राम मंद‍िर, मारीच और मंदोदरी... चढ़ावा चोरी में छल से लेकर कवर-अप तक की कथा

राम लला के धन में गबन की एफआईआर में दर्ज इन अष्ट सखाओं का ये अनूठा लक्ष्मी कीर्तन कब से चल रहा था, ये भी जांच का विषय है. कहा जा रहा है कि पुराने सीसीटीवी फुटेज तो उपलब्ध नहीं हो रहे हैं लेकिन पिछले 47 दिनों की वीड‍ियो फुटेज में ये लोग 70 से ज्यादा बार अपने हाथ की सफाई दिखाते शूट हो गए हैं.

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दान चोरी के आरोपियों में से एक लवकुश मिश्रा का काम चढ़ावे की गिनती करना था. (Photo: ITG) दान चोरी के आरोपियों में से एक लवकुश मिश्रा का काम चढ़ावे की गिनती करना था. (Photo: ITG)

संजय शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 30 जून 2026,
  • अपडेटेड 8:52 AM IST

पौराण‍िक मान्यता है कि गाय के अंग प्रत्यंग में 33 कोटि देवताओं का वास है. जबकि गोबर की महिमा का बखान करते लिखा गया है कि 'गोमये वसते लक्ष्मी, गोमूत्रे धन्वन्तरि:' यानी गाय के गोबर में साक्षात लक्ष्मी का निवास है. श्री राम जन्मभूमि मंदिर का चंदा चुराने के आरोप‍ियों में से एक ने इस उक्‍त‍ि को अनूठे ढंग से चर‍ितार्थ क‍िया है.

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चढ़ावा चोरी के आठ आरोपियों में से एक हैं लवकुश मिश्रा. इनका काम था राम लला को द‍िए चढ़ावे की गिनती करना और उसका हिसाब किताब रखना. जब इस गड़बड़ घोटाले की जांच करने वाली टीम ने 27 साल के लवकुश के घर छापेमारी की तो गोबर के ढेर से साक्षात लक्ष्मी प्रकट हुई. 20 लाख रुपए के रूप में. इस लक्ष्मी के दर्शन कर धन्य हुई जांच टीम को तो सहसा यकीन ही नहीं हुआ कि पुराणों की उक्ति इस रूप में साकार होगी.

राम लला के धन में गबन की एफआईआर में दर्ज इन अष्ट सखाओं का ये अनूठा लक्ष्मी कीर्तन कब से चल रहा था, ये भी जांच का विषय है. कहा जा रहा है कि पुराने सीसीटीवी फुटेज तो उपलब्ध नहीं हो रहे हैं लेकिन पिछले 47 दिनों की वीड‍ियो फुटेज में ये लोग 70 से ज्यादा बार अपने हाथ की सफाई दिखाते शूट हो गए हैं. यानी  कैमरे ने तो इनको पकड़ लिया, लेकिन कानून की पकड़ में ये और उनके आका कब और कैसे आएंगे! क्योंकि इन आरोपियों के माई-बाप ट्रस्ट में ही मौजूद हैं. ज‍िन पर धृतराष्ट्र बने रहने का आरोप लग रहा है. उनसे पूछा जा रहा है क‍ि ऐसी कौन सी मजबूरी, मोह या मानसिकता थी, जिसकी वजह से वे आंख, नाक, कान बंद किए भ्रामरी करते रहे? पुरानी कहावत तो यह भी है कि 'संत को दासी और चोर को खांसी हमेशा संकट में डालती है.' लेकिन यहां तो अपने रिश्तेदारों ने ही ट्रस्टियों की चादर खींच डाली.

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अब करतूतें हुई हैं तो बातें भी बन रही हैं. राई है तभी तो पहाड़ बन रहे हैं. उनको किसी भी भांति रोका नहीं जा सकता क्योंकि आप मारते आदमी के हाथ पकड़ सकते हो लेकिन बोलने वाले का क्या पकड़ेंगे?

मारीच का भेद खुला

दूसरी ओर रामजी की प्रजा को अपने भगवान की लीला का एक और प्रमाण मिला. रामजी के प्रत‍ि आस्‍थावान बनकर मंद‍िर की 'अर्थ' व्‍यवस्‍था में सेंध लगा रहे लोगों का भेद मंद‍िर में ही खुल गया. कपट मृग मारीच की तरह.  कथा तो आपने सुनी ही होगी. सीता के अपहरण की धुन पर सवार रावण के प्रभाव में आकर मारीच ने स्‍वर्ण मृग का भेस धरा था. मृग पर मोह‍ित सीता ने राम से उसे पकड़ने का आग्रह क‍िया. सीता को लाख समझाने के बावजूद राम को मृग के पीछे जाना पड़ा. बावजूद इसके क‍ि राम मारीच का सच जानते थे. जब राम का बाण मारीच को लगा तो उसने मरते-मरते राम की आवाज में 'हे सीते, हे लक्ष्‍मण' कहा और अपने राक्षसी रूप में आ गया. आगे की कथा आप जानते हैं.

चंदा घोटाले की परतें जैसे-जैसे खुल रही हैं, मारीच अपने असली रूप में आ रहे  हैं. जी हां, वहीं मारीच को राम-भक्‍त का भेस धरकर मंद‍िर की व्‍यवस्‍था में शुमार हो गए थे. मं‍द‍िर प्रांगण में बेहद माननीय-सम्‍मानीय. जांच से पता चल रहा है क‍ि नोट चुराने के ल‍िए ये सीसीटीवी की ओर पीठ करके खड़े हो जाते थे. लेक‍िन, ह‍िडन कैमरे (छुपे हुए कैमरे) ने इन्‍हें रंगे हाथों पकड़ ल‍िया. ज‍िस तरह मारीच की मत‍ि मारी गई थी, उसी तरह इन आरोप‍ियों का भी हाल रहा. उनका छल काम न आया.

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मंदोदरी का धर्मसंकट

रामायण की कथा में मंदोदरी का पात्र धर्मसंकट का प्रतीक है. एक ओर उनका सत्‍यन‍िष्‍ठ सनातनी व्‍यक्‍त‍ित्‍व और उसकी भूम‍िका है, तो दूसरी और रावण के प्रत‍ि पत‍िव्रत धर्म न‍िभाने की मजबूरी. राम मंद‍िर चंदा चोरी मामले में यह तथ्‍य बार-बार उभरकर सामने आ रहा है क‍ि मंद‍िर की अव्‍यवस्‍थाओं को लेकर बार बार ध्‍यान आकृष्‍ट क‍िया जा रहा था, लेक‍िन उच्‍च पदेन  व्‍यवस्‍थापक अनदेखी करते रहे. अब जबक‍ि यह स्‍पष्‍ट हो गया है क‍ि चढ़ावे में आई लाखों, या शायद करोड़ों की राश‍ि चुरा ली गई है तो श्री राम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र न्यास के पदाधिकारियों की बोलती बंद है. सवाल उठ रहे हैं क‍ि राम मंद‍िर आंदोलन के इन न‍िष्‍ठावान लोगों को क्‍या हो गया था? ह‍िंदुओं की आस्‍था के इतनी बड़े मंद‍िर की साख बचाने और अपने न‍िकटवर्ती चहेतों पर लग रहे आरोपों के बीच वे धर्मसंकट में क्‍यों फंस गए? उनके सामने मंदोदरी होने की क्‍या मजबूरी थी? वे धृतराष्‍ट्र क्‍यों बने रहे?

न्‍यास के पदाध‍िकारी झटके पर झटका मिलने से संभल नहीं पा रहे हैं. उधर रही बात विश्व हिंदू परिषद की तो वहां से ये बयान तो आ रहे हैं कि निष्पक्ष जांच हो.. आरोपी कितना भी बड़ा हो लेकिन सख्त सजा मिले.. लेकिन अब तक जो हुआ, जांच की अंतरिम रिपोर्ट आई उस पर यही कहा जा रहा है कि जांच पूरी होगी तभी दूध का दूध और पानी का पानी होगा.

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रही बात एफआईआर और महासचिव चंपत राय व न्यासी डॉ. अनिल मिश्रा के इस्तीफे की तो उसमें भी अंतर्विरोध की दरारें स्पष्ट हैं. इस्तीफों में चंपत राय और डॉ अनिल मिश्रा ने इस्तीफे का आधार नैतिक बताया. जबकि यूपी सरकार कहती है कि ट्रस्ट की बैठक में अंतरिम रिपोर्ट के आधार पर इस्तीफा मांगा गया या सख्ती से सुझाव दिया गया. दोनों ने इसे फौरन मान लेने में ही गनीमत समझी.

अब रही बात नैतिकता की तो ये तो डीएनए की तरह हमेशा रहती है. नैतिकता कोई सपना तो गई नहीं कि परसों रात नहीं आया. बीती रात आ गया. ये तो स्वभाव में है. तो इस पूरे प्रकरण में सवालों के घेरे में यही है कि इस चंदा चोरी की जड़ में क्या है- प्रभाव, अभाव या दबाव? और उससे भी बड़ा सवाल ये कि ये सब है तो किस-किस का?

मामले की जांच से जुड़े सूत्र तो ये भी बताते हैं कि जांच जब पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से गहराई तक जाए तो आश्चर्य नहीं कि लूटपाट, गबन, धोखाधड़ी और अमानत में खयानत की रकम पचासों करोड़ पार कर जाए. क्योंकि इन शातिरों के कारनामों की संभावनाएं अनंत हैं.

नए-नए 'रामनामी'

चढ़ावा चोरी प्रकरण में ऐसा नहीं है क‍ि सब कुछ निगेटिव ही हुआ है. पॉजिटिव पहलू ये है क‍ि राम मंद‍िर को 'आस्‍थावानों' की नई फौज म‍िल गई है. ये वो फौज है जो राम मंद‍िर न‍िर्माण के समय से ही इसे भाजपा का उपक्रम बताकर इससे जुड़ी हर चर्चा से क‍िनारा करती रही. 'मंद‍िर पॉल‍िट‍िक्‍स' का ये भी एक द‍िलचस्‍प पहलू है क‍ि जो नेता अब तक राम मंद‍िर को भाजपा का मंद‍िर कहकर अयोध्‍या नहीं गए, वे अचानक हिंदू आस्‍था के रक्षक बन गए. सोशल मीड‍िया पर ये रोज मंद‍िर के नाम पर अपनी आस्‍था का मत्‍था टेक रहे हैं. योगी आद‍ित्‍यनाथ इन्‍हीं पर पलटवार करते हुए कह रहे हैं- 'अब ये हमें आस्‍था स‍िखाएंगे?' 

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अग्‍न‍ि-परीक्षा

भाजपा और उससे जुड़े संगठनों को यह पूरा हक है क‍ि वे अपने राजनीत‍िक व‍िरोध‍ियों पर हमला करें. हो सकता है क‍ि कुछ नास्‍त‍िक भी मंद‍िर में हुए घोटाले पर क्रोध जताएं. कुछ लोगों के ल‍िए ये आपदा में चुनावी अवसर है. तो कुछ के ल‍िए जलती में अपना ईंधन डालने का मौका. लेक‍िन, योगी सरकार के ल‍िए चुनौती दोहरी है. एक तरफ उन्‍हें राम मंद‍िर से जुड़ी अपनी राजनीत‍िक साख बचानी है. तो दूसरी ओर उसे आम श्रद्धालु का व‍िश्‍वास दोबारा हास‍िल करना है, जो मंद‍िर में आकर दस रुपया चढ़ता है. ज‍िसके भीतर अब ये शंका होगी क‍ि रामजी के प्रत‍ि द‍िया गया मेरा ये दस रुपए का नोट पता नहीं क‍िसकी जेब में चला जाएगा. सरकार और जांच एजें‍स‍ियों के ल‍िए चढ़ावा चोरों और उनके स‍िस्‍टम को बेनकाब करना क‍िसीअग्‍न‍िपरीक्षा से कम नहीं होगा. क्‍योंक‍ि, सवाल श्रद्धालुओं के 'ट्रस्‍ट' का है, क्‍योंक‍ि भरोसा मंद‍िर के 'ट्रस्‍ट' ने तोड़ा है.

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