रिश्ते बड़े अजीब होते हैं. ऊपर से सब कुछ ठीकठाक दिखता है, लेकिन अंदर कहीं कोई ख्वाहिश दम तोड़ रही होती है, कोई शिकायत पल रही होती है या फिर दिल अब भी वही चाहता है, जिसे दिमाग कब का छोड़ चुका होता है. शादी हो या प्रेम, साथ रहने की आदत हो या दूर जाने का फैसला- चाहत अपना रास्ता किसी न किसी तरह खोज ही लेती है.
‘लस्ट स्टोरीज 3’ इसी चाहत के अलग-अलग चेहरों की कहानी है. यहां कोई अधूरे रोमांस से परेशान है, कोई अपनी ख्वाहिश को हथियार बना रहा है, कोई टूटते रिश्ते में आखिरी बार प्यार तलाश रहा है और कोई अपनी इच्छाओं को शब्द देने की हिम्मत जुटा रही है. चार कहानियां हैं, चार मिजाज हैं और हर कहानी रिश्तों की उस परत को कुरेदती है, जिसे हम अक्सर दुनिया से तो क्या, खुद से भी छिपाते हैं. तो कैसी है ये एंथोलॉजी आइये आपको बताते हैं हमारे रिव्यू में...
इन कहानियों की सबसे अच्छी बात ये है कि कोई कहानी दूसरी को निगलती नहीं है. चारों अपने-अपने फ्लेवर में काम करती हैं. कोई ज्यादा मसालेदार है, कोई ज्यादा इमोशनल, तो कोई सीधे दिल और दिमाग के बीच की नस दबाती है.
पहली कहानी: जब शादी में रोमांस की घंटी बजना बंद हो जाए
विक्रमादित्य मोटवानी की कहानी दो चालीस साल की महिलाओं- पद्मा और शोनाली के इर्द-गिर्द घूमती है. दोनों की शादी चल तो रही है, लेकिन रोमांस का मीटर लगभग शून्य है. शोनाली के दिमाग में एक के-ड्रामा से आइडिया आता है- पति बदलकर देखो.
अब भाई, जहां पति-पत्नी की जिंदगी में मसाला खत्म हो गया हो, वहां ऐसा आइडिया आए तो कहानी तो बनेगी ही. राधिका आप्टे और कोंकणा सेन शर्मा यहां अपने आम किरदारों से थोड़ा उलट नजर आती हैं. कोंकणा की शोनाली ज्यादा बिंदास और बेबाक है, जबकि राधिका की पद्मा के भीतर शर्म, डर, इच्छा और अपराधबोध का पूरा मेला लगा हुआ है.
और यहीं राधिका बाजी मारती हैं. पद्मा का किरदार सिर्फ सेक्स या एक्साइटमेंट के बारे में नहीं है. असली बात है- क्या उम्र के इस पड़ाव पर भी कोई आपको उसी तरह चाहे, जैसे कभी चाहा करता था?
कहानी का क्लाइमेक्स थोड़ा फिल्मी जरूर है, लेकिन बात सीधी दिल में उतरती है- हर शादी में चिंगारी वापस लाने का तरीका एक जैसा नहीं होता. कभी-कभी आग जलाने के चक्कर में उंगली भी जल सकती है.
दूसरी कहानी: प्यार भी बिजनेस मॉडल हो सकता है
किरण राव की कहानी सबसे हल्की-फुल्की और शरारती है. मुंबई की एक स्टाइलिश गली, पिज्जा डिलीवरी बॉय, नेल आर्टिस्ट, आंखों-आंखों में प्यार और बैकग्राउंड में गाने- शुरुआत देखकर लगता है कि बस अब एक प्यारी-सी रोमांटिक कहानी शुरू होने वाली है. लेकिन जनाब, मामला इतना सीधा नहीं है.
करण कोई मासूम आशिक नहीं, बल्कि ड्रग डीलिंग के धंधे में है और लिसा उसके खेल में एक खूबसूरत मोहरा बन जाती है. ऊपर से ट्विन भाई का तड़का भी लगा है. यहां कहानी बहुत गहरी खुदाई नहीं करती, लेकिन एक दिलचस्प बात जरूर कहती है- बड़े शहर में चाहत भी कभी-कभी सीढ़ी बन जाती है.
मुंबई सपने बेचती है, और लोग उन सपनों तक पहुंचने के लिए रिश्तों का भी इस्तेमाल कर लेते हैं. गंभीर बात को किरण राव काफी हल्के और रंगीन अंदाज में परोसती हैं. ये पूरी दावत नहीं, बल्कि खाने के बीच रखा गया चटपटा अचार है- कम मात्रा में, लेकिन स्वाद बदलने के लिए काफी.
तीसरी कहानी: जब प्यार बचा हो, लेकिन शादी खत्म हो रही हो
अब आता है एंथोलॉजी का सबसे दमदार और भावनात्मक हिस्सा- शकुन बत्रा की कहानी. अली फजल और राधिका मदान एक ऐसे कपल का किरदार निभाते हैं जिनकी पांच साल पुरानी शादी टूटने की कगार पर है. तलाक की प्रक्रिया चल रही है, लेकिन दोनों के बीच आकर्षण अभी मरा नहीं है. और यही सबसे बड़ी मुश्किल है. दिल कहता है कुछ और, दिमाग कुछ और.
दोनों एक-दूसरे से नाराज हैं. पुराने जख्म हैं, ससुराल की दखलअंदाजी है, ट्रॉमा है, ईगो है, गलतफहमियां हैं. लेकिन जब सामने वाला इतना अपना रहा हो कि उससे नफरत करना भी मुश्किल लगे, तब रिश्ता खत्म करना आसान कहां होता है?
अली फजल और राधिका मदान इस हिस्से की जान हैं. दोनों के बीच की केमिस्ट्री कहानी को लगातार खींचती रहती है. शकुन बत्रा को रिश्तों के इस आधुनिक, थोड़े जहरीले और बेहद उलझे हुए इलाके में घूमना आता है. बातचीत में तंज, खामोशी में शिकायत और नजरों में पुराना प्यार- सब कुछ पकड़ में आता है.
हां, आखिर में फिल्म थोड़ी ज्यादा ‘हीलिंग-कोट्स’ मोड में चली जाती है. किरदार वो बातें बोलने लगते हैं जिन्हें दर्शक पहले ही समझ चुका होता है. फिर भी असर बना रहता है. क्योंकि ये कहानी सिर्फ 'लस्ट' की नहीं, उस रिश्ते की है जिसमें प्यार खत्म होने के बाद भी शरीर और यादें पुराने पते पर चिट्ठियां भेजते रहते हैं.
चौथी कहानी: जब औरत कहे- इतने से काम नहीं चलेगा
विशाल भारद्वाज की कहानी 1980 के दशक के हैदराबाद में सेट है और यहां लस्ट का मतलब सबसे अलग है. सिद्दार्थ और अदिति राव हैदरी पति-पत्नी के रोल में हैं. शादी ठीक है, घर-परिवार ठीक है, पति भी कोई अत्याचारी टाइप नहीं. लेकिन सायरा को लगता है कि सिर्फ शादीशुदा जिंदगी का ‘रूटीन’ प्यार काफी नहीं है. उसे चाहिए जुनून... कल्पना... रोमांस...और इसके लिए उसे सहारा मिलता है साहित्य का.
बस फिर क्या था- कहानियां लिखी जाती हैं, कल्पनाएं उड़ान भरती हैं और फिल्म धीरे-धीरे एक रंगीन, शरारती और थोड़ी ओवर-द-टॉप दुनिया में बदल जाती है. विशाल यहां पूरी तरह मस्ती के मूड में हैं. हैदराबादी लहजा, रंगीन माहौल, अदिति और सिद्दार्थ की जमकर एक्टिंग, गजराज राव का मजेदार अंदाज- सब मिलकर फिल्म को एक अलग ही स्वाद देते हैं. कहानी का नतीजा शायद पहले से समझ आ जाए, लेकिन मजा रास्ते में है. और कुछ डायलॉग तो ऐसे हैं कि लेखक साहब ने कल्पना की बाल्टी पूरी भरकर उड़ेल दी है.
तो कुल मिलाकर कैसी है Lust Stories 3?
सबसे दिलचस्प बात ये है कि इसे देखने के बाद मन नहीं करता कि चारों कहानियों की आपस में रैंकिंग बनाई जाए. और शायद यही इसकी सबसे बड़ी जीत है. चारों कहानियां पूछती हैं कि लस्ट आखिर है क्या? और इसका फील होना गलत है क्या?
कहीं वो शादी में खो चुकी चाहत है. कहीं महत्वाकांक्षा हासिल करने का हथियार. कहीं टूटते रिश्ते को कुछ देर और जिंदा रखने की कोशिश. और कहीं अपनी इच्छा को पहचानने और उसे शब्द देने की आजादी.
लस्ट स्टोरीज सिर्फ बेडरूम की कहानी नहीं है. ये उम्र, शादी, समाज, ईगो, अकेलेपन, कल्पना और आत्मसम्मान से भी जुड़ी चीज है. फिल्म की चारों कहानियां परफेक्ट नहीं हैं. कहीं कहानी हल्की पड़ती है, कहीं संवाद जरूरत से ज्यादा समझाने लगते हैं और कहीं डायरेक्टर थोड़ा ज्यादा मस्ती में बह जाते हैं. लेकिन पूरी फिल्म के स्तर पर ये विविधता ही इसका असली मसाला है.
Lust Stories 3 कोई ऐसी एंथोलॉजी नहीं जिसे देखकर आप तय करें कि कौन जीता और कौन हारा. ये चार अलग-अलग कमरों में झांकती है और हर कमरे में चाहत का एक नया चेहरा दिखाती है. और आखिर में बात बस इतनी-सी है कि इंसान जिंदगी भर प्लॉट बनाने में लगा रहता है, लेकिन असली कहानी तो उन्हीं पलों में बनती है जिनकी उसने कभी स्क्रिप्ट लिखी ही नहीं होती.
अगर आपको रिश्तों की पेचीदगी, शहरी रोमांस, थोड़ी शरारत और चार अलग-अलग डायरेक्टोरियल फ्लेवर वाली एंथोलॉजी पसंद है- तो जरूर देखें.
आरती गुप्ता