महाराष्ट्र में शिवसेना विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई तेज हो गई है. चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच के सामने उद्धव ठाकरे गुट की ओर से सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल और सीनियर देवदत्त कामत ने धारदार दलीलें पेश कीं.
उद्धव गुट ने एकनाथ शिंदे गुट के दावों को सिरे से खारिज करते हुए चुनाव आयोग के फैसले को मनमाना बताया. साथ ही दलबदल विरोधी कानून, पार्टी के संविधान और संविधान की दसवीं अनुसूची की अवहेलना का आरोप लगाया.
सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने पार्टी के मूल संविधान और संगठनात्मक ढांचे का हवाला देते हुए चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए.
सुप्रीट कोर्ट में जमकर जिरह
सिब्बल ने तर्क दिया कि जब दोनों गुटों ने चुनाव आयोग के सामने अलग-अलग संविधान पेश किए, तो आयोग को बंटवारे से पहले जमा किए गए मूल पार्टी संविधान को ही आधार बनाना चाहिए था. 19 जुलाई को संगठन की ओर से समर्थन पत्र सौंपे गए थे. शिंदे गुट ने डिप्टी स्पीकर के सामने ऐसा कोई दस्तावेज पेश नहीं किया था जो ये साबित कर सके कि उन्हें मूल राजनीतिक दल का समर्थन हासिल था.
सिब्बल ने आगे बताया कि अजय चौधरी को विधायक दल का नेता नियुक्त करने का प्रस्ताव खुद पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे की ओर से हस्ताक्षरित था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने सुभाष देसाई मामले में भी स्वीकार किया था. सिब्बल ने कहा कि जिन विधायकों ने बाद में नेतृत्व को चुनौती दी, वो उसी नेतृत्व और चुनाव चिह्न के दम पर जीतकर विधानसभा पहुंचे थे.
उन्होंने कहा, 'पहले पार्टी नेतृत्व का फायदा लेना और बाद में ये कहना कि हम आपको नेता नहीं मानते, स्वीकार्य नहीं हो सकता.'
सिब्बल ने बताया कि 'लेजिस्लेटिव पार्टी' और 'पॉलिटिकल पार्टी' दो अलग चीजें हैं. सिर्फ ज्यादा विधायक होने से कोई समूह मूल पार्टी नहीं बन जाता. सिब्बल ने एक उदाहरण देते हुए कहा, 'जैसे सरकारी जमीन पर अवैध निर्माण कई सालों तक बने रहने से वैध नहीं हो जाता, वैसे ही शुरुआत से अवैध दलबदल को समय बीतने पर संवैधानिक मान्यता नहीं दी जा सकती.
सिब्बल ने बेंच से मांग की कि शिवसेना का मूल नाम और 'धनुष-बाण' निशान शिंदे गुट को किसी भी सूरत में न दिया जाए. इसे या तो ठाकरे गुट को सौंपा जाए या फिर पूरी तरह से फ्रीज कर दिया जाए.
देवदत्त कामत के तर्क: अयोग्यता का फैसला भूतप्रभावी
कपिल सिब्बल के बाद सीनियर एडवोकेट देवदत्त कामत ने उद्धव गुट की ओर से अपनी दलीलें शुरू कीं. कामत ने बागी विधायकों की अयोग्यता और चुनाव चिह्न के बीच के संबंधों पर तीन बिंदु रखे.
अयोग्यता के प्रभाव- 5 जजों की संविधान बेंच पहले ही तय कर चुकी है कि अयोग्यता का फैसला भूतप्रभावी होता है. अगर किसी विधायक को अयोग्य ठहराया जाता है, तो वो उसी दिन से अयोग्य माना जाता है जिस दिन उसने दलबदल किया था.
अध्यक्ष का अधिकार क्षेत्र- कामत ने 'राणा केस' का हवाला देकर कहा कि विधायकों की अयोग्यता तय करने का अधिकार स्पीकर के पास ट्रिब्यूनल के रूप में होता है.
अदालत की न्यायिक समीक्षा शक्ति- अगर स्पीकर ट्रिब्यूनल के रूप में अपने संवैधानिक कर्तव्य का पालन करने में विफल रहते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट के पास अपने अधिकार का प्रयोग कर निर्णय पलटने की शक्ति है.
'क्या कोर्ट खुद विधायकों को अयोग्य घोषित कर सकता है?'
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने पहलुओं पर कई अहम सवाल पूछे. जस्टिस बागची ने पूछा कि जब स्पीकर ने विधायकों को अयोग्य नहीं माना है, तो क्या सुप्रीम कोर्ट खुद फैसला सुनाते हुए उन्हें सीधे अयोग्य घोषित कर सकता है? या फिर कोर्ट को सिर्फ रिट जारी कर आदेश रद्द करना होगा और मामला पुनर्विचार के लिए वापस स्पीकर के पास ही भेजना होगा?
अदालत ने पूछा कि क्या कोर्ट परमादेश जारी कर सीधे विधायकों को अयोग्य घोषित कर सकता है?
देवदत्त कामत ने जवाब दिया कि सुप्रीम कोर्ट के पास विधायकों को अयोग्य ठहराने की पूर्ण संवैधानिक शक्ति है. चूंकि मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल अब खत्म हो चुका है, ऐसे में अगर मामला सिर्फ वापस स्पीकर के पास भेजने तक सीमित रहा, तो ये फैसला महज एक अकादमिक आदेश बनकर रह जाएगा.
'विधायी बहुमत' बनाम 'संगठनात्मक बहुमत'
जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि इस बात में विवाद नहीं है कि एकनाथ शिंदे के पास विधायकों का बहुमत था. मूल सवाल ये है कि क्या वे उस आधार पर असली 'राजनीतिक दल' बने रहते हैं या नहीं?
कामत ने इसके जवाब में 'सुभाष देसाई मामले' के ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया. कामत ने कहा कि चुनाव आयोग ने सिर्फ 'विधायी बहुमत' के आधार पर फैसला दिया, जो सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संविधान पीठ के फैसले के सीधे खिलाफ है.
जब विधायकों के खिलाफ 10वीं अनुसूची के तहत अयोग्यता की कार्यवाही लंबित हो, उस समय सिर्फ विधायकों की संख्या को प्राथमिक आधार मानना गलत है. चुनाव आयोग की कार्यवाही ये तय करने के लिए होती है कि किस गुट के पास राजनीतिक दल की मूल आत्मा और संगठन का समर्थन है. सिर्फ विधानसभा में बहुमत जुटा लेने से कोई गुट मूल पार्टी नहीं बन जाता.
'संगठन में विवाद है तो भीतर बात रखें, पाला बदलकर कब्जा न करें'
कामत ने तर्क दिया कि बालासाहेब ठाकरे के निधन के बाद 2013 में उद्धव ठाकरे पार्टी अध्यक्ष बने. 2013 से 2018 के बीच कई चुनाव लड़े गए और 2018 के सांगठनिक चुनावों में वो दोबारा अध्यक्ष चुने गए. एकनाथ शिंदे उसी नेतृत्व के दिए गए सिंबल पर चुनाव जीतकर आए थे.
यह भी पढ़ें: 'EC ने कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन किया', शिवसेना सिंबल केस में उद्धव गुट की सुप्रीम कोर्ट में दलील
उन्होंने कहा, 'अगर पार्टी का कोई उपनेता नाराज है, तो क्या वो सीधे पाला बदलकर किसी अन्य दल से हाथ मिला सकता है और दावा कर सकता है कि मैं ही नेता हूं? राजनीतिक नेतृत्व साबित करने के लिए पार्टी के संविधान के भीतर रहकर अपनी बात रखनी होती है, न कि सीधे दलबदल करके पूरी पार्टी पर कब्जा करना होता है.'
देवदत्त कामत ने शरद यादव और श्रीमंत पाटिल मामलों के न्यायिक निर्णयों का भी जिक्र किया. कामत की दलीलें कल भी जारी रहेंगी, जहां वो पार्टी के चुनाव निशान 'धनुष-बाण' पर अधिकार को लेकर अपनी बात रखेंगे.
संजय शर्मा