 बैच की थीं. कोर्ट ने महानिदेशक, चिकित्सा शिक्षा और प्रशिक्षण को निर्देश दिया कि डॉक्टर के लिए नई काउंसलिंग कराई जाए. 

उन्हे सरकारी मेडिकल कॉलेजों और नेशनल मेडिकल कमीशन से मान्यता प्राप्त संस्थानों में उपलब्ध खाली पदों में से अपनी पसंद की जगह चुनने का अवसर दिया जाए. राज्य सरकार को यह प्रक्रिया 27 सितंबर 2026 से चार सप्ताह के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया गया है. साथ ही कोर्ट ने SGPGI में सीनियर रिजिडेंट के रूप में डॉक्टर द्वारा काम किए गए 89 दिनों को दो साल की अनिवार्य सरकारी सेवा में समायोजित करने का आदेश दिया. नई काउंसलिंग पूरी होने तक डॉक्टर SGPGI में सीनियर रिजिडेंट के पद पर काम करता रहेंगी.

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