उत्तर प्रदेश के पश्चिमी छोर पर स्थित सहारनपुर की पहचान सिर्फ चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं है. लकड़ी पर बारीक नक्काशी के काम से अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाने वाले इस जिले में धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक विरासत की कई परतें मौजूद हैं. एक ओर देवबंद स्थित दारुल उलूम है, तो दूसरी ओर शाकंभरी सिद्धपीठ और त्रिपुरा बाला सुंदरी सिद्धपीठ जैसे धार्मिक स्थल. यही विविधता सहारनपुर को प्रदेश के दूसरे जिलों से अलग पहचान देती है.
सहारनपुर की सीमाएं उत्तराखंड और हरियाणा से लगती हैं. भौगोलिक स्थिति के साथ-साथ यहां की सामाजिक संरचना भी राजनीतिक दलों के लिए खास मायने रखती है. हिंदू, मुस्लिम और दलित आबादी के बीच चुनावी समर्थन जुटाना यहां की राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है. ऐसे में सहारनपुर की सियासत को समझने के लिए इसके राजनीतिक इतिहास से लेकर विधानसभा सीटों के नतीजों तक पर नजर डालना जरूरी है.
धार्मिक विरासत और लकड़ी के कारोबार से बनी अलग पहचान
सहारनपुर का नाम आते ही लकड़ी पर नक्काशी से तैयार होने वाले फर्नीचर और सजावटी सामान की याद आती है. यहां के कारीगरों का काम देश के विभिन्न हिस्सों में पसंद किया जाता है. बड़े स्तर पर इन उत्पादों का निर्यात भी होता है. इस पारंपरिक कारोबार ने सहारनपुर को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई है. धार्मिक दृष्टि से भी यह जिला महत्वपूर्ण स्थान रखता है. देवबंद में स्थित दारुल उलूम इस्लामी शिक्षा की एक प्रमुख संस्था है. यहां से इस्लाम की शिक्षा के साथ एक विशिष्ट धार्मिक विचारधारा का भी प्रसार होता है. वहीं शाकंभरी सिद्धपीठ और त्रिपुरा बाला सुंदरी सिद्धपीठ श्रद्धालुओं की आस्था के प्रमुख केंद्र हैं. सहारनपुर की सांस्कृतिक पहचान में शाह हारून चिश्ती और बाबा लाल दास की मित्रता का भी उल्लेख किया जाता है. इसे जिले में आपसी सद्भाव की परंपरा के प्रतीक के रूप में देखा जाता है. धार्मिक विविधता और सामाजिक मेलजोल की यह विरासत जिले की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है.
सहारनपुर की राजनीति में रशीद मसूद का बड़ा नाम
सहारनपुर की राजनीति का इतिहास रशीद मसूद के उल्लेख के बिना पूरा नहीं होता. उन्होंने स्थानीय राजनीति से आगे बढ़कर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई. वर्ष 1977 का लोकसभा चुनाव उनके राजनीतिक सफर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था. आपातकाल के बाद हुए इस चुनाव में उन्होंने जनता पार्टी के टिकट पर कांग्रेस के दिग्गज नेता सुंदर को हराया. इस जीत के साथ सहारनपुर लोकसभा सीट पर कांग्रेस का पुराना प्रभाव टूटा. रशीद मसूद के बाद सहारनपुर की राजनीति में मसूद परिवार का प्रभाव अलग रूप में सामने आया. इमरान मसूद उनके भतीजे हैं और उन्होंने कांग्रेस में अपनी राजनीतिक पहचान बनाई. परिवार के भीतर नेतृत्व को लेकर मतभेदों के बावजूद इमरान मसूद जिले की राजनीति में प्रमुख चेहरों में शामिल रहे हैं. इस समय कांग्रेस से सांसद हैं.
सहारनपुर जिले में सात विधानसभा सीटें हैं. इनमें बेहट, नकुड़, सहारनपुर नगर, सहारनपुर देहात, देवबंद, रामपुर मनिहारान और गंगोह शामिल हैं.
2022 में सात सीटों पर किसने दर्ज की जीत?
गंगोह: भाजपा के किरत सिंह ने समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी इंद्र सैन को 23,449 वोटों से हराया.
देवबंद: भाजपा के ब्रिजेश ने सपा के कार्तिकेय राणा को 7,104 वोटों से पराजित किया.
नकुड़: भाजपा के मुकेश चौधरी ने सपा के डॉ. धर्म सिंह सैनी को हराकर जीत हासिल की.
बेहट: इस सीट पर समाजवादी पार्टी के उमर अली खान ने जीत दर्ज की. उन्होंने भाजपा के नरेश सैनी को 37,880 वोटों के बड़े अंतर से हराया.
रामपुर मनिहारान: भाजपा के देवेंद्र कुमार निम ने बसपा के रविंद्र कुमार को 20,593 वोटों से हराया.
सहारनपुर देहात: इस सीट पर समाजवादी पार्टी के आशु मलिक ने भाजपा के जगत पाल को 30,745 वोटों से हराया.
सहारनपुर नगर: भाजपा के राजीव गुंबर ने समाजवादी पार्टी के संजय गर्ग को 7,434 वोटों से पराजित किया.
दलित और मुस्लिम आबादी क्यों है चुनावी गणित का अहम हिस्सा?
सहारनपुर के चुनावी समीकरणों में सामाजिक संरचना की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, जिले में हिंदू आबादी करीब 51 प्रतिशत और मुस्लिम आबादी करीब 46 प्रतिशत बताई जाती है. हिंदू आबादी में अनुसूचित जाति यानी एससी समुदाय की हिस्सेदारी 22 प्रतिशत से अधिक है. इन्हीं सामाजिक समीकरणों के कारण सहारनपुर को बहुजन समाज पार्टी की राजनीति के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में गिना जाता रहा है. मुस्लिम और दलित मतदाताओं का समर्थन जुटाना यहां लंबे समय तक बसपा की चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा रहा. कांग्रेस की राजनीति को भी जिले में मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन से मजबूती मिलती रही है.
कांशीराम से मायावती तक, सहारनपुर से जुड़ा बसपा का इतिहास
सहारनपुर का बहुजन राजनीति से पुराना संबंध रहा है. बसपा के संस्थापक कांशीराम ने वर्ष 1999 में सहारनपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था. हालांकि, उन्हें यहां जीत नहीं मिली. इसके बावजूद जिले का बहुजन राजनीति के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान बना रहा. बसपा प्रमुख मायावती का राजनीतिक सफर भी सहारनपुर से जुड़ा है. वर्ष 1996 में उन्होंने जिले की हरोड़ा विधानसभा सीट से चुनाव जीता था. बाद में इस सीट का नाम बदलकर सहारनपुर देहात हो गया. इस राजनीतिक विरासत ने सहारनपुर को बसपा के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र बनाए रखा. दलित मतदाताओं के बीच पार्टी की पहुंच और सामाजिक प्रतिनिधित्व की राजनीति ने लंबे समय तक यहां उसके प्रभाव को आकार दिया. लेकिन बदलते चुनावी नतीजों ने यह भी दिखाया कि जिले में किसी एक दल का दबदबा स्थायी नहीं रहा.
सहारनपुर में बहुजन राजनीति के सामने कई सालों से नई चुनौती भी दिखाई दी है. आजाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर का संबंध इसी जिले से है और उन्होंने अपनी राजनीतिक गतिविधियों की शुरुआत भी यहीं से की. बाद में वह बिजनौर जिले की नगीना लोकसभा सीट से सांसद बने.
गुर्जर, ठाकुर, सैनी और कश्यप मतदाताओं पर भाजपा की नजरसहारनपुर में भाजपा की चुनावी रणनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच अपना समर्थन बढ़ाना रहा है. गुर्जर, ठाकुर, सैनी और कश्यप मतदाताओं को पार्टी के लिए अहम माना जाता है. इन समुदायों के बीच समर्थन जुटाने की कोशिशों ने जिले में भाजपा की राजनीतिक स्थिति को मजबूत करने में भूमिका निभाई है.
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