नाना पाटेकर की आख़िर ख़्वाहिश क्या थी? - STORYBOX WITH JAMSHED

नाना पाटेकर ने न कभी कोई एक्टिंग स्कूल जॉइन किया और न ही किसी को एक्टिंग का गुरु बनाया. उन्होंने ज़िंदगी की धूप में तपकर असल ज़िंदगी के एहसास को जी कर सुख और दुख को समझा, उसी के हिसाब से एक्टिंग की. नाना पाटेकर ने हर बार किरदार की बारीकियां अपनी एक्टिंग में उतारकर दुनिया को चौंका दिया. चाहे वो क्रांतिवीर हो, वजूद हो, परिंदा हो, वेलकम हो या अब तक छप्पन - हर बार उन्होंने दर्शकों को अपने काम से चौंका दिया. फ़िल्मों के अलावा नाना पाटेकर असल ज़िंदगी में भी एक बेहतरीन इंसान थे. गांव की ज़िंदगी उन्हें पसंद थी और वो हमेशा उसी माहौल में जीना चाहते थे. आज नाना पाटेकर हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी यादें हैं और कुछ सुने-अनसुने क़िस्से हैं जिन्हें स्टोरीबॉक्स के इस खास एपिसोड में याद कर रहे हैं जमशेद क़मर सिद्दीक़ी.

Advertisement

जमशेद क़मर सिद्दीक़ी

  • नोएडा,
  • 10 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 6:30 PM IST

मुझे मेरी ज़िंदगी में दो उस्ताद रहे... उन दोनों ने मुझे सबसे ज़्यादा सिखाया – एक थी भूख, औऱ एक अपमान.... ये कोई लिटरेरी लिटरेरी मेटाफर नहीं है... ये एक आदमी की ज़िंदगी का अनुभव है... वो कहता था कि भूख के बाद के निवाले ने उसी ज़िंदगी की कीमत समझाई.... और अपमान ने बताया कि आत्मसम्मान क्या है... वो शख्स जिसने ज़िंदगी में सब कुछ पा लेने के बाद भी... गरीबी के कड़वे और अंधेरे दिनों को भुलाया नहीं, उन्हें याद रखा। और सिर्फ यूं ही कहने को नहीं, उसे मिठाई बहुत पसंद थी... लेकिन उन दिनों में उसे कभी मिठाई नसीब नहीं हुई... .जब वो बड़ा आदमी बन गया... उसने फैसला किया मैं अब भी मिठाई नहीं खाऊंगा... ताकि मुझे याद रहे कि मनपसंद चीज़ सामने होने के बाद भी उसे ना पा पाना कैसा होता है....वो इंसान जिसने मौत से पहले अपने लिये 12 मन सूखी लकड़ियां खुध इक्ट्ठा करके रखी थीं... कि कहीं उसकी मौत के बाद लोग उसका अंतिम संस्कार गीली लकड़ी में न कर दें... कि उससे धुआं उठे और आसपास खड़े लोगों की आंखों में धुएं से आंसू आ जाएं... और कोई समझ ले कि ये आंसू मरने वाली की याद में है... वो कहता था मुझे मरते हुए गलतफ़हमी नहीं चाहिए.... ये कहानी है ज़िंदगी के तकलीफों से सीखने वाले उस एक्टर की जिसे किसी एक्टिंग स्कूल की ज़रूरत नहीं पड़ी... ये कहानी है विश्वनाथ गजानन पाटेकर या नाना पाटेकर की...

Advertisement

इसी कहानी को YOUTUBE पर देखने के लिए नीचे क्लिक करें -

-     बता ये हिंदू का खून है, ये मुसलमान का खून... बता इसमें से हिंदू का कौन सा है औऱ मुसलमना का कौन सा....

-     मैं क्यों समझा रहा हूं तुम लोगों को... कुछ नहीं कहना मुझे तुमसे... जैसे जीना चाहते हो जियो

स्क्रीन पर सांस के अवरोह को तोड़कर बिना रुके चीखता हुए एक्टर जब गुस्से में बोलता था तो लोग थमकर उसे देखते थे... नाना पाटेकर को गुस्सा क्यों आता था? एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि ये गुस्सा शायद उस बर्ताव के लिए है जो मेरे साथ बचपन में लोगों ने किया” उनके किरदारों का गुस्सा और बेचैनी सिर्फ मुकालमों में नहीं, उनकी आंखों और बॉडी लेंगवेज में भी भी थी... 'अंकुश' में बेरोजगार नौजवान, सिस्टम के खिलाफ और सोशल इनजस्टिस से जूझता हुआ... अपने अंदर के गुस्से को अपने बर्ताव में फतार देता था... ये गुस्सा उसी 13-14 साल के बच्चे का था...

Advertisement

साल था 1964 के आसपास का... मुबंई में तेरह-चौदह साल का लड़का जिसका नाम था विश्वनाथ... वो बड़- बड़े फिल्मी पोस्टरों को रंग रहा था... किसी हीरो का चेहरा बना रहा था... दरअसल उसके पिता का टेक्सटाइल पेंटिंग का छोटा सा बिज़नेस था.... पहले सबकुछ अच्छा था... ठीक ठाक आमदनी थी, इज़्ज़त से गुज़ारे भर का होता था लेकिन फिर एक दिन नाना पाटेकर के पिता को किसी ने कारोबार में फ्रॉड कर दिया... और उस दिन सब कुछ बदल गया... घर गया... कारोबार गया... प्रॉपर्टी बिक गयी... 13 साल के नाना पाटेकर जो तब विश्वनाथ थे... सड़क पर आ गए... हालांकि उन्होंने पढ़ाई नहीं छोड़ी... वो सुबह स्कूल जाते, शाम में फिल्म के पोस्टर पेंट करते। जहां पेंट करते थे, वहां से घर की दूरी 8 किलोमीटर थी। इस तरह दिन में 16 किलोमीटर की दूरी पैदल ही तय करते थे। इस काम के लिए हर महीने 35 रुपए मिलते थे। तब से लेकर अबतक नाना लगातार काम कर रहे थे... और बचपन की उन्हीं तलखियों को साथ लेकर शोहरत की सीढ़ियों पर चढ़ रहे थे।

इस शोहरत की शुरुआत हुई 1970 के दशक में विजय तेंदुलकर जो मशहूर मराठी नाटककार थे... उनका एक नाटक था 'पाहिजे जातीचे' उसमें ये एक्टिंग कर रहे थे... और वहीं एक डायरेक्टर थे

Advertisement

जब्बार पटेल जिन्होंने इन्हें देखा... और बहुत इंप्रैस हुए... ये पहली बार था जब नाना पाटेकर किसी की नज़र में आए थे... पटेल उनती एक्टिंग से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उसे अपनी फिल्म में काम करने का मौका दिया। फिर साल आया 1978 फिल्म थी 'गमन'। सिनेमा के पोस्टर रंगने वाला वह लड़का अब खुद कैमरे के सामने था।

हालांकि नाना पाटेकर की कहानी रातों-रात स्टार बनने की कहानी नहीं है। उन्हें अपनी पहचान बनाने में वक्त लगा। फिर 'सलाम बॉम्बे’… 'परिंदा' और 'क्रांतिवीर' जैसी फिल्में आईं। 'परिंदा' के लिए उन्हें नैशनल अवार्ड मिला और 'क्रांतिवीर' के लिए बेस्ट एक्टर नैशनल अवार्ड मिला...

नाना की सबसे बड़ी खूबी यही थी कि उन्होंने अपने आपको किसी एक खाने में बंद नहीं होने दिया। जिस चेहरे में 'परिंदा' का अंधेरा था, उसी चेहरे में 'वेलकम' का उदय शेट्टी भी था। कंट्रोल उदस कंट्रोल..... जिस आवाज़ में 'क्रांतिवीर' का गुस्सा था... कि आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने.... उसी आवाज़ में वजूद का कॉमेडी का टाइमिंग भी था। तो नाना पाटेकर की कहानी को अगर एक लाइन में कहें तो शायद वह यह है कि उन्होंने अपनी एक्टिंग की परफॉरमेंस से ज़ियादा किरदार के लिए ईमानदारी बरती।

और कभी भी कीमत के लिए समझौता नहीं किया... जैसे.. एक बार का किस्सा है कि स्मिता पाटिल से नाना पाटेकर की जान पहचान थी... स्मिता पाटिल ने कहा कि भई रवि चोपड़ा एक फिल्म बना रहे हैं “आज की आवाज़” वो उसी ज़माने के बेरोज़गारी वगैरह के इशूज़ पर बेस्ड थी फिल्म... तो ये चले गए... रवि साहब से मिले। रवि ने उन्हें देखा और उन्हें एक रोल ऑफर किया... जो सुनकर भड़क उठे। औऱ सबके सामने रवि को गालियां दीं। ये रोल एक रेपिस्ट का था... देखिए बड़ा आदमी वो होता है जो मुश्किल वक्त में टूटता है... जब आप मज़े में है... आराम से है.. तब आप किसी नगवार बात से इंकार कर दें तो क्या बड़ी बात है... बड़ी बात है जब आप परेशानी के आलम में हों ... काम न हो... जेब खाली हो, पेट में भूख पल रही हो... दूर तक कोई उम्मीद न दिखे... तब आप एक ऐसे काम से इंकार करें जो आपको लगे कि आपके मयार का नहीं ... तब आपका मयार तय होता है... नाना ने ज़िंगदी मुश्किल से मुश्किल वक्त में अपने एक्टिंग की जो गरिमा बचा कर ईमानदारी से काम किया... वो एक नज़ीर है।

Advertisement

•     2023 में नाना पाटेकर ने एक इंटरव्यू में बड़ी अजीब कही थी... एक इंटरव्यूअर ने उनसे पूछा था कि आप क्या चाहते हैं कि आपके जाने के बाद ये दुनिया आपको कैसे याद रखे... तो नाना ने कहा था कि मैं चाहता हूं कि मेरी तस्वीर कहीं न लगे... मैं भुला दिया जाऊं... ऐसे जैसे कभी था ही नहीं... सबकी यादों से मिट जाना... ऐसा है जैसे मैं वही चला जाऊं जहां से आया था... जब मुझे कोई नहीं जानता था... मेरा कोई नाम नहीं था। उन्होंने कहा कि मुझे लगता है यही सच्चाई भी है। हम मर जाते हैं,  हमें कोई याद नहीं रखता। 2-4 दिन के बाद सब भूल जाते हैं.. तो हमने तो यह भी बोल दिया है कि मेरी तस्वीर भी तुम मत लगाओ। भूलो तो पूरी तरह भूल जाओ... जैसे मैं था ही नहीं।

 

नाना पाटेकर की मां निर्मला पाटेकर जिनकी मौत 2019 में हुई थी... उनके बारे में नाना कहते थे कि मुझे लगता है कि मेरी मां आज भी जिंदा है। जब मैं मर जाऊंगा तो यहां से निकलने के बाद उनसे मिलने आऊंगा। हम सात भाई-बहन थे... मुझे छोड़कर बाकी सब चले गए... मैं अकेला हूं...इसलिए मुझे लगता है कि मां, बाप, भाई, बहन कोई नहीं रहा तो मैं इस दुनिया का नहीं रहा। मेरे तो सभी वहीं हैं तो मैं हमेशा वहीं के बारे में सोचता हूं...

Advertisement

 

नाना न सिर्फ अच्छे एक्टर और इंसान थे बल्कि एक देशभक्त भी थे... 1999 में जब इंडिया पाकिस्तान का कारगिल जंग चल रही थी तो नाना ने सेना में कुछ अधिकारियों से बात की और कहा कि मैं भी जंग पर जाना चाहता हूं... उन्हें समझाया गया आप सिविलियन हैं, आप नहीं जा सकते। फिर नाना ने जार्ज फरनैनडिस से कहा (रक्षा मंत्री) उन्होंने जब देखा कि नाना वाकई जाना चाहते हैं तो उन्होंने नाना को भेजा... और 60 दिनों तक नाना कारगिल में क्विक रिएकेशन टीम का हिस्सा रहे। जब वो गए थे तो वज़न 76 किलो था, लेकिन लौटे तो 56 किलो थे।

नाना की एक्टिंग कमाल थी... इसमें तो कोई दो राय नहीं... परिंदा, क्रांतिवीर, प्रहार, तिरंगा, अब तक छप्पन, वेलकम... राजनीति... आप नाम लेते जाइये... एक से एक फिल्म हैं... लेकिन मुझे लगता है कि वो आदमी अपने काम से भी बड़ा आदमी था... वो जिसने अपने सगे भाई को 93 बम ब्लास्ट में खो दिया... वो एक बस में सफर कर रहे थे.. इतनी दर्दनाक मौत की सिर्फ हाथ मिला था.. और हाथ में पहना हुए कड़े से पहचान हो पाई थी...

सोचिए हम जिस चेहरे को फिल्मों में हसते हंसाते, चीखते देखते हैं.. हर वो आदमी बेशुमार तकलीफों से गुज़र रहा होता है... लेकिन आदमी वही है जो ऐसे हालात में भी डटा रहे... जैसे नाना डटे अपने आखिरी दिन तक... ज़िंदगी की सीख देते रहे और कभी किसी के आगे सर नहीं झुकाया...

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »