दिल्ली के ब्रिक्स बिजनेस फोरम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान का हाथ थामे चलते दिखे. साथ में व्लादिमीर पुतिन और सिरिल रामाफोसा भी थे. तस्वीर इसलिए चर्चित हुई कि पश्चिम एशिया तनाव में है, अमेरिका ने ईरान पर नए आर्थिक दबाव बढ़ाए हैं, तेल सौ डॉलर के पार गया है और होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकाबंदी की आशंका व्यापार को डरा रही है. ऐसे समय हाथ थामना शिष्टाचार भर नहीं, दुनिया को संकेत भी हो सकता है. पेजेश्कियान राष्ट्रपति बनने के बाद पहली बार भारत आए. 31 अगस्त को बिश्केक में एससीओ के दौरान दोनों की मुलाकात हुई थी. दो सप्ताह से भी कम समय में दूसरी द्विपक्षीय बैठक साफ कहती है कि नई दिल्ली तेहरान के साथ कुछ अलग रिश्ता चाहता है.
भारत की स्थिति जटिल है. इजरायल के साथ रक्षा, खुफिया और तकनीक के रिश्ते गहरे हैं. अमेरिका के साथ व्यापार, तकनीक और हिंद-प्रशांत साझेदारी रणनीतिक प्राथमिकता है. साथ ही ईरान चाबहार, मध्य एशिया से कनेक्टिविटी और ऊर्जा का पुराना साझेदार रहा है. रूस सस्ता तेल और रक्षा उपकरण देता है. इन चारों को एक शिविर में बैठाना असंभव है. इसलिए भारत बैलेंस पर जोर देता है.संतुलन का अर्थ सबको खुश रखना नहीं, बल्कि अपने हितों को अलग रखना है. मोदी-पेजेश्कियान वार्ता में पश्चिम एशिया की स्थिति, व्यापार बढ़ाने, नागरिकों-जहाजों की सुरक्षा और संवाद से युद्ध रोकने की भाषा यही दिखाती है.
सीधे सीधे शब्दों में कहें तो खाड़ी से आने वाला तेल और गैस भारतीय अर्थव्यवस्था की रोजमर्रा की जरूरत है. होर्मुज जलडमरूमध्य अस्थिर हुआ तो दाम और नाविक दोनों संकट में पड़ते हैं. ईरान उस जलमार्ग का किनारा है. बातचीत खुली रखना इसलिए जरूरी है कि मार्ग बंद न हो, नागरिक जहाज न फंसें. पुराना कच्चा तेल व्यापार प्रतिबंधों के बाद घट चुका है, फिर भी संपर्क का मतलब ऊर्जा सौदा भर नहीं, संकट में पुल बनना है.
यह भी पढ़ें: 'ब्रिक्स भारत के लिए ग्लोबल साउथ की आवाज बनाने का मौका', बोले अमेरिकी एक्सपर्ट कुगेलमैन
ईरान चाहता है कि भारत पश्चिमी दबाव के विरुद्ध पुल बने. पेजेश्कियान पहले भी कह चुके हैं कि भारत के संपर्क युद्ध से बातचीत की ओर मोड़ सकते हैं. ब्रिक्स मंच पर वे डॉलर निर्भरता घटाने और राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार की बात कर रहे हैं. भारत इनमें से कुछ आर्थिक सुझाव सुन सकता है, पर वह पश्चिम-विरोधी गुट का प्रवक्ता नहीं बनेगा. चाबहार भारत के लिए अफगानिस्तान-मध्य एशिया का द्वार है, पाकिस्तान के विकल्प का हिस्सा है. इसे पूरी तरह त्यागना रणनीतिक आत्महत्या के करीब होगा. इसलिए हाथ थामने और गले मिलने के बावजूद समझौतों की भाषा सावधानी भरी रहती है.
इजरायल-अमेरिका वाला पहलू इससे कटकर नहीं देखा जा सकता. भारत ने हमास के आतंक की निंदा की है, इजरायल के सुरक्षा अधिकार को स्वीकार किया है, और साथ ही गाजा में नागरिक क्षति पर चिंता जताई है. ईरान के साथ सभ्य तरीके से मिलने जुलने का मतलब यह कतई नहीं है कि वह इजरायल से नाता तोड़ रहा है उसे कमतर समझ रहा है. दरअसल भारत किसी की शत्रु-सूची को अपना नहीं बनाएगा. ऊर्जा सुरक्षा भारत के लिए निर्णायक है. संतुलन की सीमाएं भी साफ हैं. जब संघर्ष तीखा होगा, बैठकें प्रतीकात्मक लगने लगेंगी. भारत न तेहरान की मिसाइल नीति लिख सकता है, न वाशिंगटन की प्रतिबंध सूची मिटा सकता है. वह ज्यादा से ज्यादा संचार का माध्यम और ऊर्जा हितों का रक्षक रह सकता है. ब्रिक्स स्वयं एकमत नहीं है. ईरान समूह को पश्चिमी एकतरफापन का जवाब बनाना चाहता है. भारत समूह को विकास, व्यापार और बहुपक्षीय मंच रखना चाहता है. हाथ पकड़कर चलना उस मतभेद को ढकता है, मिटाता नहीं है.
यह भी पढ़ें: ब्रिक्स समिट को लेकर दिल्ली पुलिस की ट्रैफिक एडवाइजरी, आज बंद रहेंगे कई रास्ते, डायवर्जन लागू
फिर भी दो सप्ताह में दो मुलाकातें व्यर्थ नहीं हैं. वे बताती हैं कि भारत ध्रुवीकृत दुनिया में किसी का पिछलग्गू बनकर नहीं रहेगा. पुरानी गुटनिरपेक्षता की भावुकता अलग थी, आज की बहुध्रुवीय व्यवस्था में यह अलग तरीके की चुनौती है. इजरायल से ड्रोन, अमेरिका से तकनीक, रूस से तेल, ईरान से बंदरगाह आदि से थाली तभी संभलती है जब कोई मेहमान पूरी रसोई का मालिक न बन बैठे. पेजेश्कियान -मोदी की वायरल तस्वीर उसी थाली का विज्ञापन है. असली परीक्षा तस्वीर के बाद आएगी जब प्रतिबंध कड़े होंगे, जब जलमार्ग बंद होगा, और जब किसी पक्ष को भारत से स्पष्ट पक्ष मांगना पड़ेगा. तब हाथ थामना काफी नहीं होगा. तब नीति की स्पष्टता चाहिए होगी. शांति की अपील, अपने व्यापार की रक्षा, और किसी के युद्ध में औजार न बनना.
संयम श्रीवास्तव