कोल्ड वॉर समय का अमेरिकी जासूसी सैटेलाइट अंतरिक्ष में टूटा, 200 उपग्रहों पर मंडरा रहा खतरा

कोल्ड वॉर समय का अमेरिकी जासूसी सैटेलाइट USA-32 सितंबर 2026 में बिना चेतावनी टूट गया. इससे लोअर अर्थ ऑर्बिट में मलबा फैला. स्पेस फोर्स निगरानी कर रही है. इसी दौरान नासा SR-71 ब्लैकबर्ड को फिर उड़ाने की की खबरें आईं है.

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अमेरिकी जासूसी सैटेलाइट अंतरिक्ष में टूटने से अन्य उपग्रहों के सामने दिक्कत आ गई है. (Photo: ITG) अमेरिकी जासूसी सैटेलाइट अंतरिक्ष में टूटने से अन्य उपग्रहों के सामने दिक्कत आ गई है. (Photo: ITG)

आजतक साइंस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 01 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 12:44 PM IST

सितंबर 2026 में अंतरिक्ष में एक पुराना अमेरिकी जासूसी सैटेलाइट अचानक टुकड़ों में बंट गया. USA-32 नाम का यह सैटेलाइट करीब 38 साल पुराना था. यह घटना लोअर अर्थ ऑर्बिट में हुई, जहां पहले से कई एक्टिव सैटेलाइट घूम रहे हैं. अमेरिकी स्पेस फोर्स ने इसकी पुष्टि की और मलबे को ट्रैक करना शुरू कर दिया. अभी तक किसी अन्य अंतरिक्ष यान को सीधा खतरा नहीं बताया गया है, लेकिन यह घटना पुराने हार्डवेयर के जोखिम को फिर याद दिलाती है.

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USA-32 को 5 सितंबर 1988 को टाइटन-2 रॉकेट से लॉन्च किया गया था. इसका गुप्त नाम फराह-3 था. यह नेशनल रिकॉनेसेंस ऑफिस का सिग्नल इंटेलिजेंस सैटेलाइट था. कोल्ड वॉर के दौरान इसका काम सोवियत रडार और रेडियो संकेतों को पकड़ना था. सालों पहले इसकी सेवा खत्म हो चुकी थी, लेकिन यह लगभग 775 KM ऊंचाई पर घूमता रहा. 

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13 सितंबर 2026 को करीब 21:13 यूटीसी पर यह अचानक फ्रेगमेंट हो गया. स्पेस ट्रैक और स्पेस फोर्स ने आधिकारिक रूप से इसकी घोषणा की. स्वतंत्र ट्रैकिंग समूहों ने भी मलबे के बिखरने की पुष्टि की. कुछ दिनों में टुकड़े कक्षा के बड़े हिस्से में फैल गए.

संभावित कारण और मलबे का खतरा

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कारण अभी पूरी तरह साफ नहीं है. विशेषज्ञों का मानना है कि दशकों की गर्मी-ठंड के चक्र के बाद बैटरी सेल या दबाव वाले टैंक में दरार आ गई होगी. छोटा मलबा टकराना भी संभव है. आधुनिक सैटेलाइटों में मिशन खत्म होने पर ईंधन और बैटरी सुरक्षित बना दी जाती है, लेकिन 80 के दशक के सैटेलाइटों में यह नियम इतना सख्त नहीं था. 

775 किलोमीटर की ऊंचाई पर वायुमंडल का खिंचाव कम है, इसलिए मलबा लंबे समय तक बना रह सकता है. इस ऊंचाई पर 200 से ज्यादा एक्टिव सैटेलाइट हैं, जिनमें संचार नेटवर्क भी शामिल हैं. स्पेस फोर्स ने कहा कि ट्रैक किए गए मलबे को नियमित सुरक्षा जांच में शामिल कर लिया गया है. 

अभी कोई तत्काल खतरा नहीं है, लेकिन लंबे समय में और टकराव का जोखिम बढ़ सकता है. यह घटना केसलर सिंड्रोम जैसी चिंताओं को फिर से जगाती है, जहां एक मलबा दूसरे से टकराकर और अधिक मलबा पैदा कर सकता है. यह घटना सिर्फ एक पुराने सैटेलाइट की नहीं है. पृथ्वी की कक्षा में हजारों निष्क्रिय वस्तुएं घूम रही हैं. 

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नई पीढ़ी के स्टारलिंक जैसे बड़े कॉन्सटीलेशन ने कक्षा को और घना बना दिया है. पुराने सैन्य सैटेलाइटों की निगरानी और निष्क्रिय करने की जरूरत अब और साफ दिख रही है. स्पेस फोर्स की निरंतर ट्रैकिंग और अंतरराष्ट्रीय सहयोग इस जोखिम को कम करने का मुख्य तरीका है. वैज्ञानिक लगातार छोटे मलबे का पता लगाने वाली नई तकनीकें विकसित कर रहे हैं, लेकिन समस्या पूरी तरह हल नहीं हुई है.

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ब्लैकबर्ड को फिर से उड़ाने की चर्चा हुई तेज 

इसी समय ऑनलाइन चर्चाओं में एक और खबर जुड़ गई. नासा के कुछ पुराने SR-71 ब्लैकबर्ड से जुड़े इंजीनियरों से संपर्क की खबरें आईं. नासा एडमिनिस्ट्रेटर जेरेड इसाकमैन ने हाल में एक्स-प्लेन कार्यक्रम को फिर मजबूत करने की बात कही. उन्होंने हाई स्पीड और ऊंचाई वाली उड़ानों का जिक्र किया. 

एक SR-71 को प्रदर्शन स्थल से हटाकर हैंगर में ले जाने की भी रिपोर्ट आई. ब्लैकबर्ड 3704 km/hr से ज्यादा तेज उड़ने वाला विमान था. इसे 1990 के दशक में नासा ने रिसर्च के लिए इस्तेमाल किया था. आखिरी उड़ान 1999 में हुई थी. अब सप्लाई चेन टूटने और विशेषज्ञों की उम्र बढ़ने जैसी चुनौतियों के बीच इसे फिर उड़ाने की कोशिश एक्स-प्लेन विशेषज्ञता वापस लाने का हिस्सा बताई जा रही है. 

कुछ लोग सैटेलाइट की घटना और ब्लैकबर्ड चर्चा को जोड़कर देख रहे हैं, लेकिन दोनों घटनाएं अलग-अलग समय और संदर्भ की हैं. सैटेलाइट का टूटना पुरानी तकनीक के जोखिम को दिखाता है, जबकि ब्लैकबर्ड चर्चा नई पीढ़ी की उच्च गति क्षमता विकसित करने की मंशा को दर्शाती है. 

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दोनों घटनाएं अंतरिक्ष और एयरोस्पेस क्षेत्र की दो अलग चुनौतियों को उजागर करती हैं. एक तरफ पुराने मलबे का प्रबंधन जरूरी है, दूसरी तरफ भविष्य की तकनीकी क्षमता बनाए रखना. USA-32 जैसी घटनाएं याद दिलाती हैं कि कक्षा साफ रखने के नियम सख्त होने चाहिए. 

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वहीं ब्लैकबर्ड जैसी क्लासिक प्लेटफॉर्म को दोबारा सक्रिय करने की कोशिशें दिखाती हैं कि कुछ क्षमताएं खोने के बाद वापस लाना कितना कठिन होता है. विशेषज्ञों का कहना है कि नई सामग्री, बेहतर बैटरी और निष्क्रियता प्रक्रिया से भविष्य के सैटेलाइटों में ऐसे जोखिम कम किए जा सकते हैं.  

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