तीखे तेवर से सॉफ्ट मोड तक... यूपी कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष बनते ही क्यों बदल गए इमरान मसूद के सुर

उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के चुनावों से पहले बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. हाल ही में यूपी कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष बने सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद के सुर समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव के प्रति अचानक नरम पड़ गए हैं. कल तक सीट शेयरिंग को लेकर आक्रामक तेवर दिखाने वाले मसूद अब आपसी तालमेल और एकजुटता पर जोर दे रहे हैं.

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अखिलेश यादव और इमरान मसूद की केमिस्ट्री (Photo-ITG) अखिलेश यादव और इमरान मसूद की केमिस्ट्री (Photo-ITG)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 13 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 12:48 PM IST

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की सियासी सरगर्मी बढ़ने के साथ ही बयानों के तीर और बदलते सियासी समीकरणों का दौर शुरू हो चुका है. पश्चिमी यूपी के कद्दावर नेता और सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद का नाम हमेशा से अपने बेबाक और तीखे बयानों के लिए जाना जाता रहा है. हालांकि, समाजवादी पार्टी को लेकर अब तक आक्रामक तेवर अपनाने वाले इमरान मसूद के सुर अचानक बदल गए हैं और वे अखिलेश यादव के प्रति काफी नरम पड़ गए हैं.

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कुछ समय पहले तक इमरान मसूद सपा को दो-टूक भाषा में गठबंधन फाइनल करने और कांग्रेस की हिस्सेदारी तय करने की चेतावनी दे रहे थे. लेकिन अब वे कहते नजर आ रहे हैं कि अखिलेश यादव जो भी व्यावहारिक प्रस्ताव देंगे, हम उसे मानने को तैयार हैं."

कांग्रेस आलाकमान द्वारा इमरान मसूद को उत्तर प्रदेश कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किए जाने के बाद सीट शेयरिंग और सपा से रिश्तों को लेकर उनके बयानों में यह भारी बदलाव देखा जा रहा है. आइए समझते हैं कि इमरान मसूद के इस मेकओवर के पीछे की सियासी रणनीति क्या है.

पहले: जब सपा और अखिलेश पर साधे थे तीखे निशाने

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के कुल 6 सांसद हैं और सपा के साथ सीट शेयरिंग को लेकर सबसे ज्यादा मुखर सहारनपुर से सांसद इमरान मसूद ही नजर आ रहे थे. यूपी कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बनने से ठीक पहले तक इमरान मसूद लगातार सपा पर जल्द से जल्द सीटों का बंटवारा तय करने का दबाव बना रहे थे.

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उन्होंने यहाँ तक कह दिया था कि कांग्रेस सहारनपुर की उन सभी 5 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी, जिन पर उसने 2017 में चुनाव लड़ा था. उन्होंने कहा था कि अखिलेश यादव को अगर 'बड़े भाई' के रोल में रहना है तो दिल बड़ा करना पड़ेगा.

इमरान मसूद ने आरोप लगाया था कि समाजवादी पार्टी को न तो कोई बड़ा मुस्लिम नेता बर्दाश्त होता है और न ही कोई ऐसा नेता जो खुलकर अपनी बात रखे. आजम ख़ान, अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा था कि सपा नेतृत्व संकट के समय मुस्लिम नेताओं के साथ खड़ा दिखाई नहीं देता.

उन्होंने यह भी कहा था कि सपा इस गलतफहमी में न रहे कि उसने अकेले 2024 में बीजेपी को हराया है. मसूद ने चेतावनी दी थी, "यह 2017 वाली कांग्रेस नहीं, 2027 वाली कांग्रेस है, इसलिए हमारे सम्मान का ध्यान रखा जाए." इमरान मसूद के इन बयानों से सपा खेमे में खासा असंतोष था.

अब: कार्यकारी अध्यक्ष बनते ही दिखे एकजुटता के सुर

उत्तर प्रदेश कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किए जाने के बाद इमरान मसूद के सियासी सुर पूरी तरह बदल चुके हैं. अब वे सपा के साथ गठबंधन धर्म और एकजुटता की पैरवी कर रहे हैं. सपा के साथ सीट शेयरिंग पर उन्होंने कहा कि सीटें कौन कितनी लड़ेगा, यह कोई विवाद का मुद्दा नहीं है. हमारा मकसद बड़ा है और अखिलेश यादव हमारे सहयोगी हैं

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इमरान मसूद का अब कहना है कि उनका और कांग्रेस का एकमात्र लक्ष्य 2027 में बीजेपी को सत्ता से बाहर करना है. सीट शेयरिंग पर उन्होंने कहा कि सीटें कौन कितनी लड़ेगा, यह कोई विवाद का मुद्दा नहीं है. हमारा मकसद बड़ा है और अखिलेश यादव हमारे सहयोगी हैं.

इमरान मसूद का कहना है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में जनता ने सपा-कांग्रेस गठबंधन को जो समर्थन दिया था, उसे 2027 में भी पूरी तरह से कायम रखना है. वे मुस्लिम, दलित और पिछड़ा वर्ग (PDA) के वोटों को बिखरने से बचाने की बात दोहरा रहे हैं. इमरान मसूद के बयानों से स्पष्ट हो रहा है कि विपक्षी दलों के बीच सीटों का बंटवारा कोई विवाद का मुद्दा नहीं बनेगा. उनका कहना है कि प्राथमिकता सीटों के आंकड़ों पर उलझने की बजाय बीजेपी को सत्ता से बाहर करने के लिए मजबूत रणनीति बनाने की है.

अतीत की कड़वाहट को दरकिनार करते हुए इमरान मसूद अब अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी के नेतृत्व के साथ बेहतर तालमेल की बात कह रहे हैं. ऐसे में सवाल उठने लगा है कि आखिर इमरान मसूद के सुर क्यों बदल गए हैं और अखिलेश यादव की मुस्लिम सियासत से लेकर सीट शेयरिंग तक पर वे तालमेल बनाकर चलने की बात क्यों कर रहे हैं. वो अब कह रहे हैं कि अखिलेश यादव सीट शेयरिंग पर जो व्यावहारिक प्रस्ताव रखेंगे, कांग्रेस उसे स्वीकार करने के लिए तैयार है, क्योंकि मुख्य मकसद भाजपा को हराना है.

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सपा को लेकर इमरान मसूद के तेवर क्यों नरम पड़ गए

कांग्रेस हाईकमान के द्वारा यूपी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने के बाद इमरान मसूद के कंधों पर पूरे प्रदेश में पार्टी और 'INDIA' गठबंधन को मजबूती देने का दारोमदार है. यही वजह है कि वे गठबंधन के बीच किसी भी तरह के मतभेद की खबरों को विराम देना चाहते हैं. सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस नेतृत्व ने इमरान मसूद को गठबंधन में अनावश्यक खटास न पैदा करने और संयमित बयानबाजी के निर्देश दिए हैं.

इमरान मसूद का एक जिले या क्षेत्र के बड़े नेता के तौर पर आक्रामक होना आसान था, लेकिन प्रदेश का कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद पूरे राज्य के राजनीतिक समीकरणों को साधने की चुनौती उनके कंधों पर आ गई है. इसीलिए अब वे सहारनपुर से बाहर अपना सियासी कद देखने लगे हैं. इसके अलावा कांग्रेस ने जिस तरह से अजय राय को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर सपा के प्रति नरम रुख अपनाने वाली आराधना मिश्रा को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है, उससे भी इमरान मसूद अलर्ट हो गए हैं.

इमरान मसूद खुद मानते हैं कि चुनाव से पहले ही सपा और कांग्रेस में खींचतान होने से इसका सीधा फायदा भाजपा को मिलेगा. इसलिए दोनों दलों का साथ रहना बेहद जरूरी है. सपा के बड़े नेता मसूद की पुरानी बयानबाजी से नाराज थे. एक जिम्मेदार पद पर आने के बाद मसूद ने सपा नेतृत्व को यह भरोसा दिलाया है कि वह गठबंधन के आड़े नहीं आएंगे.

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पश्चिमी यूपी में 'मुस्लिम-दलित-ओबीसी' समीकरण

पश्चिम उत्तर प्रदेश में इमरान मसूद का अपना खासा राजनीतिक प्रभाव है. सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, शामली और आसपास के इलाकों में मुस्लिम मतदाताओं के बीच उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है. 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और सपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फायदा गठबंधन को मिला था. इमरान मसूद जानते हैं कि अगर 2027 में भी वोटों का बिखराव रोका गया, तो बीजेपी को कड़ी टक्कर दी जा सकती है.

एक तरफ जहां असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM मुस्लिम बहुल सीटों पर सेंधमारी की फिराक में है, वहीं बीएसपी भी अपना आधार बचाने में जुटी है. ऐसे में इमरान मसूद का यह लचीला रुख मुस्लिम मतदाताओं के बीच भ्रम खत्म करने की रणनीति का हिस्सा है. इमरान मसूद के इस लचीले रवैये से साफ है कि कांग्रेस और सपा आगामी विधानसभा चुनाव मिलकर लड़ने के मूड में हैं.

सपा के प्रति इमरान मसूद की यह नरमी केवल एक व्यक्तिगत बदलाव नहीं, बल्कि 2027 के चुनाव में बीजेपी के खिलाफ एक मजबूत और एकजुट मोर्चा खड़ा करने की बड़ी सियासी रणनीति का नतीजा है. अपने कड़े तेवरों से उन्होंने कांग्रेस का दावा और वजन तो मजबूत कर दिया, लेकिन अब एक परिपक्व नेता की तरह वह अखिलेश यादव के पाले में गेंद डालकर सीट शेयरिंग को सुलझाने की राह आसान कर रहे हैं.

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इमरान मसूद का पुरानी कड़वाहट को भुलाकर अखिलेश यादव के साथ तालमेल बिठाना यह साबित करता है कि वे अब केवल क्षेत्रीय नेता नहीं, बल्कि प्रदेश स्तर पर बीजेपी के खिलाफ एक मजबूत मोर्चेबंदी की कमान संभालने की तैयारी में हैं. इसीलिए इन दिनों बदले-बदले इमरान मसूद नजर आ रहे हैं.

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