Batwara 1947 Review: बंटवारे की नफरत नहीं, इंसानियत का नया चेहरा है सनी देओल की फिल्म, भर आएगा दिल

भारत देश को आजाद हुए 79 साल बीत गए हैं. लेकिन एक दर्द आज भी लोगों के मन में जिंदा है- बंटवारा. आज ही के दिन 14 अगस्त को देश के दो हिस्से हुए, भारत-पाकिस्तान. नफरत की आग में कई लोग जले, लेकिन कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने धर्म भुलाकर इंसानियत दिखाई. उसी इंसानियत से जुड़ी एक कहानी 'बंटवारा 1947' फिल्म के रूप में आई है. कैसी है ये फिल्म? पढ़िए हमारा रिव्यू...

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बंटवारे से जुड़ी दिल छूने वाली कहानी! (Photo: Screengrab) बंटवारे से जुड़ी दिल छूने वाली कहानी! (Photo: Screengrab)

पर्व जैन

  • नई दिल्ली,
  • 14 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 7:04 PM IST
फिल्म:बंटवारा 1947
3.5/5
  • कलाकार : सनी देओल, प्रीति जिंटा, शबाना आजमी, अभिमन्यु सिंह
  • निर्देशक :राजकुमार संतोषी

कुछ दर्द ऐसे होते हैं, जिन्हें शब्दों में बयां कर पाना बेहद मुश्किल है. उस दर्द को वही लोग समझ सकते हैं, जो उससे गुजरे हैं. 14 अगस्त 1947 के दिन लाखों-करोड़ों लोगों ने एक ऐसा दर्द झेला, जिसकी कल्पना कोई नहीं कर सकता. भारत-पाकिस्तान, ये दो देश धर्म के नाम पर बनकर अलग हो गए. बंटवारे में दोनों देशों के अंदर क्या-क्या हुआ, ये तो हर कोई जानता है. मगर इसी बीच एक ऐसी कहानी का भी जन्म हुआ जिसने धर्म, जाति, भेदभाव- इन सभी चीजों को इंसानियत के दम पर अलग कर दिया. 

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मशहूर राइटर असगर वजाहत ने बंटवारे के हादसों पर आधारित एक नाटक 'जिस लाहौर नई वेख्या, ओ जम्या ए नई' का निर्माण किया था, जिसका मतलब है कि जिसने लाहौर नहीं देखा, वो जन्मा ही नहीं. इसी नाटक पर डायरेक्टर राजकुमार संतोषी और आमिर खान अपनी फिल्म 'बंटवारा 1947' लाए हैं, जिसमें सनी देओल, प्रीति जिंटा, शबाना आजमी जैसे मेगा स्टार्स शामिल हैं. आज बंटवारे के ही दिन रिलीज हुई ये फिल्म हमें कैसी लगी? आइए, आपको विस्तार से बताते हैं. 

क्या है बंटवारा 1947 की कहानी?

मेरठ के एक प्रिंटिंग खारखाने के मालिक सिकंदर मिर्जा (सनी देओल) अपने परिवार के साथ भारत की आजादी का जश्न मनाने के लिए तैयार हैं. शहर में उनकी हर कोई बड़ी इज्जत करता है. मगर आसपास हो रहे हिंदू-मुसलमान दंगों के कारण उन्हें अपना देश छोड़कर पाकिस्तान के लाहौर जाना पड़ता है. अपनी पत्नी हामिदा (प्रीति जिंटा), बेटे जावेद (करण देओल) और बेटी तन्नू (खुशी हजारे) के साथ वो लाहौर जाने वाली ट्रेन में बैठ चुके होते हैं, लेकिन किसी कारण से उसका बेटा जावेद नहीं आ पाता. मिर्जा अपने परिवार के साथ अब लाहौर आ चुका है, जहां उसे हबीब अख्तर काजमी (अली फजल) एक घर दिलाने में मदद करता है.

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मगर उस घर में पहले से ही एक बूढ़ी औरत दुर्गावति किशनपाल देवी यानी माई (शबाना आजमी) रह रही होती हैं. वो घर उनके बेटे रतन का है, जो बंटवारे की आग में अपने पूरे परिवार सहित झुलस चुका है. मिर्जा और उसका परिवार एक हिंदू बुढ़िया को अपने घर में पनाह देने के लिए याकूब खान (अभिमन्यु सिंह) के निशाने पर हैं. इस वजह से लाहौर की गलियों में फिर से उग्रवाद बढ़ने लगता है. याकूब किसी भी कीमत पर माई को घर से बाहर निकालना चाहता है. इस कोशिश में वो मिर्जा के परिवार पर भी हमला करता है. ऐसे में सिकंदर मिर्जा इस धर्म के कारण फैली नफरत से कैसे अपने परिवार और बूढ़ी माई को बचाएगा? यही पिक्चर का बेसिक प्लॉट है. 

रौंगटे खड़े करती है बंटवारे की ये कहानी

पिक्चर की कहानी वैसे काल्पनिक है, यानी इसका असल जिंदगी से कोई कनेक्शन नहीं है. लेकिन इस काल्पनिक कहानी ने वही बंटवारे का दर्द दोबारा जिंदा किया, जिसमें कोई नफरत या ओवर द टॉप ड्रामा नहीं डाला गया. बल्कि एक साधारण सी कहानी बताई गई, जो इंसानियत और मां के इमोशन्स पर रखी गई. 

बंटवारा 1947 फिल्म अपने हर किरदार के साथ छिपे इमोशन को बड़ी खूबसूरती से पेश करती है. सनी देओल-प्रीति जिंटा के किरदारों के साथ विभाजन के दौरान जो कुछ हुआ, वो इमोशन आप फील भी करते हैं. इसके अलावा, आपको शबाना आजमी के साइड की कहानी भी रुलाती है. एक दुखियारी मां, जो अपने बच्चे का इंतजार करते हुए अपना दम तोड़ देती है उस मां का दर्द आप फिल्म खत्म होने तक महसूस करते हैं.

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फिल्म के अंदर सिर्फ एक कमी ये है कि इसकी लंबाई एक समय बाद खटकने लगती है. इसके गाने भी उतने यादगार नहीं जिसे आप थिएटर के बाहर निकलकर सुन सकें. ए आर रहमान का बैकग्राउंड स्कोर अच्छा है, मगर उनसे हमेशा बेहतर की उम्मीद की जाती है. 

नफरत नहीं, इंसानियत सिखाती है बंटवारा

फिल्म के अंदर किसी भी धर्म- चाहे वो हिंदू हो या मुसलमान उसकी भावनाओं के साथ बिल्कुल भी खिलवाड़ नहीं करती है. बल्कि ये आपको इंसानियत का एक ऐसा रूप दिखाती है, जो शायद आज से पहले इंडियन सिनेमा में कभी नहीं देखा गया. इसमें किसी भी धर्म को नीचा नहीं दिखाया, बस आपके एक बात समझाई गई है- कोई धर्म बुरा नहीं होता, अच्छे-बुरे लोग होते हैं. 

डायरेक्टर राजकुमार संतोषी ने आज के समय अनुसार, एक ऐसे सिनेमा की रचना की है जिसे देखना सचमुच काफी शानदार एक्सपीरियंस होता है. जहां हर तरफ नफरत और नेगेटिविटी फैली है, वहां ये फिल्म आपको थोड़ी पॉजिटिविटी की तरफ ले जाती है. फिल्म के अंदर कई सारे ऐसे मोमेंट्स हैं, जब आप ये सोचने पर मजबूर हो जाएंगे कि क्या राजनीति के लिए धर्म का सहारा सही बात है या नहीं. 

यहां देखें बंटवारा 1947 का ट्रेलर:

सनी देओल की दमदार परफॉर्मेंस, याद रह जाएंगी शबाना आजमी

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इस फिल्म से पहले जो कोई भी ये सोच रहा था कि सनी देओल एक और 'गदर' टाइप फिल्म लाए हैं, तो आप एकदम गलत हैं. बंटवारा 1947 में सनी बिल्कुल ही अलग किरदार में नजर आए हैं. उनका एक्शन सिर्फ उतना ही है, जितना आपने टीजर-ट्रेलर में देखा. बाकी पूरी फिल्म उनके किरदार मिर्जा, और माई के इमोशन्स के इर्द-गिर्द घूमती है. सनी ने अपने किरदार में पूरी जान झोंकी और सचमुच ये उनके करियर की बेहतरीन फरफॉर्मेंस में से एक है. 

शबाना आजमी की बात करें, तो असल मायनों में वो इस फिल्म की आत्मा हैं. उन्होंने अपने किरदार में पूरी ईमानदारी दिखाई. कुछ पल के लिए आपको भी ऐसा लगने लगेगा कि वो सचमुच किसी की मां हैं. एक मां के दर्द को शबाना जी ने अपने एक्सपीरियंस के साथ बखूबी पेश किया. अंत में वो आपको खूब रुलाने भी वाली हैं, तो उसके लिए भी तैयार रहिएगा.

प्रीति का बॉलीवुड कमबैक

वहीं प्रीति जिंटा की बात करें, तो ये उनका परफेक्ट बॉलीवुड कमबैक माना जा सकता है. उन्होंने भी हामिदा का किरदार खूबसूरती से निभाया है. उन्हें लंबे वक्त के बाद बड़े पर्दे पर देखना एक सुकून भरा एहसास छोड़ जाता है. करण देओल भी इस फिल्म में हैं, मगर उनका काम कोई असर नहीं छोड़ता है. सनी के बेटे को देखकर ऐसा लगता है कि अभी उन्हें अपने एक्सप्रेशन्स पर काम करने की सख्त जरूरत है. 

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अली फजल भी हैं, जिनका इसमें एक स्पेशल रोल है. वो जितनी देर के लिए स्क्रीन पर आते हैं, अपनी छाप छोड़ जाते हैं. अभिमन्यु सिंह बंटवारा 1947 फिल्म में मेन विलेन की भूमिका में हैं. उनका काम भी लाजवाब है, अपने रोल से उन्होंने फिल्म में खौफ पैदा करने का काम काफी अच्छे से किया है. कुल मिलाकर अगर आप एक इमोशन हेवी फिल्म देखना चाहते हैं, और इंसानियत पर विश्वास रखते हैं तो सनी की नई फिल्म आपके लिए ही बनी है. उम्मीद है कि ये फिल्म आपके अंदर नफरत खत्म कर इंसानियत की नई उम्मीद उजागर करेगी. 

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