BMC चुनाव में 'ठाकरे ब्रदर्स' की दुर्गति की वजह क्या रही, अब भाइयों के सामने हैं 5 सवाल

बीएमसी चुनाव ने महाराष्ट्र की सियासत में बड़ा उलटफेर कर दिया है. 25 साल बाद शिवसेना का किला ढह गया और पहली बार बीएमसी में बीजेपी का मेयर बनना लगभग तय है. ठाकरे ब्रदर्स की एकजुटता भी मतदाताओं को नहीं रिझा सकी. नतीजों ने बाला साहेब की विरासत और ठाकरे राजनीति के भविष्य पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं.

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सालों पुरानी दुश्मनी भूलकर ठाकरे भाइयों ने हाथ मिलाया था, लेकिन फायदा नहीं मिला (फाइल फोटो- PTI) सालों पुरानी दुश्मनी भूलकर ठाकरे भाइयों ने हाथ मिलाया था, लेकिन फायदा नहीं मिला (फाइल फोटो- PTI)

आजतक ब्यूरो

  • नई दिल्ली,
  • 17 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 8:08 AM IST

देश ही नहीं पूरे एशिया की सबसे अमीर और बड़ी महानगरपालिका बीएमसी में पहली बार बीजेपी का मेयर बनने जा रहा है. सिर्फ बीएमसी ही नहीं महायुति ने महाराष्ट्र के 29 नगर निगमों में 25 निगमों में भगवा परचम लहराकर ठाकरे बंधुओं के साथ पूरे विपक्ष को हराया है.

अब सवाल ये कि बाला साहेब की विरासत का क्या होगा. राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे की पॉलिटिक्स का क्या होगा. बीएमसी चुनाव के नतीजों के मायने समझने की कोशिश करते हैं.

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बीएमसी चुनाव के नतीजों की बड़ी बात ये है कि 25 साल बाद बीएमसी में शिवसेना का किला ढहा है.

अब आगे सवाल बाला साहेब की विरासत का है. सवाल बीएमसी में राज करने वाली शिवसेना के अस्तित्व का है, क्योंकि जिस अस्तित्व को बचाने के लिए 20 साल बाद ठाकरे बंधुओं ने हाथ मिला उस सियासत को महाराष्ट्र की जनता ने सिरे से नकार दिया. मुंबई से उद्धव की शिवसेना की 25 साल बाद विदाई हुई तो वहीं राज ठाकरे दहाई के आंकड़े के लिए तरसते नजर आए.

नतीजों से साफ है कि राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे की जोड़ी को मुंबई की जनता ने नकार दिया. कट्टर मराठा पॉलिटिक्स महाराष्ट्र की जनता को समझ नहीं आई. उत्तर भारतीयों के खिलाफ हिंसा का साइड इफेक्ट भी दिखा. इतना ही नहीं, ठाकरे ब्रदर्स गैर मराठा वोटरों को साथ लाने में नाकाम हुए. वहीं मुस्लिम वोटर ने इस गठबंधन से पूरी तरह से किनारा कर लिया.

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जिस मातोश्री में पिछले 25 सालों से चुनाव के नतीजों पर जश्न मनता था शुक्रवार को वहां सन्नाटा पसरा हुआ था. अब इन नतीजों के बाद कई सवाल खड़े हो रहे हैं. जैसे- 

क्या राज ठाकरे की वजह से उद्धव को नुकसान हुआ?
क्या कांग्रेस से अलग होना उद्धव को महंगा पड़ा?
क्या शिंदे की ठाकरे लीगेसी पर जनता ने ज्यादा भरोसा किया?
क्या अब आगे भी राज-उद्धव की जोड़ी साथ लड़ेगी?

और अब उद्धव की शिवसेना का क्या होगा?

बता दें कि महाराष्ट्र विधानसभा में झटके के बाद उद्धव ने अपनी रणनीति को बदला था. महा विकास अघाड़ी से दूरी बनाई, सालों पुरानी दुश्मनी भूलकर भाई से हाथ मिलाया. लेकिन अब उद्धव के राजनीतिक भविष्य पर सवाल खड़ा हो गया है. क्योंकि जिस बाला साहेब की विरासत का जिक्र उद्धव करते हैं वो नतीजों में तब्दील होती नजर नहीं आ रही है. हालांकि बीएमसी में उद्धव के खिलाफ आए नतीजों की कुछ और भी वजहें हैं.

जैसे, 25 साल से बीएमसी पर राज करने वाली शिवसेना के सामने एंटी इंकम्बेंसी की चुनौती भी थी. उद्धव और राज ने रैलियों की बजाय प्रेस कॉन्फ्रेंस पर ज्यादा जोर दिया. जिससे वो शायद जनता से खुद को कनेक्ट नहीं कर पाए. सिर्फ मराठी वोटर को टारगेट करना महंगा पड़ा, जिससे बाकी वोटर छिटक गए.

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हिंदी भाषियों के साथ हिंसा की तस्वीरें भी सामने आईं. महाराष्ट्र के स्लेबस में हिंदी को लेकर सियासत हुई और राज ठाकरे ने महाराष्ट्र का मेयर मराठी होने का वादा किया. लेकिन ये सारे मुद्दे पूरी तरह से फेल होते नजर आए.

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