जब इंदिरा गांधी के ज्योतिषी ने तय की थी आम चुनाव की तारीख, इलेक्शन कमीशन के अनसुने किस्से!

भारत का चुनाव आयोग SIR से जुड़े खुलासों के बाद लगातार विपक्ष के निशाने पर हैं. लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब देश में आम चुनाव की तारीख चुनाव आयोग नहीं बल्कि ज्योतिषी करता था. लेकिन ये ज्योतिषी कोई साधारण ज्योतिषशास्त्री नहीं बल्कि प्रधानमंत्री का ज्योतिषी था. इंदिरा गांधी से जुड़ा यह किस्सा चुनाव आयोग और सत्ता के रिश्तों की एक दिलचस्प तस्वीर पेश करता है.

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1977 के चुनाव की घोषणा इंदिरा ने अचानक की थी. इनसैट में तत्कालीन चुनाव आयुक्त टी स्वामीनाथन. (Photo: ITG) 1977 के चुनाव की घोषणा इंदिरा ने अचानक की थी. इनसैट में तत्कालीन चुनाव आयुक्त टी स्वामीनाथन. (Photo: ITG)

पन्ना लाल

  • नई दिल्ली,
  • 30 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 4:14 PM IST

देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर कांग्रेस हमलावर है. कांग्रेस उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए उनके इस्तीफे की मांग कर रही है. कांग्रेस का आरोप है कि एसआईआर प्रक्रिया, मतदाता सूची से नाम हटाने और आयोग के आंतरिक फैसलों से ज्ञानेश कुमार ने सत्ता पक्ष को लाभ पहुंचाने का काम किया है. दो चुनाव आयुक्तों की ओर से उठाए गए कथित आपत्तियों को आधार बनाकर कांग्रेस आरोप लगा रही है कि चुनाव आयोग सरकार की कठपुतली बन गया है. 

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लेकिन जब हम इतिहास के पन्ने पलटते हैं, तो चुनाव आयोग और सरकारों की हैरान करने वाली कहानियां सामने आती हैं. 1977 का आम चुनाव याद करें. आपातकाल की काली छाया में जब नागरिक अधिकार कुचले जा रहे थे. तभी 18 जनवरी 1977 को आकाशवाणी पर पीएम इंदिरा गांधी का राष्ट्र के नाम संबोधन आता है. 

"...आइए हम इस संकल्प के साथ चुनाव में उतरें कि जनता की शक्ति को फिर से स्थापित करेंगे और भारत की उस अच्छी छवि को बनाए रखेंगे जो मेल-मिलाप, शांति और तरक्की के रास्ते पर चलने के लिए जानी जाती है... कानूनी तौर पर मौजूदा लोकसभा का कार्यकाल अभी पंद्रह महीने और चल सकता है."

"लेकिन हमारा यह भी पक्का मानना ​​है कि संसद और सरकार को जनता के पास वापस जाना चाहिए और देश की मज़बूती और भलाई के लिए कार्यक्रमों और नीतियों को आगे बढ़ाने के लिए उनसे मंज़ूरी लेनी चाहिए। जनता की शक्ति में इसी अटूट विश्वास के कारण, मैंने राष्ट्रपति को मौजूदा लोकसभा को भंग करने और नए चुनाव कराने की सलाह दी है. उन्होंने इसे मान लिया है. हमें उम्मीद है कि मार्च में मतदान होगा."

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लगभग 21 महीने बाद चुनाव की घोषणा हो गई. इंदिरा ने ठीक ही कहा था. मार्च में चुनाव हुए. मतदान 16, 18, 19 और 20 मार्च 1977 को हुआ. नतीजे 20-21 मार्च के आसपास आने शुरू हुए. 

लेकिन चुनाव की घोषणा से पहले का वाकया काफी दिलचस्प है. पांच दशकों तक सत्ता के गलियारों में सियासत को नजदीकी से देखने वाली वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी ने अपनी किताब 'हाउ प्राइम मिनिस्टर्स डिसाइड' में इस घटना का जिक्र किया है.

इंदिरा ने चुनाव कराने का फैसला कर लिया था. 

दिसंबर 1976 की बात रही होगी. इंदिरा गांधी ने अपने प्रधान सचिव पीएन धर को बुलाया. नीरजा चौधरी ने अपनी किताब में लिखा है, "उन्होंने पीएन धर को मुख्य चुनाव आयुक्त से मिलने को कहा, 1 जनवरी 1977 को पीएन धर ने मुख्य चुनाव आयुक्त टी स्वामीनाथन को घर पर चाय पर बुलाया और चुनाव की तैयारियां करने को कहा. स्वामीनाथन चकित थे, उन्होंने मजाकिया अंदाज में धर से कहा कि इस मौके पर तो चाय से कुछ ज्यादा होना चाहिए."

बता दें कि उस समय चुनाव आयोग में एक ही कमिश्नर हुआ करता था.

नीरजा चौधरी लिखती हैं कि उस शाम को मुख्य चुनाव आयुक्त ने पीएन धर को व्हिस्की को बोतल भेजी. 

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नीरजा चौधरी आगे लिखती हैं, "18 जनवरी 1977 को देश को हैरान करते हुए चुनावों की घोषणा कर दी, हालांकि चुनाव के तारीखों का निर्धारण प्रधानमंत्री के ज्योतिषी ने किया."

बता दें कि 18 जनवरी को इंदिरा की घोषणा के बाद 19 जनवरी को राष्ट्रपति ने लोकसभा भंग कर दी. 

इसके बाद 10 फरवरी 1977 को राष्ट्रपति ने धारा 14 के तहत नोटिफिकेशन जारी कर सभी संसदीय क्षेत्रों से चुनाव कराने का आह्वान किया.  उसी दिन चुनाव आयोग ने विस्तृत शेड्यूल जारी किया, जिसमें नामांकन, जांच, वापसी और मतदान की तारीखें तय की गईं.  मतदान 16 से 20 मार्च 1977 के बीच हुआ. 

इस घटना के बारे में इंदिरा गांधी के सूचना सलाहकार रहे एच वाई शारदा प्रसाद के बेटे रवि विश्वेश्वरैया शारदा प्रसाद ने भी एक लेख में जिक्र किया है. 

रवि विश्वेश्वरैया शारदा प्रसाद एक मैगजीन में लिखा है कि 18 जनवरी की घोषणा के पहले ही इंदिरा ने कई राजनीतिक कैदियों, खासकर मोरारजी देसाई और लालकृष्ण आडवाणी को रिहा करने का आदेश दे दिया था.  

मुझे पता है कि मैं हार जाऊंगी

उन्होंने बहुत कम समय के नोटिस पर कैबिनेट की बैठक बुलाई और जो लोग शामिल हो सके, उन्हें बताया कि उन्होंने इमरजेंसी के नियमों में ढील देने और चुनाव कराने का फैसला किया है.  उस दिन उनके कैबिनेट के कई वरिष्ठ सहयोगी और कांग्रेस पार्टी के पदाधिकारी दिल्ली से बाहर थे. 

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रवि विश्वेश्वरैया शारदा प्रसाद ने लिखा है, "नवंबर 1976 के आखिरी हफ़्ते में गुवाहाटी में कांग्रेस पार्टी के अधिवेशन से लौटने के बाद, उन्होंने अपने प्रधान सचिव प्रोफ़ेसर पृथ्वी नाथ धर और मेरे पिता एच.वाई. शारदा प्रसाद से कहा- मैं इमरजेंसी खत्म करने और चुनाव कराने जा रही हूं, मुझे पता है कि मैं हार जाऊंगी, लेकिन यह एक ऐसा काम है जो मुझे हर हाल में करना ही है."

वे आगे लिखते हैं, "इंदिरा गांधी के निर्देश पर, पी.एन. धर ने मुख्य चुनाव आयुक्त तिरुमलाराया स्वामीनाथन को चाय पर बुलाया और उनसे चुपचाप चुनाव की तैयारी शुरू करने को कहा."

उन्होंने आगे लिखा,"ICS अफ़सर टी. स्वामीनाथन, जो पहले कैबिनेट सेक्रेटरी रह चुके थे ने कहा, "आप मुझे यह अच्छी ख़बर सिर्फ़ एक कप चाय के साथ सुना रहे हैं? हमें तो इससे कहीं ज़्यादा मज़ेदार चीज़ के साथ जश्न मनाना चाहिए." इसके बाद दोनों ने अपनी पसंद की शराब की बोतलें खोलीं. 

इंदिरा की विदाई

1977 का आम चुनाव इंदिरा के करियर के लिए अहम मोड़ साबित हुआ. जेपी की अगुआई में जनता पार्टी गठबंधन ने भारी बहुमत हासिल किया. जनता पार्टी को 295 सीटें मिलीं जबकि कांग्रेस को सिर्फ 154 सीटें मिलीं.  इंदिरा गांधी रायबरेली और संजय गांधी अमेठी से हार गए. कांग्रेस उत्तर भारत में लगभग पूरी तरह पराजित हुई. 21 मार्च 1977 को आपातकाल समाप्त हुआ. मोरारजी देसाई 24 मार्च को प्रधानमंत्री बने.  यह आजाद भारत का पहला गैर-कांग्रेसी सरकार का गठन था. 

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