यूरोप में हीटवेव से 1300 मौतों का दावा, क्यों इतने बिगड़ रहे हालात, कब से मिल सकती है राहत

यूरोप में भीषण हीटवेव से 1300 मौतें हुई हैं. फ्रांस में 1000 से ज्यादा अधिक मौतें हुईं. जलवायु परिवर्तन और अल-नीनो ने गर्मी को और खतरनाक बना दिया है. पश्चिमी यूरोप में इस हफ्ते राहत की उम्मीद है.

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लंदन के वेस्टमिन्स्टर ब्रिज पर छाता और हाथपंखा लेकर चलती महिलाएं. (File Photo: AP) लंदन के वेस्टमिन्स्टर ब्रिज पर छाता और हाथपंखा लेकर चलती महिलाएं. (File Photo: AP)

आजतक साइंस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 29 जून 2026,
  • अपडेटेड 10:27 AM IST

यूरोप इस समय भीषण गर्मी की चपेट में है. फ्रांस की स्वास्थ्य एजेंसी ने 1000 से ज्यादा अतिरिक्त मौतों की पुष्टि की है. मौतों का कुल आंकड़ा 1300 से ज्यादा पहुंचने की आशंका जताई जा रही है. 20 जून से शुरू हुई यह हीटवेव अब तक की सबसे खतरनाक गर्मी साबित हो रही है. कई देशों में तापमान 40 डिग्री के पार पहुंच गया है. 

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बुजुर्गों और कमजोर लोगों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है. वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से यह हीटवेव है. रात के तापमान भी इतने ऊंचे हैं कि शरीर को आराम मिलना मुश्किल हो गया है.

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फ्रांस में सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसी ने चेतावनी दी है कि मौतों की संख्या और बढ़ सकती है क्योंकि नर्सिंग होम्स और घरों में हुई मौतों का पूरा डेटा अभी आना बाकी है. ज्यादातर मौतें बुजुर्गों की हुई हैं. 

विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख टेड्रोस एडनोम घेब्रेयेसस ने कहा कि फिलहाल 15 करोड़ लोग भीषण गर्मी में जी रहे हैं. सैकड़ों मौतें हो चुकी हैं. स्कूल बंद हैं और बिजली ग्रिड लड़खड़ा रहे हैं. उन्होंने चेतावनी दी कि जलवायु परिवर्तन के कारण 'एक पीढ़ी में एक बार' आने वाली हीटवेव अब हर साल होने लगी है. 

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यूरोप के घर, कार्यालय और स्कूल गर्मी से निपटने के लिए तैयार नहीं हैं. पुरानी इमारतें बिना एयर कंडीशनिंग के हैं. गर्मी के दौरान रात में भी तापमान कम नहीं हो रहा, जिससे लोगों का शरीर ठंडा होने का मौका नहीं पा रहा. 

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक ऊंचे तापमान से हृदय, फेफड़े और मस्तिष्क पर दबाव पड़ता है. खासकर उन लोगों को खतरा ज्यादा है जिन्हें पहले से बीमारियां हैं. 

रिकॉर्ड तापमान और कई देश प्रभावित

जर्मनी, पोलैंड, चेक गणराज्य और ऑस्ट्रिया में तापमान ने सभी पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए. ऑस्ट्रिया, चेक गणराज्य और जर्मनी में 40 डिग्री से ऊपर पहुंच गया. लोग घरों में दुबके बैठे हैं, शाम ढलने का इंतजार करते हैं. जर्मनी में ट्रेन सेवाएं कम कर दी गईं, लीपजिग में ट्राम सस्पेंड कर दिए गए. 

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यह गर्मी सिर्फ लोगों को नहीं, पूरी व्यवस्था को प्रभावित कर रही है. नदियां सूख रही हैं. उनका पानी गर्म हो रहा है. इससे बिजली उत्पादन प्रभावित हो रहा है. हंगरी के पाक्स न्यूक्लियर पावर प्लांट ने डेन्यूब नदी के गर्म पानी के कारण अपनी क्षमता घटा दी. 

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इटली में पो नदी का जलस्तर इतना कम हो गया कि समुद्री पानी 18 किलोमीटर अंदर तक घुस आया है. इससे कृषि और वेटलैंड्स को खतरा पैदा हो गया है. कई लोग गर्मी से बचने के लिए नदियों और झीलों में घुसे और डूब गए. इटली में एक मंत्री की पत्नी के पति लापता हो गए हैं. 

परिवहन, बिजली और अर्थव्यवस्था पर असर

भीषण गर्मी ने परिवहन व्यवस्था को ठप कर दिया है. जर्मनी और फ्रांस में ट्रेनें कम चल रही हैं. बिजली ग्रिड पर भारी बोझ है क्योंकि कूलिंग की मांग बढ़ गई है. कई जगहों पर बिजली कटौती हो रही है. फ्रांस में आंधी-तूफान की वजह से 36,000 घरों में बिजली नहीं है. कृषि क्षेत्र भी बुरी तरह प्रभावित है. फसलों को नुकसान हो रहा है. पशुओं के लिए चारा-पानी की समस्या बढ़ गई है. 

वैज्ञानिकों का स्पष्ट कहना है कि जलवायु परिवर्तन ने इस गर्मी को 100 गुना ज्यादा संभावित बना दिया है. दो दशक पहले ऐसी स्थिति बहुत कम होती. अब ग्लोबल वार्मिंग के कारण खतरनाक मौसम और तेजी से बढ़ रहे हैं. 

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राहत कब मिलेगी?

अच्छी खबर यह है कि पश्चिमी यूरोप में इस सप्ताह ठंडी हवाएं आने की उम्मीद है. मौसम विज्ञानियों के अनुसार, फ्रांस, जर्मनी और चेक गणराज्य में आंधी-तूफान आ सकते हैं जो गर्मी को कम करेंगे. फ्रांस के मौसम विभाग ने कहा कि ज्यादातर इलाकों में भीषण गर्मी कम हो गई है, हालांकि उत्तर-पूर्व में सतर्कता बरतनी पड़ रही है. 

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स्वास्थ्य मंत्री स्टेफनी रिस्ट ने चेतावनी दी कि गर्मी का असर मौसम ठंडा होने के 10 दिन बाद तक रह सकता है. यानी मौतों और स्वास्थ्य समस्याओं का सिलसिला अभी थमने वाला नहीं है. गर्मी के बाद भी अस्पतालों पर दबाव बना रहेगा.

क्यों बिगड़ रहे हैं हालात?  

यह हीटवेव सिर्फ एक प्राकृतिक घटना नहीं है. वैज्ञानिकों ने साफ कहा है कि इंसानी गतिविधियों से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों ने पृथ्वी को गर्म कर दिया है. यूरोप पहले से ही तेजी से गर्म हो रहा है. शहरों में कंक्रीट और ग्लास की इमारतें गर्मी को और बढ़ा रही हैं. बूढ़ी आबादी बढ़ रही है, जो सबसे ज्यादा संवेदनशील है. 

एडॉप्टेशन की कमी भी बड़ी समस्या है. यूरोप के कई देश गर्मी के लिए तैयार नहीं थे क्योंकि उन्हें लगता था कि ऐसी गर्मी कभी-कभी ही आएगी. अब हर साल यह सामान्य हो रही है. स्कूलों, अस्पतालों और घरों में कूलिंग सिस्टम लगाने की जरूरत है. शहरों को ग्रीन स्पेस बढ़ाने चाहिए ताकि गर्मी कम हो.

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यह घटना हमें भविष्य की झलक दिखा रही है. अगर ग्लोबल वार्मिंग पर काबू नहीं पाया गया तो यूरोप को और तेज गर्मी, सूखा और आंधियों का सामना करना पड़ेगा. वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन कम करना जरूरी है. साथ ही स्थानीय स्तर पर तैयारियां मजबूत करनी होंगी. 

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फिलहाल पश्चिमी यूरोप को इस सप्ताह कुछ राहत मिलने की उम्मीद है, लेकिन मध्य और बाल्कन क्षेत्रों में गर्मी बढ़ सकती है. लोगों को सलाह दी जा रही है कि दोपहर में बाहर न निकलें, ज्यादा पानी पिएं और बुजुर्गों का खास ध्यान रखें. 

यह संकट दिखाता है कि जलवायु परिवर्तन अब दूर की समस्या नहीं है. यह हमारे दरवाजे पर दस्तक दे चुका है. यूरोप जैसे विकसित महाद्वीप को भी इससे जूझना पड़ रहा है तो विकासशील देशों की स्थिति और कठिन होगी. समय आ गया है कि हम सिर्फ बातें न करें बल्कि ठोस कदम उठाएं – चाहे वह उत्सर्जन कम करना हो या गर्मी से निपटने की तैयारियां. 

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