बल्लेबाजी का अंदाज बदल गया, टी20 क्रिकेट ने बल्लेबाजों को तेजी से रन बनाना सिखा दिया, पावर हिटिंग आम हो गई, फिटनेस और तकनीक का स्तर ऊपर चला गया, पिचों और रणनीतियों में भी बदलाव आया. 1997 से 2026 तक क्रिकेट की दुनिया में मानो एक पूरा युग गुजर गया.
लेकिन एक चीज अब भी वहीं खड़ी है- 952 का किला....
29 साल पहले श्रीलंका ने भारत के खिलाफ टेस्ट क्रिकेट में ऐसा पहाड़ खड़ा किया था, जिसे आज तक कोई टीम पार नहीं कर सकी है. 2 अगस्त 1997 को कोलंबो के आर. प्रेमदासा स्टेडियम में शुरू हुए टेस्ट मैच में भारत ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 537/8 घोषित किए थे. कप्तान सचिन तेंदुलकर ने 143, मोहम्मद अजहरुद्दीन ने 126 और नवजोत सिंह सिद्धू ने 111 रन बनाए थे. 500+ का स्कोर उस दौर में बेहद मजबूत माना जाता था.
लेकिन भारत की पारी खत्म होने के बाद जो हुआ, उसने उस टेस्ट को क्रिकेट इतिहास के सबसे असाधारण मुकाबलों में बदल दिया.
श्रीलंका बल्लेबाजी करने उतरा और रन बनते चले गए. विकेट गिरने की बजाय रिकॉर्ड गिरने लगे. 300, 400, 500, 600... श्रीलंका की बल्लेबाजी रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी. आखिरकार 271 ओवरों में स्कोर 6 विकेट पर 952 पहुंचा और वहीं पारी की घोषणा कर दी गई. दरअसल, पांचवें दिन श्रीलंका ने जीत के लिए नहीं, इतिहास लिखने के लिए बल्लेबाजी की. चौथे दिन 587/1 से पांचवें दिन 952/6 तक पहुंचने में श्रीलंका ने 365 रन और जोड़े.
आज भी यही टेस्ट क्रिकेट का सर्वोच्च टीम स्कोर है. इसके बाद इंग्लैंड का 903/7, इंग्लैंड का ही 849 और 2024 में पाकिस्तान के खिलाफ 823/7 का स्कोर आता है. यानी करीब तीन दशक बाद भी 952 सबसे ऊपर है.
लेकिन 952 की कहानी सिर्फ एक बड़े स्कोर की कहानी नहीं है. इसमें ऐसे आंकड़े छिपे हैं, जिन्हें पढ़कर आज भी यकीन करना मुश्किल होता है.
सनत जयसूर्या ने अकेले 340 रन ठोक दिए. वह 578 गेंदों तक क्रीज पर रहे और उनकी पारी में 36 चौके और दो छक्के शामिल थे. रोशन महानामा ने 561 गेंदों पर 225 रन बनाए. दोनों ने दूसरे विकेट के लिए 576 रन जोड़ दिए.
576 रनों की यह साझेदारी आज भी दूसरे विकेट के लिए विश्व रिकॉर्ड है. और सिर्फ दूसरे विकेट की बात नहीं है- टेस्ट क्रिकेट में किसी भी विकेट के लिए इससे बड़ी साझेदारी केवल एक है. 2006 में कुमार संगकारा और महेला जयवर्धने ने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ कोलंबो (SSC) में तीसरे विकेट के लिए 624 रन जोड़े थे.
यानी जयसूर्या और महानामा की 576 रनों की साझेदारी आज भी टेस्ट इतिहास की दूसरी सबसे बड़ी साझेदारी है.
सोचिए, एक ही पारी में एक बल्लेबाज 340 रन बना रहा है, दूसरा 225 तक पहुंच रहा है और दोनों मिलकर 576 रन जोड़ रहे हैं. इसके बाद अरविंद डी सिल्वा ने 126 रन बनाए. श्रीलंका के स्कोरबोर्ड पर 952 रन थे.
यानी श्रीलंका ने टेस्ट क्रिकेट का ऐसा रिकॉर्ड बना दिया जो 29 साल से कायम है. यहीं से 952 का असली रहस्य शुरू होता है.
क्या आज के क्रिकेट में 1000 संभव है?
आज के दौर में यह सवाल और दिलचस्प हो गया है.
टी20 क्रिकेट ने बल्लेबाजी को पहले से कहीं ज्यादा आक्रामक बना दिया है. बल्लेबाज अब गेंद को मैदान से बाहर पहुंचाने में ज्यादा सहज हैं. 1997 की तुलना में रन बनाने की गति भी कई परिस्थितियों में तेज हुई है.
फिर भी टेस्ट क्रिकेट में 1000 रन तक पहुंचना सिर्फ तेजी का मामला नहीं है.
उसके लिए सिर्फ तेज बल्लेबाजी काफी नहीं होगी. एक बेहद सपाट पिच चाहिए, जिस पर बल्लेबाजों को रन बनाने में मुश्किल न हो. इसके साथ कम से कम दो-तीन बड़ी और लंबी साझेदारियां भी जरूरी होंगी, ताकि स्कोर लगातार तेजी से बढ़ता रहे. सबसे अहम बात यह कि विपक्षी गेंदबाज विकेट निकालने में नाकाम रहें और बल्लेबाजों को दबाव में डालने का कोई रास्ता न मिले.
लेकिन यहां कप्तान के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी- रिकॉर्ड और नतीजे में से किसे प्राथमिकता दी जाए. 900-1000 रन तक पहुंचने के लिए पारी को लंबा खींचना होगा, जबकि टेस्ट जीतने के लिए सही समय पर पारी घोषित करके विपक्षी को आउट करने के लिए पर्याप्त समय देना जरूरी है. यानी 1000 रन का आंकड़ा छूने की कोशिश में कहीं ऐसा न हो कि टीम के हाथ से मैच जीतने का मौका ही निकल जाए.
श्रीलंका ने 1997 में 952 तक पहुंचकर दिखा दिया था कि टेस्ट क्रिकेट में बल्लेबाजी की कोई सीमा तय नहीं की जा सकती. श्रीलंका के 952/6 के बाद आज तक कोई टीम 904 रनों तक भी नहीं पहुंच सकी. 2024 में इंग्लैंड ने पाकिस्तान के खिलाफ 823/7 बनाकर इस रिकॉर्ड के करीब पहुंचने की कोशिश जरूर की थी.
यानी टी20 के युग में बल्लेबाज पहले से ज्यादा तेज हैं, लेकिन टेस्ट क्रिकेट की 1000 रन वाली दीवार अब भी खड़ी है. 29 साल पहले श्रीलंका ने 952 का जो पहाड़ खड़ा किया था, वह आज भी टेस्ट क्रिकेट का एवरेस्ट है. सवाल सिर्फ यह है- क्या कोई टीम कभी इस एवरेस्ट को पार कर 1000 तक पहुंच पाएगी?
विश्व मोहन मिश्र