अचानक इतनी गर्मी कैसे पड़ने लगती है मई-जून में? क्यों सूरज के सामने झुक जाती है धरती

मई-जून में अचानक भयंकर गर्मी पड़ने की असली वजह सूर्य का कर्क रेखा पर पहुंचना है. उत्तर भारत में सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं. जमीन तेजी से गर्म होती है. मॉनसून से पहले उमस बढ़ जाती है.

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मई-जून में पड़ने वाली गर्मी को प्री-मॉनसून हीटवेव कहते हैं. (Photo: ITG) मई-जून में पड़ने वाली गर्मी को प्री-मॉनसून हीटवेव कहते हैं. (Photo: ITG)

ऋचीक मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 20 मई 2026,
  • अपडेटेड 9:39 AM IST

हर साल मई के अंत और जून के शुरू में उत्तर भारत में भयंकर गर्मी और उमस पड़ने लगती है. तापमान 45-48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है. वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि यह अचानक नहीं, बल्कि खगोलीय, मौसमी और भूगर्भीय कारणों से होता है. आइए समझते हैं कि धरती से लेकर सूरज तक क्या बदलाव होते हैं.  

पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा 23.5 डिग्री झुकी कर करती है. मई के अंत और जून के शुरू में सूर्य कर्क रेखा (Tropic of Cancer) के ठीक ऊपर आ जाता है. इस समय उत्तरी गोलार्ध (जहां भारत है) सूर्य की ओर सबसे ज्यादा झुका होता है. 

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वैज्ञानिकों के अनुसार, इस दौरान सूर्य की किरणें भारत के मैदानी इलाकों पर लगभग सीधी (90 डिग्री के करीब) पड़ती हैं. इससे जमीन प्रति वर्ग मीटर ज्यादा सौर ऊर्जा (Solar Insolation) प्राप्त करती है. दिन सबसे लंबे हो जाते हैं और रातें छोटी. नतीजा - जमीन तेजी से गर्म होती है. NASA और भारतीय मौसम विभाग (IMD) के अध्ययनों में इसे प्री-मॉनसून मैक्सीमम हीटिंग पीरियड कहा जाता है.

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धरती पर क्या बदलाव होते हैं?

  • सूखी जमीन और कम नमी: मार्च-अप्रैल से ही बारिश नहीं होती. मिट्टी पूरी तरह सूख जाती है. सूखी मिट्टी की गर्मी सोखने की क्षमता बहुत कम होती है, इसलिए वह जल्दी गर्म हो जाती है. 
  • वनस्पति कम होना: पेड़-पौधे सूख जाते हैं, जिससे भाप बनने का प्रोसेस कम हो जाता है. इससे हवा में नमी नहीं बढ़ पाती और गर्मी बढ़ जाती है.
  • लू हवाएं: राजस्थान-पाकिस्तान की तरफ से गर्म, सूखी पछुआ हवाएं चलती हैं, जो गर्मी को और बढ़ा देती हैं.

उमस क्यों बढ़ जाती है?

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मई के अंत में मॉनसून की तैयारी शुरू हो जाती है. बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से नमी भरी हवाएं उत्तर की ओर बढ़ने लगती हैं. इससे हवा में ह्यूमेडिटी बढ़ जाती है, लेकिन बारिश अभी नहीं होती. नतीजा - ज्यादा तापमान + ज्यादा ह्यूमेडिटी = बेहद असहनीय गर्मी. वैज्ञानिक इसे हीट इंडेक्स कहते हैं, जो असली तापमान से कहीं ज्यादा महसूस होता है. 

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भारत में इतनी गर्मी क्यों? 

  • भौगोलिक स्थिति: भारत कर्क रेखा के ठीक नीचे है. उत्तर भारत का विशाल मैदानी इलाका (Indo-Gangetic Plain) तीन तरफ से पहाड़ों से घिरा है, जिससे गर्म हवा आसानी से बाहर नहीं निकल पाती.
  • मौसम चक्र: मई-जून प्री-मॉनसून पीरियड है. मॉनसून अभी नहीं पहुंचा होता,इसलिए गर्मी चरम पर होती है.
  • जलवायु परिवर्तन: IPCC और IMD के हालिया शोध बताते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण भारत में हीटवेव की तीव्रता और अवधि बढ़ रही है. 2020-2025 के अध्ययनों में पाया गया कि एक्सट्रीम हीट इवेंट्स में 2-3 गुना बढ़ोतरी हुई है.
  • शहरी प्रभाव: शहरों में अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट से गर्मी 4-5 डिग्री ज्यादा हो जाती है. कंक्रीट और एसी की गर्म हवा इसे बढ़ाती है.

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वैज्ञानिक शोध क्या कहते हैं?

ऑक्सफओर्ड यूनिवर्सिटी और IMD के स्टडी के अनुसार, मई-जून में सोलर रेडिएशन सबसे अधिक होता है. वेट बल्ब टेंपरेचर पर हुई स्टडीज (2022-2025) बताती हैं कि 45°C तापमान + 50-60% नमी में शरीर का तापमान नियंत्रित करना बहुत मुश्किल हो जाता है. नासा की अर्थ ऑब्जरवेटरी रिपोर्ट्स भी पुष्टि करती हैं कि Northern Hemisphere Summer Solstice (21 जून) के आसपास उत्तरी भारत में गर्मी चरम पर होती है. 

जिम्मेदार कौन?

गर्मी का मुख्य जिम्मेदार प्रकृति का मौसमी चक्र है - सूर्य की स्थिति, पृथ्वी का झुकाव और मॉनसून से पहले का सूखा मौसम. लेकिन ग्लोबल वार्मिंग इसे और खतरनाक बना रहा है. 
 
मई-जून की यह गर्मी भारत के लिए सालाना चक्र का हिस्सा है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण यह हर साल ज्यादा उग्र होती जा रही है. वैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि अगर ग्लोबल वार्मिंग नहीं रोकी गई तो 45-50 डिग्री की हीटवेव सामान्य हो जाएगी. 

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