कभी हाथों में हथियार लेकर जंगलों में सक्रिय रहने वाले बस्तर संभाग के 8 पूर्व नक्सलियों ने अब किताब और कलम के जरिए अपनी नई राह चुनी है. छत्तीसगढ़ ओपन स्कूल से इस वर्ष 10वीं की परीक्षा देने वाले इन सभी पूर्व नक्सलियों ने परीक्षा पास कर ली है. खास बात तो ये है कि इनमें दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी के सदस्य रहे भास्कर भी शामिल हैं.
आत्मसमर्पण के बाद इन पूर्व नक्सलियों ने अब शिक्षा के जरिए अपने भविष्य को बदलने की राह अपनाई है. उनकी यह कहानी बताती है कि मुख्यधारा में लौटने के बाद वे पढ़ाई और स्किल्स के जरिए नई जिंदगी की शुरुआत कर रहे हैं.
इन पूर्व नक्सलियों में गीता नारोटे भी शामिल हैं. संगठन में रहते हुए वे नक्सलियों का इलाज करती थी. जंगल में रहते हुए उन्होंने टांके लगाने, इंजेक्शन देने और दवाइयों के इस्तेमाल जैसी चिकित्सीय जानकारी भी हासिल की थी. इसी कारण उन्हें संगठन में नक्सली डॉक्टर गीता के नाम से जाना जाता था.
महाराष्ट्र के गढ़चिरौली की रहने वाली गीता ने पारिवारिक परिस्थितियों के चलते छठवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी. इसके बाद वे नक्सली संगठन में शामिल हो गईं और करीब दो दशकों तक जंगल में ही रहीं. आत्मसमर्पण के बाद उन्होंने दोबारा पढ़ाई शुरू की और इस साल 10वीं की परीक्षा पास की. वे पढ़ाई कर नर्स बनने की चाहत रखती हैं.
हथियार छोड़ भास्कर ने अपनाई किताबों की राह
तेलंगाना के रहने वाले भास्कर की कहानी भी बस्तर के नक्सली आंदोलन के लंबे इतिहास से जुड़ी रही है. वह 90 के दशक में संगठन में एक सामान्य सदस्य के रूप में शामिल हुआ था. लेकिन समय के साथ संगठन में उसकी जिम्मेदारियां बढ़ती गईं और वह दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी के सदस्य जैसे महत्वपूर्ण पद तक पहुंच गया. बस्तर में लंबे समय तक सक्रिय रहे भास्कर को संगठन के एक प्रमुख नक्सली चेहरे के रूप में जाना जाता था.
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संगठन में भास्कर की भूमिका और हथियार चलाने की दक्षता के कारण उसे समय-समय पर बड़ी जिम्मेदारियां दी गईं. लेकिन जंगल में रहते हुए भास्कर की हिंदी भाषा और किताबों से भी दोस्ती हो गई. बस्तर में रहने के दौरान उसने हिंदी सीखी.
आत्मसमर्पण के बाद अपनी इसी रुचि को आगे बढ़ाते हुए उसने छत्तीसगढ़ ओपन स्कूल से 10वीं की परीक्षा दी और प्रथम श्रेणी में सफलता हासिल की. भास्कर का कहना है कि वह कई तरह से हथियार चलाना जानता है और इसी दक्षता के कारण संगठन में उसे बड़े दायित्व मिलते रहे. लेकिन अब वह किताबों को अपना हथियार बनाना चाहता है.
कांकेर जिले के रहने वाले सन्नू की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. अपने इलाके में लोगों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार और परेशानियों को देखते हुए वह नक्सली संगठन में शामिल हुआ था. संगठन में रहते हुए उसने आधुनिक और बड़े हथियारों का प्रशिक्षण लिया और धीरे-धीरे कमांडर स्तर की जिम्मेदारी तक पहुंचा.
सन्नू संगठन के लोगों के साथ-साथ ग्रामीणों और युवा कैडरों को पढ़ाने का काम भी करता था. आत्मसमर्पण के बाद उसने पढ़ाई दोबारा शुरू करने का फैसला लिया. उसने छत्तीसगढ़ ओपन स्कूल से 10वीं की परीक्षा दी और सफल भी हुआ. अब वह आगे पढ़ाई करने के साथ ही समाज के लिए काम भी करना चाहता है.
बस्तर IG ने क्या कहा
आत्मसमर्पित नक्सलियों को पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित करने में बस्तर पुलिस की भी बहुत भूमिका रही है. बस्तर आईझी बद्रीनारायण मीणा के मुताबिक, छत्तीसगढ़ की पुनर्वास नीति के तहत आत्मसमर्पित नक्सलियों को उनकी रुचि और क्षमता के हिसाब से प्रशिक्षण दिया जा रहा है.
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IG ने बताया कि जिन लोगों की पढ़ाई में रुचि नहीं थी, उन्हें उनकी इच्छा के मुताबिक परीक्षा देने का मौका दिया गया. उन्होंने बताया कि 8 आत्मसमर्पित नक्सलियों ने ओपन स्कूल से 10वीं की परीक्षा दी थी और सभी सफल रहे. इसमें बस्तर के छह, कांकेर के एक और बीजापुर के एक हैं.
(इनपुट- धर्मेंद्र महापात्र)
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