सपा में टूट या BJP का माइंड गेम? 2027 से पहले गरमाई यूपी की सियासत

बंगाल में टीएमसी और महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) में टूट की खबरों के बीच अब समाजवादी पार्टी को लेकर भी अटकलों का बाजार गर्म है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हाल के दिनों में विपक्षी दलों में लगातार हो रही टूट ने इस तरह की चर्चाओं को हवा दी है.

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समाजवादी पार्टी ने बीजेपी और उसके सहयोगी दलों के इन दावों को पूरी तरह खारिज किया है. (File Photo: ITG) समाजवादी पार्टी ने बीजेपी और उसके सहयोगी दलों के इन दावों को पूरी तरह खारिज किया है. (File Photo: ITG)

कुमार अभिषेक

  • लखनऊ,
  • 18 जून 2026,
  • अपडेटेड 4:44 PM IST

उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले एक नया सियासी नैरेटिव तेजी से आकार ले रहा है. सवाल उठ रहा है कि क्या समाजवादी पार्टी में वास्तव में टूट का खतरा है, या फिर यह बीजेपी की मनोवैज्ञानिक रणनीति है, जिसके जरिए मुख्य विपक्षी दल का मनोबल कमजोर करने की कोशिश की जा रही है.

दरअसल, बंगाल में टीएमसी और महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) में टूट की खबरों के बीच अब समाजवादी पार्टी को लेकर भी अटकलों का बाजार गर्म है. इसकी शुरुआत उस समय हुई जब बीजेपी के सहयोगी और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि सपा के करीब 30 सांसद कभी भी पार्टी छोड़ सकते हैं. 

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इसके कुछ ही घंटों बाद उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने भी ऐसा ही दावा करते हुए कहा कि समाजवादी पार्टी के 25-26 सांसद किसी भी समय अलग हो सकते हैं, लेकिन बीजेपी फिलहाल उन्हें शामिल नहीं कर रही है. उन्होंने यह भी कहा कि 2027 के चुनाव के बाद सपा की स्थिति टीएमसी से भी ज्यादा खराब हो सकती है.

वहीं निषाद पार्टी के प्रमुख संजय निषाद ने भी इस दावे को आगे बढ़ाते हुए कहा कि टूटने वाले सांसद उनके संपर्क में हैं और वह इस संबंध में बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व से बातचीत करेंगे.

क्यों तेज हुई टूट की चर्चा?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हाल के दिनों में विपक्षी दलों में लगातार हो रही टूट ने इस तरह की चर्चाओं को हवा दी है. पश्चिम बंगाल में टीएमसी और महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव गुट) के भीतर उभरे संकट के बाद अब समाजवादी पार्टी को लेकर भी ऐसे दावे किए जा रहे हैं.

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क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में बीजेपी को कड़ी चुनौती दी थी, इसलिए 2027 के विधानसभा चुनाव में भी उसे बीजेपी की सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी माना जा रहा है. ऐसे में सपा को राजनीतिक रूप से कमजोर दिखाने की कोशिशों को चुनावी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.

ऐसा नहीं है कि सिर्फ ओमप्रकाश राजभर के बोलने मात्र से सपा के भीतर टूट की चर्चाओं ने जन्म लिया है. दरअसल सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भी कुछ ऐसे बयान दिए जिसने इन आशंकाओं को और गहरा कर दिया. अखिलेश यादव ने कहा कि बीजेपी से लड़ने के लिए मजबूत साथियों की जरूरत है. यही नहीं, उन्होंने कहा कि जो कमजोर होंगे, वही अपना दल छोड़कर जाएंगे. हालांकि उनके कहने का संदर्भ टीएमसी और शिवसेना उद्धव में हुई टूट के एक सवाल के जवाब में था.

सपा का पलटवार, बताया फेक नैरेटिव

समाजवादी पार्टी ने बीजेपी और उसके सहयोगी दलों के इन दावों को पूरी तरह खारिज किया है. पार्टी नेताओं का कहना है कि ओमप्रकाश राजभर केवल अफवाह फैला रहे हैं और बीजेपी जानबूझकर झूठा माहौल बना रही है. सपा का आरोप है कि बीजेपी अयोध्या में सामने आए कथित चंदा चोरी विवाद से जनता का ध्यान भटकाने के लिए इस तरह का नैरेटिव गढ़ रही है. पार्टी का कहना है कि यह विपक्ष को कमजोर दिखाने की सुनियोजित कोशिश है.

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क्या वास्तव में संभव है सपा में बड़ी टूट?

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में समाजवादी पार्टी के भीतर बड़े स्तर पर टूट होना आसान नहीं है. हालांकि कुछ सांसदों को लेकर समय-समय पर राजनीतिक चर्चाएं जरूर होती रही हैं, विशेषकर पूर्वांचल के एक सांसद को लेकर, जिनका नाम पहले भी दल-बदल की अटकलों में सामने आता रहा है.

फिर भी विशेषज्ञों का कहना है कि भले ही वास्तविक टूट मुश्किल हो, लेकिन टूट का नैरेटिव बनाकर विपक्ष को कमजोर करने की रणनीति जरूर अपनाई जा सकती है.

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