नीदरलैंड के इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में भारत और पाकिस्तान चौथी बार आमने-सामने आए हैं. गुरुवार को इंटरनेशनल कोर्ट ने कुलभूषण जाधव की फांसी पर रोक लगाकर भारत के पक्ष में फैसला सुनाया तो पाकिस्तान तिलमिला उठा. यहां तक कि पाकिस्तान ने कोर्ट पर ही सवाल उठा दिए. लेकिन 1972 में जब इसी कोर्ट ने पाकिस्तान के हक में एक फैसला सुनाया था, तब वहां के तत्कालीन राष्ट्रपति ने कोर्ट की जमकर तारीफ की थी.
दरअसल 1971 में भारत ने अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन के अधिकार क्षेत्र के खिलाफ आईसीजे में एक मामला दायर किया था. पाकिस्तान ने इस संगठन में भारत की शिकायत की थी. इसमें संगठन ने पाकिस्तान का साथ दिया था. इसीलिए इस संगठन के खिलाफ भारत ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का रुख किया. लेकिन कोर्ट से भारत को निराशा हाथ लगी. क्योंकि 18 अगस्त 1972 को फैसला पाकिस्तान के पक्ष में गया था.
अंतरराष्ट्रीय कोर्ट का फैसला का जब पाकिस्तान के पक्ष में गया तो उसकी पाकिस्तान ने तारीफ की. पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो ने इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस की खूब वाहवाही की थी.
18 साल पहले 1999 में पाकिस्तान ने इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस का दरवाजा खटखटाया था. पाकिस्तान का आरोप था कि भारत ने जानबूझ कर पाकिस्तान के टोही विमान को मार गिराया. जबकि सच यह था कि 16 सैनिकों को ले जा रहा पाकिस्तान का विमान जासूसी के इरादे से भारत के कच्छ में घुस आया था.
पाकिस्तान के इस आरोप को कोर्ट की 15 जजों की फीठ ने 21 जून 2000 को बहुमत से खारिज कर दिया था. गुरुवार को भी इसी कोर्ट ने जाधव को जासूस बताने वाली पाकिस्तान की दलील को खारिज कर दिया.
1971, 1999 और 2017 के अलावा 1973 में भारत और पाकिस्तान का आमना-सामना इंटरनेशनल कोर्ट में हुआ. 1971 के युद्ध के बाद 1973 में पाकिस्तान भारत के खिलाफ आईसीजे पहुंचा. पाकिस्तान ने आरोप लगाया कि भारत 195 युद्ध बंदियों को बांग्लादेश शिफ्ट कर रहा है. जबकि उन्हें भारत में गिरफ्तार किया गया है. पाकिस्तान ने इसे गैरकानूनी बताया. दोनों देशों के बीच इस मसले पर कानूनी लड़ाई चली. लेकिन कोई फैसला आने से पहले ही दोनों देशों ने 1973 में न्यू दिल्ली एग्रीमेंट साइन कर लिया.
अब कोर्ट के फैसले से भारत को राहत की सांस मिली है. साथ ही राजनयिक मदद का अधिकारी मिलने से जाधव को वापस लाने की भारत की कोशिशों को और मजबूती मिलेगी.
पुण्य प्रसून वाजपेयी