अल-नीनो की शैतानी... दुनिया के दो सबसे ठंडे जगह यूरोप और अमेरिका अचानक गर्म तवा कैसे बन गए?

अल-नीनो से यूरोप और अमेरिका जैसे ठंडे इलाके अचानक भीषण गर्मी की चपेट में आ गए हैं. प्रशांत महासागर के गर्म पानी ने हवाओं को बदला, जिससे हीटवेव बढ़ गईं. जलवायु परिवर्तन ने इसे और खतरनाक बना दिया.

Advertisement
अमेरिका के शिकागो में एक महिला साइकिल चलाते समय अपना मुंह ढंक रखी है. (Photo: AP) अमेरिका के शिकागो में एक महिला साइकिल चलाते समय अपना मुंह ढंक रखी है. (Photo: AP)

ऋचीक मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 01 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 1:24 PM IST

अल-नीनो एक प्राकृतिक मौसमी घटना है जो हर कुछ वर्षों में होती है. लेकिन 2026 में यह इतनी शक्तिशाली हो गई है कि दुनिया के ठंडे माने जाने वाले इलाके यूरोप और उत्तरी अमेरिका भीषण गर्मी से तप रहे हैं. लोग पूछ रहे हैं कि आखिर दुनिया के दो सबसे ठंडे क्षेत्र अचानक कैसे गर्म तवे बन गए? 

इसका जवाब है- प्रशांत महासागर के पानी के तापमान में बदलाव, हवा के रुख में परिवर्तन और जलवायु परिवर्तन के मिले-जुले प्रभाव में. 

Advertisement

अल-नीनो स्पेनिश शब्द है. यह एल-नीनो सदर्न ऑसिलेशन (ENSO) का गर्म चरण है. सामान्य स्थिति में प्रशांत महासागर के पूर्वी हिस्से का पानी ठंडा रहता है क्योंकि हवाएं ऊपरी ठंडे पानी को और ऊपर लाती हैं. लेकिन अल-नीनो में ट्रेड विंड्स कमजोर हो जाती हैं. इससे गर्म पानी पश्चिम से पूर्व की ओर बढ़ता है. 

यह भी पढ़ें: टू-फ्रंट जाल में फंसेगा पाकिस्तान? इधर सिंधु नदी पर भारत से तनाव, उधर पीट रहा अफगानिस्तान

2026 में NOAA और अन्य वैज्ञानिक संगठनों के अनुसार अल-नीनो पहले ही शुरू हो चुका है. यह मध्यम से मजबूत स्तर तक पहुंच सकता है. समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 0.5 डिग्री सेल्सियस या उससे ज्यादा गर्म है. यह अतिरिक्त गर्मी वातावरण में ऊर्जा छोड़ती है जो पूरी दुनिया की मौसम व्यवस्था को प्रभावित करती है.

Advertisement

यूरोप में गर्मी का वैज्ञानिक कारण

यूरोप आमतौर पर ठंडा महाद्वीप माना जाता है, लेकिन हाल के वर्षों में यहां रिकॉर्ड तोड़ गर्मी पड़ रही है. अल-नीनो जेट स्ट्रीम को प्रभावित करता है. जेट स्ट्रीम सामान्य रूप से यूरोप के ऊपर से गुजरती है. अल-नीनो के दौरान यह कभी-कभी ब्लॉक हो जाती है, जिससे गर्म हवा का डोम बन जाता है.  

वैज्ञानिकों के अनुसार अल-नीनो यूरोप में गर्मी को सीधे कम प्रभावित करता है, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से मदद करता है. जब प्रशांत में गर्म पानी बढ़ता है तो वैश्विक तापमान 0.2 डिग्री तक बढ़ सकता है. यूरोप में पहले से मौजूद जलवायु परिवर्तन के कारण यह अतिरिक्त गर्मी लू की लहरों को और तेज बना देती है. 

यह भी पढ़ें: अल-नीनो का असर, 2032 तक भारत को 94 लाख करोड़ के नुकसान की चेतावनी

2026 की गर्मी में कई यूरोपीय देशों में तापमान 40 डिग्री से ऊपर पहुंच गया. इससे फसलें सूख रही हैं. जंगल में आग लग रही हैं. लोगों की मौत हो रही है. जलवायु विशेषज्ञ कहते हैं कि अल-नीनो अकेला जिम्मेदार नहीं, बल्कि मानव-जनित वार्मिंग इसकी तीव्रता बढ़ा रही है.

अमेरिका में गर्मी का प्रकोप

उत्तर अमेरिका, खासकर कनाडा और उत्तरी अमेरिका के राज्यों में अल-नीनो का प्रभाव साफ दिख रहा है. अल-नीनो प्रशांत जेट स्ट्रीम को दक्षिण की ओर ले जाता है. इससे उत्तरी क्षेत्रों में गर्म और सूखी हवाएं आती हैं.
 
अल-नीनो के दौरान उत्तरी अमेरिका और कनाडा में सर्दियों में गर्मी बढ़ती है, लेकिन गर्मियों में भी सूखे और लू की स्थिति बनती है. 2026 में सुपर अल-नीनो की आशंका है जो इसे और खतरनाक बना रही है. प्रशांत महासागर में गर्म पानी की वजह से ऊर्जा वातावरण में जाती है, जिससे उच्च दबाव का क्षेत्र बनता है. यह क्षेत्र गर्म हवा को रोक लेता है और ठंडी हवाओं को आने नहीं देता. 

Advertisement

यह भी पढ़ें: हीटवेव का बड़ा असर! स्विट्जरलैंड के ग्लेशियर तेजी से पिघले रहे, वैज्ञानिकों ने दी ये चेतावनी

नतीजा – कैलिफोर्निया, पेसिफिक नॉर्थवेस्ट और कनाडा में रिकॉर्ड गर्मी. जंगल की आग बढ़ रही है. पानी की कमी हो रही है और कृषि प्रभावित हो रही है. अल-नीनो दक्षिणी अमेरिका में ज्यादा बारिश ला सकता है, लेकिन उत्तर में सूखा और गर्मी.

जलवायु परिवर्तन के साथ अल-नीनो का खतरनाक मेल

अल-नीनो नई घटना नहीं है. यह हजारों साल से होता आ रहा है. लेकिन समस्या यह है कि आज पृथ्वी पहले से 1.3 डिग्री सेल्सियस गर्म हो चुकी है. अल-नीनो इस गर्मी पर अतिरिक्त तापमान का बोझ डालता है. 

विश्व मौसम संगठन (WMO) चेतावनी दे चुका है कि अल-नीनो जलवायु परिवर्तन की आग पर और ईंधन डाल रहा है. इससे लू, सूखा, बाढ़ और आग जैसी घटनाएं ज्यादा तीव्र और लगातार हो रही हैं. 2026-2027 को रिकॉर्ड गर्म वर्ष बनने की आशंका है.

यह भी पढ़ें: रुला रहा अल-नीनो: दिल्ली में पारा 42 पर फील लाइक टेंपरेचर 51 डिग्री, ऐसा क्यों?

अल-नीनो सिर्फ गर्मी नहीं लाता. यह वैश्विक स्तर पर मौसम पैटर्न बदल देता है. ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और भारत के कुछ हिस्सों में सूखा पड़ सकता है, जबकि दक्षिण अमेरिका में भारी बारिश हो सकती है. समुद्री जीवों पर भी असर पड़ता है क्योंकि गर्म पानी मछलियों के प्रवास को बदल देता है.

Advertisement

वैज्ञानिकों का कहना है कि हमें अल-नीनो को जलवायु परिवर्तन से अलग नहीं देखना चाहिए. अगर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम नहीं हुआ तो ऐसे घटनाओं की तीव्रता और बढ़ेगी.

अल-नीनो की शैतानी हमें याद दिलाती है कि प्रकृति कितनी शक्तिशाली है, लेकिन मानव गतिविधियां इसे और खतरनाक बना रही हैं. यूरोप और अमेरिका में गर्मी का प्रकोप सिर्फ शुरुआत है. सरकारों, वैज्ञानिकों और आम लोगों को मिलकर तैयारी करनी होगी – बेहतर मौसम पूर्वानुमान, जल संरक्षण, वन संरक्षण और स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ना. 

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »