मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार चर्चा में है. हाल ही में एक अखबार की रिपोर्ट आने के बाद से विपक्ष लगातार CEC ज्ञानेश कुमार पर हमलावर है. एक तरफ उनके इस्तीफे की मांग हो रही है तो दूसरी ओर महाभियोग लाने की तैयारी भी चल रही है. कई विपक्षी दल इसके लिए हाथ मिला चुके हैं. संसद के प्रस्तावित विशेष सत्र से पहले विपक्ष लोकसभा और राज्यसभा में नोटिस देने की तैयारी कर रहा है.
26 जनवरी 2029 तक है कार्यकाल
भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त के रूप में ज्ञानेश कुमार का कार्यकाल 26 जनवरी 2029 तक है. कुमार ऐसे पहले मुख्य निर्वाचन आयुक्त हैं जिनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव संसद में आये. एक दो नहीं बल्कि तीन तीन! दो प्रस्ताव अब तक जांच समिति से खारिज हो चुके हैं. तीसरा लंबित है और चौथे की तैयारी चल रही है. जबकि उनके कार्यकाल के सवा दो साल से अधिक की अवधि अभी शेष है!
इसी साल मार्च में लाया गया था पहला नोटिस
ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया चलाने के प्रस्ताव के नोटिस इसी साल मार्च में संसद के दोनों सदनों में लाए गए. दोनों अध्यक्ष और सभापति के स्तर पर ही खारिज हो गए. राज्यसभा में 12 मार्च 2026 को 63 विपक्षी सांसदों के दस्तखत के साथ लाया गया. इसके करीब 25 दिन बाद 6 अप्रैल को सभापति सीपी राधाकृष्णन ने इसे खारिज कर दिया.
उसके बाद दूसरा नोटिस राज्यसभा में 24 अप्रैल को आया. उसमें 73 सांसदों के हस्ताक्षर थे. इसमें ज्ञानेश कुमार पर नौ आरोप लगाए गए हैं. वो अब तक लंबित है.
लोकसभा में 12 मार्च को ही एक नोटिस आया जिसमें 130 सांसदों के हस्ताक्षर थे. वो भी दम तोड़ गया. लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने उसे खारिज कर दिया. नियमों के अनुसार, निर्वाचन आयुक्तों का कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु में से जो भी पहले पूरा हो तक का होता है. केरल कैडर के आईएएस अधिकारी ज्ञानेश कुमार ने 19 फरवरी 2025 को देश के 26वें मुख्य निर्वाचन आयुक्त के रूप में कार्यभार संभाला था.
ज्ञानेश कुमार 26 जनवरी 2029 को अपनी 65 वर्ष की आयु पूरी होने पर इस पद से सेवानिवृत्त यानी रिटायरहोंगे. यानी देश में 19वीं लोकसभा के चुनावों के सर्द-गरम झोंकों के बीच ज्ञानेश कुमार इस पद को अलविदा कह देंगे. फिर इनकी जगह लेने वाले नए मुख्य निर्वाचन आयुक्त लोकसभा चुनावों की घोषणा करेंगे.
भारत सरकार में, ज्ञानेश कुमार को रक्षा मंत्रालय में संयुक्त सचिव, गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव एवं अपर सचिव, संसदीय कार्य मंत्रालय में सचिव और सहकारिता मंत्रालय में सचिव के पदों पर काम करने का व्यापक अनुभव है. 31 जनवरी, 2024 को सेवानिवृत्त होने के बाद, 15 मार्च, 2024 को भारत के निर्वाचन आयुक्त के रूप में नियुक्त हुए थे.
क्या है महाभियोग की प्रक्रिया
संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत CEC को भी सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह हटाया जा सकता है. जबकि अन्य दोनों निर्वाचन आयुक्तों को CEC की सिफारिश पर ही राष्ट्रपति हटा सकते हैं. CEC को उनके पद से हटाने के लिए लोकसभा में स्पीकर या राज्यसभा में सभापति को सबसे पहले नोटिस दिया जाता है. उस प्रस्ताव पर लोकसभा में 100 और राज्यसभा में 50 सांसदों के दस्तखत जरूरी हैं.
इसके बाद लोकसभा में अध्यक्ष और राज्यसभा में सभापति यह तय करते हैं कि उस नोटिस को स्वीकार करना है या नहीं. फैक्ट्स के आधार पर नोटिस स्वीकार होने के बाद आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यों की एक कमेटी बनाई जाती है. अगर लोकसभा और राज्यसभा में एक ही दिन नोटिस दिया गया हो, तो दोनों सदनों में इसके स्वीकार होने के बाद ही समिति बनाई जाती है. अन्यथा, जिस सदन में पहले प्रस्ताव आता है वहां कमेटी बनाई जाती है.
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लोकसभा के अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति मिलकर कमेटी बनाते हैं. इसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) या सुप्रीम कोर्ट के जज, किसी हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित कानून विशेषज्ञ होते हैं. आरोपों को सही मानने पर कमेटी अपनी विस्तृत और तार्किक रिपोर्ट सदन में पेश करती है. इसके बाद उस प्रस्ताव पर चर्चा होती है.
चर्चा के दौरान जरूरत पड़ने पर आरोपी आयुक्त को सदन के दरवाजे पर बुलाकर भी सदस्य पूछताछ कर सकते हैं. इसके बाद बकायदा मतदान होता है. प्रस्ताव दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से पारित होने पर राष्ट्रपति इस पर अंतिम मंजूरी देते हैं. हालांकि भारत में अब तक किसी CEC को इस प्रक्रिया के जरिए उनके पद से हटाया नहीं गया है.
संजय शर्मा