बहुमत का बोझ... तारिक रहमान को मिला बांग्लादेश का ताज, साथ में भारी-भरकम चुनौतियां

तारिक रहमान 18 साल निर्वासित रहने के बाद दो महीने पहले ही बांग्लादेश लौटे. फिर कुछ ही दिनों बाद उनकी मां और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया ने अंतिम सांस ली. करीब एक महीने से ज्यादा का भावुक इलेक्शन कैंपेन. जिसके नतीजे में अब उन्हें मिला है प्रचंड बहुमत. तारिक रहमान की जिंदगी में सबकुछ बहुत जल्दी हो रहा है. उन्हें उनके सामने खड़ी चुनौतियों का भी अंदाजा होगा ही.

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तारिक रहमान के सिर पर होगा कांटों भरा ताज. तारिक रहमान के सिर पर होगा कांटों भरा ताज.

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 13 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 10:26 PM IST

बांग्लादेश की राजनीति में अगर तारिक रहमान दो तिहाई बहुमत लेकर भी सत्ता में आते हैं, तो पहली नजर में तस्वीर साफ दिखती है. भारी जनादेश. मजबूत सरकार. निर्णायक नेतृत्व. लेकिन जमीन की हकीकत इतनी सीधी नहीं है. बहुमत कागज पर ताकत देता है. बांग्लादेश में सत्ता संभालना और टिके रहना अलग बात होगी.

रहमान की पार्टी बांग्लादेश नशनलिस्ट पार्टी को चुनाव में 299 में से 212 सीटों पर जीत मिली है. जबकि यही बीएनपी लंबे समय से विपक्ष की राजनीति करती रही है. सड़कों पर आंदोलन. चुनावी बहिष्कार. सत्ता के खिलाफ तीखी बयानबाजी. अब अगर वही पार्टी सत्ता में आती है, तो उसे सिस्टम चलाना होगा. और यहीं से असली चुनौतियां शुरू होती हैं.

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सबसे पहले घरेलू राजनीति की फाल्ट लाइंस. बांग्लादेश दशकों से दो खेमों में बंटा है. एक तरफ अवामी लीग. दूसरी तरफ बीएनपी. यह सिर्फ राजनीतिक बंटवारा नहीं है. यह विचारधारा, इतिहास और पहचान को लेकर भी खींचतान है. 1971 की विरासत पर दोनों का नजरिया अलग है. प्रशासनिक ढांचे में अवामी लीग का असर गहरा रहा है. मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के दौर में अवामी लीग से जमकर बदला लिया गया. यूं कहें कि हिसाब चुकाया गया. लीग से जुड़े नेताओं और समर्थकों को निशाना बनाया गया. मुजीबुर्रहमान का घर खंडहर कर दिया गया. कोई कसर नहीं छोड़ी. लेकिन, क्या तारिक रहमान भी तल्खी को आगे बढ़ाएंगे? बांग्लादेश में अब भी अवामी लीग का एक बड़ा समर्थक वर्ग है, जिसने चुनाव में जमात के बजाय बीएनपी को ही वोट दिया है. अब बारी रहमान की हैं कि वे उन समर्थकों को अहसास कराएं कि वे हारे नहीं हैं. अवामी लीग का कैडर नेटवर्क मजबूत है. अगर वे सड़क पर उतरते हैं, तो टकराव बढ़ेगा. रहमान को समावेशी राजनीति दिखानी होगी. बदले की नहीं.

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दूसरा बड़ा सवाल मजहबी कट्टरपंथ का है. बीएनपी का इतिहास बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन का रहा है. जमात पर 1971 के युद्ध अपराधों के आरोप लगे. उसके कई नेताओं को सजा हुई. अवामी लीग ने खुद को सेक्युलर ताकत के रूप में पेश किया. बीएनपी पर अक्सर आरोप लगा कि उसने इस्लामी ताकतों को राजनीतिक जगह दी. रहमान अब सत्ता में आए हैं, तो उन्हें तय करना होगा कि वे कट्टर ताकतों से दूरी रखेंगे या समझौता करेंगे. दूरी रखते हैं तो उनका पुराना वोट बैंक नाराज होगा. पास जाते हैं तो अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ेगा. दोनों रास्ते जोखिम भरे हैं. लेकिन, रहमान के सामने सिर्फ राजनीतिक हित साधने की ही चुनौती नहीं है, उन्हें बांग्लादेश के अल्पसंख्यक हिंदुओं का भी ख्याल रखना है. जिनको लेकर कट्टरपंथी अपने दांत पीस रहे हैं.

तीसरा मोर्चा सेना और पुलिस से तालमेल का है. बांग्लादेश का इतिहास सैन्य हस्तक्षेप से अछूता नहीं रहा. 1975 के बाद कई बार सेना ने सीधे या परोक्ष रूप से सत्ता में भूमिका निभाई. भले आज लोकतांत्रिक ढांचा मजबूत दिखे, लेकिन सेना का प्रभाव अब भी अहम है. शेख हसीना इसे बखूबी जानती थीं. इसलिए शासन में अपने अंतिम लम्हे तक उन्होंने इस संतुलन का साधकर रखा. अगर सरकार और सेना के बीच रहमान के शासन को लेकर भरोसे की कमी हुई, तो अस्थिरता का खतरा रहेगा. दो तिहाई बहुमत संसद में काम आता है. बैरक में नहीं.

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चौथा बड़ा सवाल भारत से रिश्तों का है. पिछले डेढ़ दशक में ढाका और नई दिल्ली के रिश्ते बेहतर हुए. सीमा समझौते हुए. सुरक्षा सहयोग बढ़ा. उग्रवाद पर समन्वय हुआ. लेकिन बीएनपी की छवि भारत के प्रति सख्त रही है. रहमान को संतुलन साधना होगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसकी पहल कर चुके हैं. चाहे वो  रहमान की मां खालिदा जिया के स्वास्थ्य संबंधी ट्वीट हो या उनके निधन पर विदेश मंत्री जयशंकर को ढाका भेजने की. भारत ने दोस्ती का हाथ बढ़ाया है. चुनाव नतीजे के तुरंत बाद पीएम मोदी ने रहमान को शुभकामना दी, और दोपहर में फोन पर बात भी की. अगर रहमान घरेलू राजनीति के लिए भारत विरोधी रुख अपनाते हैं, तो व्यापार, बॉर्डर मैनेजमेंट और क्षेत्रीय सहयोग पर असर पड़ेगा. अगर वे रिश्ते सुधारते हैं, तो कट्टर समर्थक सवाल उठाएंगे. यह रस्साकशी आसान नहीं होगी.

पांचवां मोर्चा बेरोजगारी और आर्थिक संकट का है. बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था ने पिछले वर्षों में तेज विकास दर देखी. पर अब चुनौतियां बढ़ी हैं. विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव है. महंगाई बढ़ी है. रेडीमेड गारमेंट सेक्टर पर निर्भरता ज्यादा है. वैश्विक बाजार में गिरावट आती है तो सीधा असर पड़ता है. युवा आबादी बड़ी है. हर साल लाखों नए लोग नौकरी बाजार में आते हैं. अगर रोजगार नहीं मिला तो वही युवा सड़क पर उतरेंगे. बहुमत उनकी नाराजगी नहीं रोक सकता.

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छठा संकट खुद तारिक रहमान की पहचान का है. वे लंबे समय तक देश से बाहर रहे. उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे. कानूनी मामलों की छाया रही. आलोचक कहते हैं कि वे जमीनी नेता से ज्यादा पारिवारिक विरासत के वारिस हैं. उनकी मां खालिदा जिया के दौर की राजनीति अलग थी. आज का बांग्लादेश ज्यादा डिजिटल है. ज्यादा जागरूक है. युवा वोटर सवाल पूछता है. तारिक को यह साबित करना होगा कि वे सिर्फ अतीत की विरासत नहीं, भविष्य का विजन भी हैं.

दो तिहाई बहुमत का एक और खतरा होता है. अति आत्मविश्वास. जब विपक्ष कमजोर हो, तो सरकार के भीतर ही गुटबाजी बढ़ती है. पावर कॉरिडोर में मंत्री पद पाने से लेकर तमाम मुद्दों पर असंतोष पनपते हैं. बीएनपी लंबे समय तक सत्ता से बाहर रही है. सत्ता में आते ही कई दावेदार सामने आएंगे. संतुलन बिगड़ा तो अंदरूनी कलह शुरू होगी. तारिक के सामने एक बड़ा सवाल अपने कुनबे को एक रखने का भी होगा.

मीडिया और सिविल सोसाइटी भी एक फैक्टर है. बांग्लादेश में हाल के वर्षों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बहस रही है. मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के दौर में दुनिया ने देखा कि उपद्रवियों ने कैसे दो बड़े मीडिया हाऊस को आग के हवाले कर दिया गया. अगर नई सरकार भी आलोचना को दबाने का रास्ता चुनती है, तो अंतरराष्ट्रीय मंच पर छवि खराब होगी. पश्चिमी देश पहले ही लोकतांत्रिक मानकों पर नजर रखते हैं. आर्थिक सहायता और व्यापार समझौतों पर इसका असर पड़ सकता है.

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विदेश नीति का संतुलन भी चुनौती है. चीन बुनियादी ढांचे में बड़ा निवेशक है. भारत सुरक्षा साझेदार है. अमेरिका लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर जोर देता है. खाड़ी देश श्रमिकों के लिए अहम हैं. शेख हसीना के निर्वासन और यूनुस के सत्ता संभालने के बाद बांग्लादेश की सियासत में पाकिस्तान की भी एंट्री हो गई है. बांग्लादेश का पाकिस्तान से कोई हित नहीं सधता, सिवाय भारत विरोधी जिओपॉलिटिक्स के. लेकिन, अब तारिक को फैसला करना होगा कि वे कौन सा रास्ता चुनते हैं. उनके नारे में तो वे बांग्लादेश को प्राथमिकता देने के लिए ‘न पिंडी से, न दिल्ली से...’ का नारा देते रहे. यानी, ना पाकिस्तान से और न भारत से वे संचालित होंगे. फिर भी उन्हें यह तो तय करना ही होगा कि उनका रणनीतिक दोस्त कौन और कैसा हो. एक गलत संकेत से कई मोर्चे खुल सकते हैं. बहुमत विदेश नीति का कवच नहीं बनता.

और अंत में रहमान के सामने रेफरेंडम का नतीजा एक बड़ी चुनौती लेकर आया है. जनमत संग्रह में 60 फीसदी वोटरों ने बांग्लादेश के संसदीय और संवैधानिक ढांचे को बदलने के पक्ष में वोट दिया है. इस पूरे रिफार्म के लिए एक हाई पावर कमेटी बननी है, जो बांग्लादेश में दो स्तरीय संसदीय प्रणाली की नींव रखेगी. जैसा कि भारत में लोकसभा और राज्य सभा है. प्रधानमंत्री के अधिकार कम किए जाएंगे. नए संविधान में जुलाई रिवॉल्यूशन चार्टर को शामिल किया जाएगा. यानी, युवाओं की भागीदारी बढ़ेगी. रहमान को इन तमाम बदलावों के साथ पटरी बैठानी होगी. फिर ये बदलाव उनकी पसंद के हों, या नापसंद के.

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ऐसे में अब सवाल यह नहीं है कि रहमान के पास दो तिहाई बहुमत है या नहीं. सवाल यह है कि क्या तारिक पर भरोसा कायम रहेगा? क्या बांग्लादेश के संस्थानों का उन्हें समर्थन मिलेगा? क्या अर्थव्यवस्था संभलेगी? क्या कट्टरपंथ पर लगाम लगेगी? क्या पड़ोसी देशों से संतुलन कायम होगा? अगर इन मोर्चों पर कमजोरी रही, तो भारी बहुमत भी कागजी साबित हो सकता है. तारिक रहमान के सामने राह लंबी है. चुनौती कई हैं. संसद में ताकत मिल सकती है. लेकिन जमीन पर ताकत कमानी पड़ती है. और वही असली परीक्षा होगी.

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