अखिलेश यादव के सारथी बने शिवपाल... कहीं बदायूं में बिगड़ न जाए बीजेपी का खेल, जानें क्या है रणनीति

पश्चिमी यूपी और रुहेलखंड के दिग्गज ओबीसी, दलित व सवर्ण नेताओं को समाजवादी पार्टी में शामिल कराकर अखिलेश यादव ने 'मिशन 2027' के तहत 'पीडीए' का दायरा और बड़ा कर दिया है, जिससे बीजेपी और बसपा के पारम्परिक वोटबैंक में सीधी सेंधमारी कर 'साइकिल' को नई रफ्तार दी जा सके.

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बीजेपी और बसपा से आए नेताओं से सपा को होगा फायदा (Photo-ITG) बीजेपी और बसपा से आए नेताओं से सपा को होगा फायदा (Photo-ITG)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 26 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 9:25 PM IST

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की जंग अब सिर्फ नारों तक सीमित नहीं रही, बल्कि जमीन पर बिसात बिछाई जाने लगी है. पश्चिमी यूपी और रुहेलखंड के सबसे निर्णायक सियासी गढ़ माने जाने वाले मुजफ्फरनगर, बदायूं-बरेली के आसपास के इलाकों में बसपा और बीजेपी के असंतुष्ट नेताओं को अपने पाले में लाकर सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने 'मिशन रुहेलखंड' को तेज कर दिया है.

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सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव शिवपाल सिंह यादव की मौजूदगी में पूर्व विधायक सिनोद शाक्य, पूर्व विधायक कुशाग्र सागर, दारा सिंह प्रजापति, अजय कुमार और पूर्व आईएएस अधिकारी राम बहादुर पासी सहित चार दर्जन से अधिक नेताओं ने सोमवार को सपा का दामन थामा.

बीजेपी और बसपा के पूर्व विधायकों तथा नेताओं को जिस तरह से अखिलेश यादव ने अपने साथ मिलाया है, उससे सीतापुर से लेकर बदायूं और मुजफ्फरनगर तक सपा की साइकिल को नई रफ्तार मिलती दिख रही है. इन नेताओं की जॉइनिंग से पश्चिमी यूपी और रुहेलखंड के जातीय समीकरणों में बड़ा फेरबदल होने के साथ 2027 में बीजेपी को मात देने की सपा रणनीति भी साफ नजर आने लगी है.

सपा में कौन-कौन से नेता हुए शामिल?

समाजवादी पार्टी के प्रदेश मुख्यालय में सोमवार को अखिलेश यादव की साइकिल पर कई नेता सवार हुए. इनमें अजय कुमार (पूर्व विधायक), राम बहादुर पासी (पूर्व आईएएस अफसर), पूर्व विधायक कुशाग्र सागर, कालीचरण, पूर्व सांसद प्रत्याशी दारा सिंह प्रजापति, प्रदीप पांडेय, रामशंकर गौतम, बलवीर पाल, सगीरा परवीन और आदित्य शर्मा (मुरादाबाद) के नाम प्रमुख हैं.

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मेरठ के जिला पंचायत सदस्य अश्वनी शर्मा भी भाजपा छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए. इसके अलावा बदायूं के दिग्गज ओबीसी नेता सिनोद शाक्य और केसी शाक्य ने भी सपा का दामन थाम लिया. सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि नए साथियों के आने से पूर्वांचल और पश्चिमी यूपी की राजनीति में हलचल है. PDA तो पहले से मजबूत है, लेकिन नए लोगों के जुड़ने से इसकी ताकत और बढ़ेगी. अखिलेश यादव ने कहा कि नए साथियों के आने से PDA परिवार का दायरा और बड़ा होगा.

बदायूं में सपा ने बीजेपी को दिया झटका

बदायूं की दातागंज सीट से बसपा से दो बार विधायक रहे सिनोद शाक्य ने बीजेपी छोड़कर सपा का दामन थाम लिया है. सिनोद शाक्य का पूरे बदायूं जिले के शाक्य-मौर्य समुदाय में खासा दबदबा माना जाता है. सिनोद शाक्य के साथ बीजेपी नेता केसी शाक्य भी सपा में शामिल हो गए हैं. केसी शाक्य की भाभी विनीता शाक्य बदायूं क्षेत्र के म्यांऊ ब्लॉक की ब्लॉक प्रमुख हैं.

बदायूं और आसपास की सीटों पर गैर-यादव ओबीसी वोट बैंक (खासकर शाक्य/मौर्य वर्ग) पर बीजेपी की गहरी पकड़ रही है. सिनोद शाक्य के आने से बदायूं में बीजेपी का पारंपरिक शाक्य वोट सपा के 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) गठबंधन के साथ मजबूती से जुड़ेगा. बदायूं बेल्ट में गैर-यादव ओबीसी वोटों को जोड़ने की रणनीति के लिहाज से सिनोद शाक्य और केसी शाक्य सपा का मजबूत दांव माने जा रहे हैं.

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बदायूं की बिसौली (सुरक्षित) सीट से 2017 में बीजेपी के विधायक रहे कुशाग्र सागर का परिवार तीन दशकों से बदायूं की राजनीति में स्थापित नाम है. उनके पिता योगेंद्र सागर भी बदायूं के बड़े राजनीतिक रसूखदार रहे हैं. कुशाग्र सागर के आने से बदायूं की सुरक्षित सीटों पर मौर्य-शाक्य-सैनी और सागर (दलित) समुदायों के बीच सपा की पकड़ बेहद मजबूत हो जाएगी. बिसौली सीट पर बीजेपी के मजबूत आधार में यह सीधी सेंधमारी है.

दलित-ब्राह्मण वोटों को जोड़ने का सपा प्लान

सपा का पूरा फोकस अपने सियासी समीकरण को मजबूत करने का है. बीजेपी के वरिष्ठ सवर्ण चेहरे के तौर पर जाने जाने वाले चंद्र कुमार मिश्र ने बीजेपी का दामन छोड़कर सपा का झंडा थामा है. चंद्र कुमार मिश्र सीतापुर से ब्लॉक प्रमुख रह चुके हैं, जिनके आने से सीतापुर में सपा का ब्राह्मण वोटों को साधने का दांव माना जा रहा है.

सपा पर अक्सर लगने वाले एकतरफा जातिगत ठप्पे को तोड़ने में सवर्ण नेताओं की जॉइनिंग मददगार बनती है. चंद्र कुमार मिश्र के आने से सवर्ण व ब्राह्मण वोटर्स के बीच सपा की स्वीकार्यता बढ़ाने में मदद मिलेगी. साथ ही पासी समाज से ताल्लुक रखने वाले राम बहादुर पासी बीजेपी में दलित कैडर को साधने का काम करते रहे हैं, जो अब सपा की साइकिल पर सवार हो गए हैं.

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उत्तर प्रदेश में गैर-जाटव दलितों में पासी समाज दूसरी सबसे बड़ी आबादी है. राम बहादुर पासी के सपा में आने से रुहेलखंड और अवध से सटे इलाकों में पासी वोट बैंक को सपा के पाले में लाने की रणनीति को सीधी धार मिलेगी. इसके अलावा दलित नेता अजय कुमार भी सपा में शामिल हो गए हैं, वहीं मुजफ्फरनगर लोकसभा से बसपा के उम्मीदवार रहे दारा सिंह प्रजापति के सपा में आने से ओबीसी वोटों को ताकत मिलेगी.

रुहेलखंड में बीजेपी को मात देने की सपा की रणनीति

बरेली-बदायूं-फर्रुखाबाद-मैनपुरी बेल्ट में शाक्य, मौर्य, सैनी और कुशवाहा आबादी निर्णायक भूमिका निभाती है. बीजेपी की 2014 से लेकर 2022 तक की जीत में इस वोट बैंक का बड़ा योगदान रहा है. सिनोद शाक्य और केसी शाक्य को साथ लाकर अखिलेश यादव ने बीजेपी के इसी कोर 'गैर-यादव ओबीसी' वोटबैंक की घेराबंदी कर दी है.

2024 के लोकसभा चुनाव में शिवपाल सिंह यादव ने बदायूं सीट पर जीत दर्ज कर यह साबित किया था कि स्थानीय समीकरणों को कैसे साधा जाता है. अब बिसौली से कुशाग्र सागर और दातागंज से सिनोद शाक्य जैसे पूर्व विधायकों को सपा में शामिल कराकर पूरी बदायूं लोकसभा और आसपास की विधानसभा सीटों पर बीजेपी की घेराबंदी मजबूत की जा रही है. इसके अलावा पिछले दिनों आंवला से दो बार के सांसद रहे धर्मपाल सिंह कश्यप को अखिलेश ने अपने साथ लाकर बड़ा झटका दिया था.

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'PDA' का जमीनी संतुलन (पिछड़ा, दलित, सवर्ण)

शाक्य (ओबीसी), सागर व पासी (दलित) और चंद्र कुमार मिश्र (सवर्ण) के समावेश से सपा ने 2027 से पहले यह संदेश देने की कोशिश की है कि पार्टी का 'पीडीए' का दायरा सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं है. बीजेपी के नाराज कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों को जोड़कर सपा हर बूथ पर अपना सोशल इंजीनियरिंग का ढांचा मजबूत कर रही है.

बरेली-बदायूं बेल्ट में इन प्रमुख नेताओं की जॉइनिंग महज औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह बीजेपी के गढ़ रुहेलखंड में अखिलेश यादव का बड़ा रणनीतिक हमला है. पूर्व विधायकों का अपना खुद का स्थानीय कैडर और 'पॉकेट वोट' होता है. इन नेताओं के सपा में आने से न केवल 2027 के विधानसभा चुनाव में कई सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय या सपा के पक्ष में झुकेगा, बल्कि बीएसपी और बीजेपी दोनों के पारंपरिक वोटबैंक में बड़ी खलबली मचनी तय है.

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