राजधानी पटना का बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र, जो दशकों से भारतीय जनता पार्टी का अजेय किला माना जाता था, उपचुनाव नतीजों के बाद एक बड़े सियासी उलटफेर का गवाह बन चुका है. ये वो सीट थी, जहां बीजेपी के ट्रिपल-इंजन दांव पर थे. केंद्र और राज्य की एनडीए सरकारों के अलावा ये सीट बीजेपी संगठन के मुखिया नितिन नवीन के इस्तीफे से खाली हुई थी. लेकिन, वोटरों ने इनमें से किसी की तरफ ध्यान नहीं दिया. बांकीपुर में वोटों की गिनती के 32 राउंड हुए, लेकिन 30 में बीजेपी को पराजय हाथ लगी.
जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी बीजेपी उम्मीदवार नीरज कुमार को 19,324 वोटों के अंतर से हराया. पीके ने अपनी राजनीतिक पारी का पहला चुनाव जीतकर न सिर्फ बांकीपुर पर पहली बार जन सुराज का परचम लहराया, बल्कि सत्ताधारी एनडीए के चुनावी गणित को भी पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है.
इसमें कोई शक नहीं कि प्रशांत किशोर की जमीनी पदयात्राएं, माइक्रो-लेवल बूथ मैनेजमेंट और युवाओं के बीच बनाई गई पैठ ने इस जीत की पटकथा लिखी. लेकिन इस चुनावी लड़ाई में खुद बीजेपी और एनडीए के फैसलों ने प्रशांत किशोर के रास्ते को सबसे ज्यादा आसान बनाया.
बांकीपुर में बीजेपी की हार के ये 5 सबसे बड़े कारण रहे, जिसने पार्टी के अभेद्य किले में सेंध लगा दी:
नीतीश कुमार का सीएम पद छोड़ना: बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार की छवि भले ही हाल के सालों में बदलती रही हो, लेकिन अति-पिछड़ा और महिला मतदाताओं के बीच उनका एक बड़ा और विश्वसनीय जनाधार हमेशा से बरकरार रहा. नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद एनडीए का परंपरागत सामाजिक संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया. नीतीश के चेहरे के बिना बांकीपुर के शहरी और तटस्थ मतदाताओं में वह भरोसा कायम नहीं रह सका, जो अब तक एनडीए को मिलता आया था.
सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना: सम्राट चौधरी को कमान सौंपने का दांव बीजेपी को भारी पड़ा. संगठन स्तर पर आक्रामक नेता माने जाने वाले सम्राट चौधरी की स्वीकार्यता बांकीपुर जैसे प्रबुद्ध, शहरी और मिडिल क्लास वोटरों में उस स्तर पर नहीं बन सकी. बीजेपी सम्राट चौधरी के पक्ष में वो नैरेटिव नहीं बना पाई कि क्यों उनकी सरकार को मजबूत करने के लिए एक विधायक और दिया जाए. ऐसे में बांकीपुर के मतदाताओं ने सम्राट चौधरी की सत्ता से सवाल पूछने वाले एक उम्मीदवार को अपना विधायक बना दिया.
भरत तिवारी एनकाउंटर कांड: आरा के बिलौटी गांव में हुए भरत तिवारी एनकाउंटर मामले ने चुनाव से ठीक पहले एनडीए सरकार की कानून-व्यवस्था के दावों की धज्जियां उड़ा दीं. सरेंडर के बावजूद पुलिस द्वारा गोली चलाने के आरोपों और फिर एसटीएफ जवान की गिरफ्तारी की खबरों ने सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए. इस घटना ने सवर्ण और प्रबुद्ध समाज के बड़े हिस्से को बीजेपी से बेहद नाराज कर दिया, जिसने वोटिंग के दिन अपनी नाराजगी ईवीएम के जरिए साफ जाहिर की.
रविशंकर प्रसाद का वो ‘बयान’: बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर की जीत केवल चुनावी गणित का परिणाम नहीं, बल्कि नैरेटिव की जंग में मिली बड़ी कामयाबी है. चुनाव प्रचार के दौरान जब बीजेपी सांसद रविशंकर प्रसाद के नाम से 'कुत्ते-बिल्ली' वाला कथित बयान उछला, तब भले ही उन्होंने ऐसा कोई बयान न दिया हो, लेकिन प्रशांत किशोर ने इसे बांकीपुर की जनता के 'स्वाभिमान' और बीजेपी के 'अहंकार' से जोड़कर आक्रामक माहौल बना दिया. दुनिया की सबसे बड़ी चुनावी मशीनरी कही जाने वाली बीजेपी की सबसे बड़ी नाकामी यह रही कि अति-आत्मविश्वास के कारण वह समय रहते प्रशांत किशोर के इस नैरेटिव को बेअसर नहीं कर पाई.
सत्ता और मुख्य विपक्ष से जनता का मोहभंग: बांकीपुर का शहरी मतदाता लंबे समय से बीजेपी और आरजेडी दोनों के घिसे-पिटे ढर्रे से तंग आ चुका था. एक तरफ बीजेपी का वर्षों का एकतरफा राज था जिससे बदलाव की अकुलाहट थी, तो दूसरी तरफ आरजेडी के पुराने दौर का डर. जब जनता को प्रशांत किशोर के रूप में एक पढ़ा-लिखा, नया और विकल्प देने वाला मुख्य चेहरा दिखा, तो उसने एनडीए के प्रति अपना असंतोष जताने के लिए जन सुराज को चुना.
हार की सबसे बड़ी वजह कौन-सी रही?
बीजेपी की हार की सबसे मुख्य और निर्णायक वजह सत्ता और पारंपरिक विपक्ष दोनों से उपजी 'जन-निराशा' रही. वैसे, बांकीपुर में बीजेपी और नीतीश कुमार का एक परंपरागत वोट बैंक है. माना जाता रहा है कि यहां लालू राज के बाद से लोगों का आरजेडी से ऐसा मोहभंग हुआ कि उन्होंने सपने में भी लालटेन को जलते हुए नहीं देखा. लेकिन, नौ महीने में जिस तरह बिहार में सत्ताधारी एनडीए की सियासत ने करवट ली है, बांकीपुर का वोटर उससे तंग आ गया. सम्राट चौधरी को सीएम बने अभी छह महीने ही हुए हैं, ऐसे में इतनी जल्दी उनका नीतीश कुमार के बराबर कद हो पाना मुश्किल रहा. और इसी उदासीनता का प्रशांत किशोर ने जमकर फायदा उठाया. वे ऐसा विकल्प बनकर उभरे जिसकी बीजेपी और आरजेडी से समान दूरी है. बांकीपुर ने एक गंभीर, तीसरे विकल्प को चुना है. अब चिंतन बीजेपी को करना है कि वह वोटरों की प्राथमिकता सूची में दूसरे नंबर पर कैसे आ गई.
धीरेंद्र राय