हॉकी विश्व कप 2026 से पहले भारतीय टीम की जर्सी का रंग बदलने का फैसला खेल के मैदान से निकलकर राजनीति और पहचान की बहस तक पहुंच गया है. दशकों से नीली जर्सी में खेलने वाली भारतीय पुरुष और महिला टीम इस बार मुख्य रूप से केसरिया रंग की जर्सी में उतरेगी. हॉकी इंडिया का कहना है कि नीली आर्टिफिशियल टर्फ पर खिलाड़ियों की बेहतर विजिबिलिटी के लिए यह बदलाव किया गया है. लेकिन पूर्व कप्तान वीरेन रासकिन्हा समेत कई दिग्गज सवाल उठा रहे हैं कि क्या सिर्फ विजिबिलिटी के नाम पर भारतीय हॉकी की वर्षों पुरानी पहचान बदली जानी चाहिए? इस बीच कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी इस फैसले पर निशाना साधते हुए इसे पहचान बदलने की कोशिश बताया है. ऐसे में सवाल सिर्फ जर्सी के रंग का नहीं, बल्कि उस पहचान और विरासत का भी है, जिसे एक राष्ट्रीय टीम दशकों से अपने साथ लेकर चलती आई है.
भारतीय खेलों में नीला रंग कोई संयोग नहीं है. क्रिकेट से लेकर हॉकी, कबड्डी और कई अन्य खेलों में भारत को दुनिया नीली जर्सी में पहचानती है. हॉकी में तो यह रिश्ता और भी गहरा है. आठ ओलंपिक स्वर्ण पदक जीतने वाली विरासत, 1975 का विश्व कप और हाल के वर्षों में लगातार दो ओलंपिक कांस्य पदक, इन सभी उपलब्धियों की तस्वीरें अधिकतर नीली जर्सी में दर्ज हैं. इसलिए जब वीरेन रासकिन्हा कहते हैं कि भारतीय हॉकी की पहचान हमेशा नीली रही है, तो वह केवल निजी भावना नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक तथ्य की ओर इशारा करते हैं.
हालांकि, यह भी सच है कि खेलों में जर्सी बदलना कोई नई बात नहीं है. फुटबॉल की दुनिया में ब्राजील इसका सबसे चर्चित उदाहरण है. 1950 विश्व कप की हार के बाद ब्राजील ने अपनी सफेद जर्सी छोड़कर पीली जर्सी अपनाई. आज वही पीली जर्सी उसकी पहचान बन चुकी है. इटली वर्षों से नीली जर्सी पहनता है, जबकि उसके राष्ट्रीय ध्वज में नीला रंग है ही नहीं. नीदरलैंड्स केसरिया रंग में खेलता है, जबकि उसके झंडे में केसरिया नहीं है. ऑस्ट्रेलिया की हरी-पीली जर्सी उसकी खेल पहचान बन चुकी है. न्यूजीलैंड की रग्बी टीम पूरी दुनिया में 'ऑल ब्लैक्स' के नाम से मशहूर है, क्योंकि काली जर्सी उसकी सबसे बड़ी पहचान बन गई है. यानी खेलों में जर्सी का रंग हमेशा राष्ट्रीय ध्वज से तय नहीं होता, बल्कि समय के साथ बनी पहचान से तय होता है.
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भारत में भी जर्सी के डिजाइन लगातार बदलते रहे हैं. 2019 क्रिकेट विश्व कप में इंग्लैंड के खिलाफ भारतीय टीम ने भगवा रंग की वैकल्पिक जर्सी पहनी थी. तब भी चर्चा हुई, लेकिन वह एक मैच की ‘अवे जर्सी’ थी. इस बार मामला अलग है क्योंकि बहस टीम की प्राथमिक पहचान पर हो रही है. हॉकी इंडिया का तर्क है कि केसरिया रंग नीली टर्फ पर खिलाड़ियों को अधिक स्पष्ट दिखाएगा. यह तर्क खेल विज्ञान के लिहाज से पूरी तरह असंगत नहीं कहा जा सकता. लेकिन यदि यही कारण है तो यह भी स्वाभाविक प्रश्न है कि क्या अन्य रंगों पर विचार हुआ? क्या इस बदलाव पर खिलाड़ियों, पूर्व खिलाड़ियों और विशेषज्ञों से व्यापक चर्चा हुई? ऐसे प्रश्न किसी भी बड़े संस्थागत फैसले के साथ उठना सामान्य है.
यह भी सच है कि जर्सी मैच नहीं जिताती. भारत की हॉकी टीमों ने अलग-अलग डिजाइनों की जर्सियों में खेला, लेकिन उनकी पहचान एक निरंतर परंपरा से बनी. 1928 से 1980 के बीच भारत ने 8 ओलंपिक स्वर्ण, 1 रजत और 3 कांस्य पदक जीते. 1975 में विश्व कप जीता. 2020 टोक्यो और 2024 पेरिस ओलंपिक में लगातार दो कांस्य पदक हासिल किए. यह विरासत किसी एक रंग से बड़ी है, लेकिन रंग उस विरासत का दृश्य प्रतीक जरूर बन जाता है.
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इसीलिए सवाल यह नहीं है कि भगवा रंग अच्छा है या बुरा. भगवा भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण रंग है. यह त्याग, तप और साहस का प्रतीक माना जाता है. लेकिन किसी राष्ट्रीय खेल टीम की जर्सी केवल सांस्कृतिक प्रतीक नहीं होती, वह खेल की ब्रांडिंग भी होती है. दुनिया भर में करोड़ों दर्शक किसी टीम को उसके रंग से पहचानते हैं. ऐसे में अचानक रंग बदलना स्वाभाविक रूप से बहस पैदा करता है.
किसी टीम की जर्सी उसके लोगो जितनी ही महत्वपूर्ण होती है. मैनचेस्टर यूनाइटेड लाल, लिवरपूल लाल, बार्सिलोना नीला-लाल, रियल मैड्रिड सफेद, ऑल ब्लैक्स काला और ब्राजील पीला. ये केवल रंग नहीं, दशकों में बनी ब्रांड पहचान हैं. इन टीमों के डिजाइन और पैटर्न समय-समय पर बदलते रहते हैं, लेकिन उनकी मूल जर्सी का रंग आम तौर पर बरकरार रहता है.
आखिरकार, भारतीय हॉकी की सबसे बड़ी पहचान उसकी जर्सी नहीं, उसका खेल है. लेकिन खेल की पहचान को मजबूत करने वाले प्रतीकों का महत्व भी कम नहीं होता. रंग बदलना आसान है, पहचान बनाना कठिन. इसलिए जर्सी का हर बड़ा बदलाव केवल डिजाइन का नहीं, विश्वास और विरासत का भी फैसला होता है. इसी कारण यह बहस महत्वपूर्ण है और इसे भावनाओं के बजाय तर्क, संवाद और पारदर्शिता के साथ आगे बढ़ाया जाना चाहिए.
टीके श्रीवास्तव