जिस पानी के भरोसे लोगों की जिंदगी चलती है, अब वही पानी लोगों को डराने लगा है. घरों में नल खुलते हैं तो लोग पानी भरने से पहले सोच रहे हैं. उत्तराखंड के नैनीताल जिले में ज्योलीकोट और आसपास के आधा दर्जन से ज्यादा गांवों में पीलिया और डायरिया के बढ़ते मामलों ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है. ज्योलीकोट, गांजा, सरियाताल समेत आसपास के गांवों में अब तक 100 से ज्यादा ग्रामीणों के बीमार होने की जानकारी है. इनमें कई मरीजों को नैनीताल और हल्द्वानी के अस्पतालों में इलाज के बाद बड़े अस्पतालों में रेफर किया गया. कुछ मरीजों का उपचार बरेली और दिल्ली तक में चल रहा है.
इस बीच दो लोगों की इलाज के दौरान मौत भी हो गई. बीमारी फैलने के बाद प्रभावित गांवों में स्वास्थ्य विभाग की टीमें पहुंच रही हैं और कैंप लगाकर लोगों की जांच की जा रही है. वहीं, ग्रामीण इस पूरे संकट के पीछे दूषित पेयजल को जिम्मेदार बता रहे हैं. स्थानीय लोगों के मुताबिक, शुरुआत में गांवों में लोगों को उल्टी-दस्त और कमजोरी जैसी शिकायतें हुईं. कई लोगों ने इसे सामान्य मौसमी बीमारी समझकर स्थानीय स्तर पर इलाज कराया. लेकिन जब मरीजों की संख्या बढ़ने लगी और जांच में पीलिया के मामले सामने आने लगे तो चिंता बढ़ गई. धीरे-धीरे एक के बाद एक गांव इसकी चपेट में आने लगे. बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक कई लोग बीमार हुए. जिन मरीजों की हालत ज्यादा बिगड़ी, उन्हें नैनीताल और हल्द्वानी के अस्पतालों में भर्ती कराया गया. कुछ मरीजों को बेहतर इलाज के लिए बरेली और दिल्ली तक ले जाना पड़ा. इलाज का सिलसिला चल ही रहा था कि दो मौतों की खबर सामने आई. इसके बाद ग्रामीणों के बीच बीमारी को लेकर डर और बढ़ गया.
क्षेत्र में 26 वर्षीय नीमा जोशी की इलाज के दौरान मौत होने की जानकारी सामने आई है. वहीं 16 वर्षीय किशोर जीना ने भी उपचार के दौरान दम तोड़ दिया. बताया जा रहा है कि एक किशोर की मौत दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में इलाज के दौरान हुई. इन मौतों के बाद प्रभावित गांवों में माहौल बेहद चिंताजनक है. जिन घरों में बीमारी से लोग जूझ रहे हैं, वहां परिवार के बाकी सदस्य भी डरे हुए हैं. ग्रामीणों को आशंका है कि अगर बीमारी के मूल कारण का जल्द पता नहीं लगाया गया तो आने वाले दिनों में स्थिति और बिगड़ सकती है.
ग्रामीणों ने पानी पर उठाए सवाल
बीमारी फैलने के बाद सबसे बड़ा सवाल पेयजल व्यवस्था को लेकर खड़ा हुआ है. ग्रामीणों का आरोप है कि इलाके के वाटर सप्लाई टैंक से जुड़े जलस्रोतों में दूषित पानी पहुंचा. स्थानीय लोगों ने आशंका जताई कि नैनीताल शहर की सीवर लाइन से निकलने वाला गंदा पानी किसी जलस्रोत में पहुंच रहा था. यही पानी आगे पेयजल आपूर्ति के जरिए गांवों तक पहुंचने की आशंका जताई जा रही है. हालांकि, यह अभी ग्रामीणों की ओर से लगाया गया आरोप और आशंका है. बीमारी का वास्तविक कारण क्या है और क्या दूषित पानी ही संक्रमण की वजह बना, इसकी पुष्टि वैज्ञानिक जांच के बाद ही हो सकेगी. फिलहाल जिस जलस्रोत में सीवर का पानी मिलने की आशंका जताई जा रही थी, उसे वाटर सप्लाई टैंक से अलग कर दिया गया है.
लोग पानी पीने से डर रहे हैं
स्थानीय निवासी कविता जोशी के मुताबिक, बीमारी के मामले बढ़ने के बाद ग्रामीणों में डर का माहौल है. कई परिवार पानी को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरत रहे हैं. ग्रामीणों का कहना है कि अगर पेयजल स्रोत ही सुरक्षित नहीं रहेगा तो बीमारी से बचना मुश्किल होगा. ब्लॉक प्रमुख हरीश बिष्ट ने भी मामले को गंभीर बताया है. इलाके में बड़ी संख्या में लोगों के बीमार पड़ने के बाद अब प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती संक्रमण की वजह का पता लगाना और उसे रोकना है.
घर-घर जांच की मांग
ग्रामीणों की मांग है कि केवल स्वास्थ्य कैंप लगाकर मामले को सीमित न रखा जाए. प्रभावित गांवों में घर-घर जाकर लोगों की स्वास्थ्य जांच की जाए. इसके साथ ही इलाके के सभी पेयजल स्रोतों और सप्लाई लाइन से पानी के नमूने लिए जाएं और उनकी तत्काल जांच कराई जाए. ग्रामीण यह भी चाहते हैं कि जिन परिवारों में मरीज हैं, उनकी नियमित निगरानी की जाए ताकि बीमारी के लक्षण बढ़ने पर समय रहते उन्हें अस्पताल पहुंचाया जा सके. सबसे ज्यादा चिंता बच्चों और बुजुर्गों को लेकर जताई जा रही है. बीमारी के बढ़ते खतरे को देखते हुए प्रशासन ने एहतियाती कदम भी उठाया है. ज्योलीकोट, गांजा और सरियाताल क्षेत्र के 10 स्कूलों और 5 आंगनबाड़ी केंद्रों को एक सप्ताह के लिए बंद कर दिया गया है. प्रशासन का यह फैसला खास तौर पर बच्चों को संक्रमण के संभावित खतरे से बचाने के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है. हालांकि स्कूल बंद होने से बीमारी खत्म नहीं होगी. जब तक संक्रमण के स्रोत का पता नहीं चलता और पेयजल व्यवस्था पूरी तरह सुरक्षित नहीं की जाती, तब तक खतरा बना रह सकता है.
लीला सिंह बिष्ट