'विजेता कप्तान का चुना हुआ अंपायर संदेह के घेरे में', CEC की नियुक्ति पर SC की अहम टिप्पणी

मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट के जज दीपांकर दत्ता ने अहम टिप्पणी की. उन्होंने क्रिकेट मैच का उदाहरण दिया और कहा कि अगर क्रिकेट मैच में अंपायर को एक टीम का कप्तान चुनता है और उसकी टीम जीत जाती है, तो भले ही उस अंपायर के फ़ैसले सही हों, उन पर शक की गुंजाइश बनी रहती है.

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जस्टिस दीपांकर दत्ता ने CEC की नियुक्ति पर अहम टिप्पणी की है. (File photo) जस्टिस दीपांकर दत्ता ने CEC की नियुक्ति पर अहम टिप्पणी की है. (File photo)

संजय शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 23 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 11:26 PM IST

मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान जस्टिस दीपांकर दत्ता ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को लेकर अहम टिप्पणी की है. उन्होंने क्रिकेट के अंपायर का उदाहरण देते हुए कहा कि अगर किसी क्रिकेट टीम का कप्तान ही अंपायर चुनता है और अंत में वही टीम जीत जाती है, तो अंपायर के फैसले सही होने के बावजूद उन पर संदेह की छाया बनी रह सकती है.

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उन्होंने कहा कि 'स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए एक सचमुच स्वतंत्र चुनाव आयोग का होना जरूरी है. चुनाव आयोग को सरकार (एग्जीक्यूटिव) के कंट्रोल से पूरी तरह अलग रखना चाहिए. चुनाव आयोग का सिर्फ स्वतंत्र दिखना ही काफी नहीं है; उसे असल में भी स्वतंत्र होना चाहिए.'

जस्टिस दत्ता ने अपनी राय देते हुए कहा कि 'पहली नजर में, 2023 का कानून चुनाव आयुक्तों के चयन के लिए स्वतंत्र प्रक्रिया सुनिश्चित करता हुआ नहीं दिखता.'

जस्टिस दत्ता ने CEC और EC को नियुक्त करने वाले 2023 के कानून पर सवाल उठाते हुए कहा कि प्रधानमंत्री की ओर से नामित किए गए मंत्री से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह प्रधानमंत्री की पसंद के खिलाफ काम करेगा. ऐसे में सिलेक्शन प्रोसेस में प्रधानमंत्री की पसंद ही हावी रहने की संभावना है.

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उन्होंने कहा कि सिलेक्शन कमिटी में कैबिनेट मंत्री को शामिल करने से एक स्वतंत्र मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति पक्की नहीं होती. एक निष्पक्ष चयनकर्ता की जगह मंत्री को लाने से सिलेक्शन प्रोसेस में जरूरी स्वतंत्र संतुलन नहीं बनता. अगर प्रधानमंत्री की पसंद ही निर्णायक रहती है, तो सिलेक्शन कमिटी में विपक्ष के नेता की मौजूदगी भी काफी हद तक सिर्फ एक औपचारिकता बनकर रह जाती है.

बता दें कि कानून के मुताबिक तीन सदस्यीय समिति में प्रधान मंत्री और लोकसभा में नेता विपक्ष के अलावा प्रधान मंत्री के मनोनीत मंत्री होते हैं. जबकि सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम व्यवस्था के तौर पर चयन समिति में तीसरे सदस्य के तौर पर सीजेआई को रखा गया था. संसद ने बहुमत से सीजेआई की बजाय प्रधानमंत्री के मनोनीत मंत्री को समिति में रखने पर मुहर लगाई. सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिकाओं में सरकार पर सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का आरोप लगाते हुए कार्रवाई करने की मांग की गई थी. 

स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव आयोग जरूरी: जस्टिस दत्ता

जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए एक स्वतंत्र चुनाव आयोग बुनियादी जरूरत है.

आजादी और निष्पक्षता के मुद्दे पर बात करते हुए जस्टिस दत्ता ने याचिकाकर्ताओं की दलीलों पर ध्यान दिया कि पैनल में किसी मंत्री को शामिल करने से सिलेक्शन कमिटी की संस्थागत निष्पक्षता खत्म हो जाती है. 

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सुनवाई के दौरान हुई चर्चा का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इस बात की बहुत कम संभावना है कि प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता के बीच मतभेद होने पर मंत्री प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ कोई स्टैंड लेंगे.

अपांयर पर शक की गुंजाइश बनी रहती है

उन्होंने कहा, "इस तर्क का सार यह है: यह कहना गलत नहीं होगा कि अगर क्रिकेट मैच में अंपायर को एक टीम का कप्तान चुनता है और उसकी टीम जीत जाती है, तो भले ही उस अंपायर के फ़ैसले सही हों, उन पर शक की गुंजाइश बनी रहती है, क्योंकि आख़िरकार अंपायर को जीतने वाले कप्तान ने ही चुना होता है,"

जस्टिस दत्ता की अध्यक्षता वाली इस बेंच में जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा भी शामिल थे. सुप्रीम कोर्ट को ये तय करना था कि मामले को बड़ी बेंच के पास भेजा जाए या नहीं. 

जस्टिस दीपांकर दत्ता ने अपने फैसले मे कहा कि ये मामला बड़ी पीठ या संविधान पीठ को नहीं भेजना चाहिए. इस पर फैसला दो जजों की पीठ कर सकती है.

जस्टिस शर्मा की राय जस्टिस दत्ता से अलग थी, उन्होंने इस मुद्दे को अहम बताते हुए याचिकाओं को बड़ी बेंच के पास भेजने का समर्थन किया. 

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