दिल्ली के कनॉट प्लेस में शुक्रवार को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और केंद्र सरकार के खिलाफ कॉक्रोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन में सैकड़ों लोग जुटे. प्रदर्शनकारियों में छात्र, वामपंथी संगठनों के कार्यकर्ता और आम नागरिक शामिल थे. शाम होते-होते भीड़ एक हजार के पार पहुंचती दिखी, लेकिन प्रदर्शन में न कोई साफ लीडरशिप नजर आई और न ही कोई ठोस रणनीति.
CJP के प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी और हिरासत के बाद प्रदर्शनकारी छोटे-छोटे समूहों में बंटे रहे. कई लोगों को यह भी नहीं पता था कि उन्हें आगे कहां जाना है और क्या करना है. शुक्रवार को शाम करीब चार बजे दिल्ली के कनॉट प्लेस में सीजेपी के प्रदर्शन की शुरुआत छोटे-छोटे समूहों के रूप में हुई. कहीं पांच-छह लोग खड़े थे तो कहीं दर्जनभर प्रोटेस्टर्स इकट्ठा थे. शाम पांच बजे तक इनमें से कुछ ग्रुप्स बड़े होने लगे और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और सरकार के खिलाफ नारेबाजी शुरू हो गई.
शाम ढलने के साथ अलग-अलग ग्रुप्स कनॉट प्लेस के इनर सर्कल में पहुंचने लगे. देखते ही देखते सैकड़ों लोग वहां जमा हो गए. दूसरी ओर कनॉट प्लेस में हजारों सुरक्षाकर्मियों की तैनाती देखकर ऐसा लग रहा था कि दिल्ली पुलिस किसी बड़े टकराव की आशंका को देखते हुए तैयारियां कर रही है. हालांकि, प्रदर्शन स्थल की तस्वीर कुछ अलग ही थी.
यहां छात्रों, वामपंथी कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों के छोटे-छोटे समूह मौजूद थे, लेकिन न तो कोई तय स्थान था, जहां सभी प्रदर्शनकारियों को इकट्ठा होना था और न ही कोई नेता उन्हें दिशा दे रहा था.
भीड़ तो जुटी, लेकिन नेतृत्व नदारद
प्रदर्शन में शामिल दर्जनों लोगों से बातचीत के दौरान अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं. कुछ लोग मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन में पूरी प्रतिबद्धता के साथ शामिल हुए थे, जबकि कई लोग केवल यह देखने पहुंचे थे कि कनॉट प्लेस में आखिर हो क्या रहा है? कुछ लोगों ने बताया कि वे बाद में कनॉट प्लेस के पब और क्लबों में जाने वाले हैं, जो शुक्रवार को खुले हुए थे.
शाम तक कनॉट प्लेस में जुटे लोगों की संख्या एक हजार से ज्यादा होती दिखाई दी. इसके बावजूद यह भीड़ एक संगठित मार्च का रूप नहीं ले सकी. रात करीब आठ बजे तक सैकड़ों लोगों को हिरासत में लिया जा चुका था, लेकिन कनॉट प्लेस के अलग-अलग हिस्सों में छोटे समूहों का प्रदर्शन जारी था.
अभिजीत दिपके हिरासत में, दो नेता पहले से गिरफ्तार
CJP की ओर से तिरंगा मार्च का ऐलान पार्टी के फाउंडर अभिजीत दिपके ने किया था. हालांकि, शुक्रवार को प्रदर्शन शुरू होने से ठीक पहले दिल्ली पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया. पुलिस ने दिपके को पहले ही नोटिस जारी कर मार्च नहीं निकालने के लिए कहा था. वहीं, CJP के दो अन्य प्रमुख नेता आशुतोष रांका और सौरव दास पहले से गिरफ्तार थे.
दिपके को हिरासत में लिए जाने के बाद प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाला कोई प्रमुख CJP नेता नजर नहीं आया. पार्टी की ओर से ऐसी कोई वैकल्पिक रणनीति भी सामने नहीं आई, जिसके जरिए अलग-अलग समूहों को एकजुट किया जा सके या प्रदर्शन की अगली दिशा तय की जा सके.स दिपके को हिरासत में लिए जाने के दो घंटे से ज्यादा समय बाद भी कोई CJP पदाधिकारी प्रदर्शन का नेतृत्व करता दिखाई नहीं दिया.
इसका नतीजा यह हुआ कि प्रदर्शन किसी संगठित अभियान के बजाय अलग-अलग समूहों के एक जगह पहुंचने से आगे बढ़ता रहा.
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शाम 5:25 बजे निकला पहला मार्च
शाम करीब 5 बजकर 25 मिनट पर पहली बार प्रदर्शनकारियों का एक समूह मार्च करता दिखाई दिया. लगभग 100 लोग हाथों में तिरंगा लेकर पालिका मार्केट के गेट नंबर एक से कनॉट प्लेस के इनर सर्कल में मार्च करने लगे. इसी दौरान जंतर-मंतर के पास टॉल्स्टॉय मार्ग पर स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) के करीब 100 से 120 सदस्य भी जमा हुए.
ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) से जुड़े कार्यकर्ता भी प्रदर्शन में शामिल हुए. हालांकि, AISA नेता नेहा बोरा को शाम करीब 5:15 बजे मंडी हाउस से हिरासत में ले लिया गया था. इस दौरान अलग-अलग स्थानों पर 'दिल्ली पुलिस हाय-हाय', 'तानाशाही नहीं चलेगी' और 'ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दो' जैसे नारे सुनाई दिए. हालांकि, नारेबाजी अलग-अलग समूहों में हो रही थी और प्रदर्शनकारियों के बीच तालमेल की कमी साफ दिखाई दे रही थी.
शाम करीब 7:30 बजे CPI(M) के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास कनॉट प्लेस पहुंचे. वह प्रदर्शन स्थल पर नजर आने वाले एकमात्र प्रमुख राजनीतिक नेता थे.
प्रदर्शन में आए लोगों को ही नहीं पता था कहां जाना है
प्रदर्शन में ऐसे लोग भी शामिल थे, जिन्हें यह स्पष्ट नहीं था कि आगे किस दिशा में जाना है. समाजशास्त्र की सेवानिवृत्त प्रोफेसर अरुणा सिंह ने आसपास देखते हुए एक रिपोर्टर से ही पूछ लिया, 'क्या भीड़ आ रही है? वे लोग कहां हैं?' यानी प्रदर्शन की स्थितियां कितनी अनिश्चित थीं, ये उनके सवाल से ही झलक रहा था. दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा काव्या शर्मा ने बताया कि वह इसलिए प्रदर्शन में शामिल हुई हैं, क्योंकि उनका मानना है कि राष्ट्रीय ध्वज लेकर किसी मुद्दे के लिए खड़ा होना कोई अपराध नहीं है.
काव्या ने कहा, 'तिरंगा लेकर यहां खड़े होना कोई अपराध नहीं है, इसलिए मैं यहां आई हूं.' हालांकि, उन्हें भी यह स्पष्ट नहीं था कि किस समूह के साथ जाना है. वह कुछ समय तक पालिका बाजार के गेट नंबर एक पर रहीं, फिर जंतर-मंतर के प्रवेश द्वार पर पहुंचीं और बाद में कनॉट प्लेस के इनर सर्कल में मार्च कर रही भीड़ के साथ शामिल हो गईं.
कोई यूट्यूब चैनल का प्रचार करने पहुंचा, तो कोई मणिपुर का मुद्दा लेकर
कनॉट प्लेस में प्रदर्शन के दौरान कई ऐसे लोग भी नजर आए, जिनका CJP के घोषित मुद्दों से सीधा संबंध नहीं था. एक अफ्रीकी व्यक्ति केवल उत्सुकतावश वहां पहुंचा था. वहीं, एक अन्य प्रदर्शनकारी ने तिरंगे को अपने शरीर पर लपेट रखा था. उसने बताया कि वह मणिपुर में कुकी, मैतेई और नगा समुदायों से जुड़ी हिंसा की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करना चाहता है.
उसका कहना था कि मणिपुर में जो कुछ हो रहा है, उसकी किसी को परवाह नहीं है. मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ हो रही नारेबाजी के बीच उसका मुद्दा अलग था, लेकिन इससे यह भी पता चला कि कुछ लोगों के लिए यह प्रदर्शन अपनी बात रखने का अवसर बन गया था.
इसी दौरान एक व्यक्ति गले में प्लास्टिक की नकली खोपड़ियां लटकाकर पहुंचा था. उसने अजीबोगरीब वेशभूषा पहन रखी थी और अपने यूट्यूब चैनल का प्रचार कर रहा था. प्रदर्शन में शामिल होने का उसका कोई स्पष्ट कारण नजर नहीं आया.
प्रदर्शनकारियों से ज्यादा सुरक्षाकर्मी और मीडियाकर्मी
कनॉट प्लेस में प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए थे. दिल्ली पुलिस के अलावा रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) और सशस्त्र सीमा बल (SSB) के जवान भी तैनात थे. करीब हर 300 से 400 मीटर पर रैपिड एक्शन फोर्स के जवान मौजूद थे. उनके पास लाठियां, आंसू गैस के गोले और हथियार थे.
कनॉट प्लेस के इनर और आउटर सर्कल में बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए थे. वरिष्ठ पुलिस अधिकारी लगातार इलाके में गश्त कर रहे थे और जवानों को निर्देश दे रहे थे. आसमान से भी निगरानी की जा रही थी. कनॉट प्लेस के ऊपर दर्जनों ड्रोन उड़ते दिखाई दिए, जिनके जरिए प्रदर्शनकारियों की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही थी.
सुरक्षाकर्मियों और मीडियाकर्मियों की संख्या प्रदर्शनकारियों से ज्यादा नजर आ रही थी.
'तिरंगा प्रदर्शनकारियों के लिए ढाल बना हुआ था'
दिल्ली पुलिस बार-बार छोटे-छोटे समूहों को वहां से हटने के लिए कह रही थी. हालांकि, प्रदर्शनकारियों की ओर से ऐसा कोई नेतृत्व मौजूद नहीं था, जो पुलिस अधिकारियों से बातचीत कर सके. दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इंडिया टुडे डिजिटल को बताया कि जब तक प्रदर्शनकारी शांतिपूर्ण तरीके से मौजूद हैं और सेंट्रल पार्क में प्रवेश नहीं करते, तब तक उन्हें हिरासत में लेने से बचा जा सकता है.
वहीं, एक आईपीएस अधिकारी ने कहा, 'राष्ट्रीय ध्वज प्रदर्शनकारियों के लिए ढाल की तरह काम कर रहा था. इसी वजह से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत प्रतिबंधात्मक आदेश लागू होने के बावजूद पुलिस भीड़ के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर रही थी.'
मुंबई में भी CJP के प्रदर्शन में कम लोग पहुंचे
दिल्ली के अलावा मुंबई में भी CJP के प्रदर्शन में अपेक्षाकृत कम भीड़ जुटी. प्रदर्शन स्थल पर मौजूद सूत्रों ने इंडिया टुडे डिजिटल को बताया कि मुंबई के आजाद मैदान में मुश्किल से कुछ दर्जन लोग पहुंचे थे. यह वही मैदान है, जहां करीब पांच से छह हजार लोगों के जुटने की क्षमता है. दिल्ली के कनॉट प्लेस में भी प्रदर्शनकारियों की संख्या पिछले सप्ताह हुए कांग्रेस के मार्च और जुलाई में CJP के प्रदर्शन की तुलना में कम नजर आई.
जुलाई के प्रदर्शन जैसी स्थिति फिर बनी
शुक्रवार के प्रदर्शन ने 20 जुलाई को हुए CJP के प्रदर्शन की याद दिला दी. उस समय भी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को हिरासत में लिए जाने के बाद प्रदर्शन में नेतृत्व का अभाव दिखाई दिया था. इस बार भी अभिजीत दिपके को हिरासत में लिए जाने के बाद कोई वैकल्पिक योजना सामने नहीं आई. इससे यह सवाल खड़ा हुआ कि क्या CJP जुलाई के प्रदर्शन के दौरान सामने आई संगठनात्मक कमियों को दूर नहीं कर सकी.
प्रदर्शन में शामिल होने के लिए लोग सड़कों पर तो उतरे, लेकिन उन्हें एकजुट रखने, मार्च को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाने और राजनीतिक दिशा देने के लिए स्पष्ट नेतृत्व नजर नहीं आया. हिंदी के प्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने अपने निबंध 'आवारा भीड़ के खतरे' में दिशाहीन भीड़ से पैदा होने वाले खतरों के बारे में चेताया था.
कनॉट प्लेस में शुक्रवार को हुए प्रदर्शन ने भी एक अहम सवाल सामने रखा कि केवल लोगों को सड़कों पर बुला लेना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि किसी आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए संगठन, नेतृत्व और स्पष्ट रणनीति का होना भी जरूरी है.
आनंद सिंह