बढ़ गई हैं हिमालय पर वो झीलें जो टूटने पर लाती हैं केदारनाथ जैसा 'प्रलय'... IIT रुड़की की स्टडी

हिमालय में ग्लेशियल झीलों की संख्या बढ़ रही है. यानी केदारनाथ और चमोली जैसे हादसों की आशंका भी. IIT रुड़की के वैज्ञानिकों स्टडी की है, जिसमें पता चला है कि हिमालय में 2022 तक 31,698 ग्लेशियल झीलें थीं. जो 2016 से 2024 तक 5.5 फीसदी बढ़ गई हैं. ग्लेशियल झीलों के फटने से 93 लाख लोग खतरे में हैं.

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आईआईटी रुड़की स्टडी के मुताबिक हिमालय में ग्लेशियल झीलें बढ़ गई हैं और खतरा भी है. (Photo: Pixabay) आईआईटी रुड़की स्टडी के मुताबिक हिमालय में ग्लेशियल झीलें बढ़ गई हैं और खतरा भी है. (Photo: Pixabay)

ऋचीक मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 31 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 4:22 PM IST

अगली खतरनाक सुनामी समंदर से नहीं बल्कि हिमालय से आएगी. करीब 93 लाख लोग इस खतरे की जद में है. क्योंकि हाई माउंटेन एशिया (HMA) दुनिया का वह इलाका है जहां सबसे ज्यादा ऊंचाई वाली झीलें हैं. ये झीलें ग्लेशियरों के पिघलने से बनी हैं. हाल ही में एक अध्ययन ने सैटेलाइट की मदद से इन झीलों की पूरी इन्वेंटरी बनाई गई.उनके बदलावों का पता लगाया गया है. 

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IIT रुड़की के ग्लेशियोलॉजिस्ट रविंद्र कुमार और सौरभ विजय ने यह स्टडी की है. स्टडी नेचर जर्नल में छपी है. स्टडी के मुताबिक 2022 में हिमालय में 31,698 हिमनदी झीलें पाई गईं. जिनका कुल क्षेत्रफल 2,240 वर्ग किलोमीटर था. ये झीलें मुख्य रूप से 4,000 से 5,400 मीटर की ऊंचाई पर हैं.

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सौरभ विजय ने आजतक डॉट कॉम को बताया कि ये ग्लेशियल झीलें पूर्वी हिमालय में सबसे ज्यादा क्षेत्र कवर करती हैं. 2016 और 24 के बीच झीलों के क्षेत्र में 5.5% की कुल बढ़ोतरी पाई. किलियन शान इलाके में सबसे ज्यादा 22.5% बढ़ोतरी हुई, जबकि पामीर में सिर्फ 2.9%.

यह स्टडी कैसे हुई?

वैज्ञानिकों ने एक पूरी तरह ऑटोमेटेड तरीका विकसित किया है, जिसमें लैंडसैट-8, सेंटिनेल-1, सेंटिनेल-2 और कोपरनिकस डिजिटल एलिवेशन मॉडल (DEM) जैसे ओपन-सोर्स सैटेलाइट डेटा का इस्तेमाल किया गया. यह तरीका पुराने तरीकों से बेहतर है, क्योंकि इसकी सटीकता 96% से ज्यादा है, खासकर छोटी झीलों (20,000-100,000 वर्ग मीटर) को पहचानने में. 

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यह हिमालय जैसे तेजी से बदलते इलाकों में झीलों की नियमित निगरानी के लिए उपयोगी है. इससे ग्लेशियल झीलों के फटने (GLOFs - Glacial Lake Outburst Floods) की आपदाओं को समझने और रोकने में मदद मिलेगी.

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कारण क्या हैं?

इन झीलों की संख्या और आकार बढ़ने का मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन है. ग्लोबल वार्मिंग से ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे नई झीलें बन रही हैं. पुरानी झीलें फैल रही हैं. इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) रिपोर्ट के अनुसार 1950 से हीटवेव और तापमान बढ़ने से ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं.

हिमालय में मॉनसून के बदलते पैटर्न, ज्यादा बारिश और गर्मी से मेल्टवाटर (पिघला पानी) बढ़ रहा है. मानवीय गतिविधियां जैसे डिफॉरेस्टेशन और बांध बनाना भी समस्या बढ़ा रही हैं. पिछले दशकों में GLOFs की संख्या बढ़ी है, क्योंकि झीलें अस्थिर हो रही हैं.

भविष्य की समस्याएं क्या हैं?

भविष्य में ये झीलें और ज्यादा खतरनाक हो सकती हैं. GLOFs से अचानक बाढ़ आ सकती है, जो गांवों, सड़कों, पुलों और बांधों को नष्ट कर सकती है. इससे लैंडस्लाइड, नदियों में बाढ़ और पर्यावरण को नुकसान होगा. पानी की कमी भी हो सकती है, क्योंकि ग्लेशियर सिकुड़ रही हैं – ये 1.4 अरब लोगों को पानी सप्लाई करती हैं. कृषि, हाइड्रोपावर और पीने के पानी पर असर पड़ेगा. 

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अगर तापमान और बढ़ा, तो झीलें और फैलेंगी, GLOFs ज्यादा होंगे. अध्ययन कहता है कि एंडीज जैसे इलाकों में खतरा हिमालय से भी ज्यादा हो सकता है. इससे जैव विविधता खो सकती है. 

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कितने लोग प्रभावित हैं?

GLOFs से दुनिया भर में 1.5 करोड़ लोग खतरे में हैं. इनमें से 93 लाख (62%) हिमालय क्षेत्र में रहते हैं. भारत में करीब 30 लाख, पाकिस्तान में 20 लाख और चीन में भी लाखों लोग प्रभावित हैं. हिमालय में 10 लाख लोग झीलों से सिर्फ 10 किमी दूर रहते हैं, जहां चेतावनी का समय बहुत कम होता है.

पिछले 190 सालों में हिमालय में GLOFs से 7,000 से ज्यादा मौतें हुई हैं. 2013 में उत्तराखंड केदारनाथ GLOF से 6,000 मौतें. 2023 में सिक्किम में 46 मौतें और 88,400 लोग प्रभावित. अगर ये आपदाएं बढ़ीं, तो लाखों लोग विस्थापित हो सकते हैं.

यह स्टडी हमें चेतावनी देती है कि हिमालय जैसे इलाकों में निगरानी बढ़ानी होगी. सैटेलाइट टेक्नोलॉजी से पहले से खतरे का पता लगाकर जान-माल बचाया जा सकता है. सरकारों को अर्ली वॉर्निंग सिस्टम, बांध मजबूत करना और जलवायु परिवर्तन रोकने के उपाय करने चाहिए. यह सिर्फ एक क्षेत्र की समस्या नहीं, बल्कि ग्लोबल चैलेंज है.

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