चरण सिंह का रिवॉल्ट, साथ आईं लेफ्ट और राइट पार्टियां, फिर UP में बनी पहली गैर कांग्रेसी सरकार!

1967 में उत्तर प्रदेश की राजनीति में ऐसा भूचाल आया, जिसने आजादी के बाद से सत्ता पर काबिज कांग्रेस के वर्चस्व को पहली बार बड़ी चुनौती दी. इस बगावत के कर्ता-धर्ता थे चौधरी चरण सिंह. वही चरण सिंह जो कांग्रेस के दिग्गज नेता और सरकार में मंत्री रहे थे. फिर क्या हुआ कि बागपत का ये किसान नेता बागी हो गया. और ऐसे गठबंधन का समीकरण तैयार किया जहां लेफ्ट और राइट पार्टियां एक साथ थीं.

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चरण सिंह ने 1 अप्रैल 1967 को कांग्रेस छोड़ दी थी.  (Photo: ITG) चरण सिंह ने 1 अप्रैल 1967 को कांग्रेस छोड़ दी थी. (Photo: ITG)

पन्ना लाल

  • नई दिल्ली,
  • 26 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 6:11 PM IST

1967 का वह ऐतिहासिक मोड़ जब उत्तर प्रदेश की राजनीति ने कांग्रेस के एकछत्र राज को चुनौती दी. उत्तर प्रदेश में आजादी के बाद करीब दो दशक तक कांग्रेस का दबदबा रहा. लेकिन 1967 के विधानसभा चुनाव ने इस राजनीतिक व्यवस्था की नींव हिला दी. यूपी में विधानसभा के चुनाव हुए. नतीजों ने दिखाया कि यूपी पर छाया कांग्रेस का तिलिस्म उतर रहा है. कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी तो बनी, मगर बहुमत से दूर रह गई. दूसरी तरफ, समाजवादी, जनसंघ, कम्युनिस्ट और दूसरे विपक्षी दलों की ताकत बढ़ गई थी.

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इसी बिखरे हुए विपक्ष को एकजुट करके बड़े चौधरी के नाम से यूपी की राजनीति में फेमस चौधरी चरण सिंह ने ऐसा राजनीतिक प्रयोग किया, जिसने उत्तर प्रदेश में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार का रास्ता खोल दिया. 

लेकिन चौधरी चरण सिंह ने ऐसा क्यों किया? उन्होंने कांग्रेस से बगावत क्यों की? उनकी गिनती तो कांग्रेस के बड़े नेताओं में होती थी, वे राज्य सरकार में मंत्री भी रहे थे. 

दरअसल चरण सिंह का कांग्रेस छोड़ना महज एक दिन में लिया गया फैसला नहीं था. इसके पीछे मुख्यमंत्री पद की दावेदारी, कांग्रेस के भीतर गुटबाजी, भ्रष्टाचार के आरोपों पर टकराव और इंदिरा गांधी के साथ बातचीत का नाकाम होना शामिल था. कांग्रेस से टक्कर लेने के लिए उन्होंने ऐसे दलों को एक साथ लाने की चुनौती स्वीकार की, जिनकी विचारधाराएं एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थीं. हिन्दुत्व संस्कृति और सरोकारों की राह पर चलने वाला जनसंघ और वाम विचारधारा की राजनीति कर रही कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया. 

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आखिरकार उन्हें भारत में गठबंधन सरकारों का आर्किटेक्ट यूं ही नहीं कहा जाता है. 

यह घटना न केवल यूपी बल्कि पूरे देश की राजनीति में गठबंधन युग की शुरुआत का प्रतीक बनी. जहां विचारधाराओं की दीवारें टूटकर सत्ता के नए समीकरण रचे गए. चरण सिंह का यह विद्रोह किसानों की आवाज और देश की राजनीति में क्षत्रपों के उभार का प्रतीक बन गया. 

मुख्यमंत्री पद से शुरू हुई लड़ाई

यूपी के 1967 के विधानसभा चुनाव के नतीजों में राजनीतिक करवट की कहानी छिपी हुई थी. 425 सीटों के लिए हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 199 सीटें हासिल हुई. लेकिन बहुमत का जादुई आंकड़ा 213 था. भारतीय जनसंघ ने तगड़ी पैठ बनाई. उसे 98 सीटें मिलीं, जबकि संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी ने 44 सीटें हासिल कीं.  कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया को 13 और स्वतंत्र पार्टी को 12 सीटें मिलीं.  कांग्रेस थी तो सबसे बड़ी पार्टी, लेकिन उसका पुराना राजनीतिक वर्चस्व क्षीण होता जा रहा था. 

चुनाव के बाद कांग्रेस के भीतर मुख्यमंत्री पद को लेकर खींचतान शुरू हुई. उस वक्त चंद्रभानु गुप्ता और चौधरी चरण सिंह के बीच पहले से राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता थी. चरण सिंह की भी महात्वाकांक्षाएं थी. वे भी सीएम बनना चाहते थे. चरण सिंह कांग्रेस के विधायक दल के नेता के लिए अपनी दावेदारी पेश करना चाहते थे. लेकिन पार्टी नेतृत्व को डर था कि नेतृत्व का खुला मुकाबला कमजोर हो चुकी कांग्रेस को और नुकसान पहुंचाएगा.

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लेकिन चरण सिंह कांग्रेस आलाकमान ने चरण सिंह की दावेदारी को तरजीह नहीं दी. 

चरण सिंह के राजनीतिक जीवन को संग्रहित करने वाली वेबसाइट charansingh.org के अनुसार इंदिरा गांधी के तीन प्रतिनिधियों ने उनसे बातचीत की और उन्हें चंद्रभानु गुप्ता के पक्ष में अपनी दावेदारी छोड़ने के लिए मनाया. चरण सिंह इसके लिए तैयार हो गए, लेकिन उन्होंने शर्त रखी कि गुप्ता के मंत्रिमंडल में शामिल कुछ ऐसे नेताओं को हटाया जाए, जिनकी छवि पर भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण सवाल उठ रहे थे. चरण सिंह का दावा था कि इस समझौते पर सहमति बनने के बावजूद उनकी शर्त पूरी नहीं की गई. 

चरण सिंह असंतुष्ट थे. यहीं से विवाद ने निर्णायक मोड़ लिया. चरण सिंह के लिए यह सिर्फ मुख्यमंत्री बनने या न बनने का सवाल नहीं रह गया था. वह इसे कांग्रेस के भीतर काम करने के तरीके और नेतृत्व के वादे से पीछे हटने के रूप में पेश कर रहे थे. हालांकि इस घटनाक्रम में उनकी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

यही नहीं चरण सिंह के कांग्रेस नेतृ्त्व के साथ वैचारिक मतभेद भी थे. चरण सिंह कृषि, किसान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्राथमिकता देते थे. ग्रामीण अर्थव्यवस्था की उनकी अवधारणा को इस बात से समझा जा सकता है कि उन्होंने जीवन भर हाथ से बुने खादी के कपड़े पहने. 

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उनकी आर्थिक सोच नेहरू के पूंजी प्रधान औद्योगीकरण के मॉडल से अलग थी. कांग्रेस में गुटबाजी और सत्ता की खींचतान से उनकी नाराजगी पहले से बढ़ रही थी. वे किसान हितों, व्यक्तिगत जोत और ग्रामीण विकास के प्रबल पक्षधर थे. नेहरूकालीन सहकारी खेती की नीति और पार्टी में बढ़ती शहरी पकड़ से वे असहमत थे. 

1 अप्रैल 1967: कांग्रेस के अलग हुए चरण सिंह

आखिरकार निर्दलीय विधायकों के समर्थन से चंद्रभानु गुप्ता ने 14-15 मार्च 1967 को अल्पमत सरकार बनाई. लेकिन चरण सिंह उसमें शामिल होने के लिए तैयार नहीं हुए. विधानसभा में सरकार के राज्यपाल के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर मतदान हुआ. लेकिन झटका आगे था.

1 अप्रैल 1967 को राज्यपाल के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चरण सिंह अपने 16-17 साथी कांग्रेस विधायकों के साथ विपक्ष के साथ मतदान कर गएय प्रस्ताव 215-198 से पारित हो गया, जो अविश्वास प्रस्ताव के बराबर था. गुप्ता सरकार मात्र 17-18 दिन में गिर गई.

1902 में पैदा हुए चरण सिंह ने 1927 में कांग्रेस जॉइन की थी. 40 साल बाद 1 अप्रैल 1967 को उनके 'चरण' से अलग हो गए. 

भारत की समकालीन राजनीति की दिग्गज कांग्रेस पार्टी के लिए ये बड़ी बात थी.  

समकालीन राजनीतिक इतिहासकार पॉल ब्रास के अध्ययन के मुताबिक, विपक्षी दलों ने इसे कांग्रेस की कमजोर होती पकड़ के संकेत के तौर पर देखा. 

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चरण सिंह का कांग्रेस छोड़ने का यह कदम निर्णायक था. कांग्रेस के पास यूपी विधानसभा में बहुमत नहीं था और उसके अपने विधायकों का एक दल भी उससे अलग हो गया था. विपक्षी गुट को अब सरकार बनाने का अवसर दिखाई देने लगा. चरण सिंह इस गुट के नेता थे. लेकिन उनके सामने सरकार बनाने के लिए जरूरी 213 विधायकों का समर्थन जुटाने की चुनौती थी. 

जनसंघ और कम्युनिस्ट एक साथ कैसे आए?

इस सवाल का जवाब उस समय की राजनीति में छिपा है. 1967 के चुनावों में कांग्रेस को चुनौती देने के लिए विपक्षी दलों के बीच पहले से ही एक व्यापक रणनीति बन रही थी.  समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया कांग्रेस को सत्ता से हटाने के लिए गैर-कांग्रेसी दलों के बीच सहयोग के समर्थक थे. इसे आम तौर पर गैर-कांग्रेसवाद की राजनीति कहा जाता है. 

इस रणनीति के तहत राजनीतिक दलों ने यह स्वीकार किया कि कांग्रेस को हराने के लिए जरूरी नहीं कि सभी दल अपनी कोर विचारधारा छोड़ दें. वे साझा सरकार बना सकते हैं, भले ही उनके सामाजिक आधार और आर्थिक नीतियों में भारी अंतर हो.

भारतीय जनसंघ के पास 98 विधायक थे. संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के 44 विधायक थे और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के 13 विधायक थे. इनके अलावा स्वतंत्र पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, रिपब्लिकन पार्टी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और निर्दलीय विधायकों की भी अहम भूमिका थी. 

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इसके अलावा चरण सिंह कांग्रेस से 17 विधायकों को लेकर आए थे. इस तरह सरकार बनने का आंकड़ा पूरा हो गया. 

जनसंघ: 98  
संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी: 44  
कम्युनिस्ट पार्टी:13  
स्वतन्त्र पार्टी:12  
प्रजा सोशलिस्ट पार्टी:11  
अन्य + निर्दलीय: 40

इस गठबंधन को नाम दिया गया संयुक्त विधायक दल (SVD)

जनसंघ के नानाजी देशमुख और समाजवादी खेमे के नेताओं ने विपक्षी एकता बनाने में भूमिका निभाई. राममनोहर लोहिया और राज नारायण जैसे समाजवादी नेताओं का जोर कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने पर था. दूसरी ओर जनसंघ के लिए भी कांग्रेस को चुनौती देने का यह बड़ा अवसर था.

दोनों खेमों के एक साथ आने का अर्थ वैचारिक सहमति नहीं, बल्कि साझा राजनीतिक लक्ष्य था. वामपंथी दलों और जनसंघ ने अपनी अलग-अलग पहचान बरकरार रखते हुए संयुक्त विधायक दल के तहत सरकार बनाने का रास्ता चुना. सरकार चलाने के लिए साझा न्यूनतम कार्यक्रम पर सहमति बनाई गई और मंत्रिमंडल में दलों की हिस्सेदारी उनके विधायकों के समर्थन के अनुपात में तय की गई.

जन की आवाज पर चरण सिंह ने बनाई जन कांग्रेस

कांग्रेस से अलग होने का तर्क बताते हुए चरण सिंह ने कहा कि उन्होंने जनता की पुकार (Call of the people) पर ये फैसला लिया है. उन्होंने अपनी पार्टी का नाम जन कांग्रेस रखा. बाद में यही पार्टी भारतीय क्रांति दल (BKD) बन गई. 

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48 घंटे बाद यूपी के पहले गैर कांग्रेसी सीएम बने चरण सिंह

चरण सिंह के कांग्रेस से अलग होने के बाद विपक्षी दलों के संयुक्त विधायक दल ने उन्हें अपना नेता चुना. यह गठबंधन किसी एक पार्टी का नहीं, बल्कि विधानसभा में मौजूद कई विपक्षी दलों और कांग्रेस से अलग हुए विधायकों का साझा मंच था.

गठबंधन के समर्थन के साथ चरण सिंह ने सरकार बनाने का दावा पेश किया. राज्यपाल विश्वनाथ दास ने उन्हें सरकार बनाने का अवसर दिया. 1 अप्रैल को यूपी में कांग्रेस की सरकार गिरने के बाद सूबे में नया इतिहास बनने जा रहा था. 

48 घंटे बाद  3 अप्रैल 1967 को चरण सिंह ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. वह राज्य के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने. 

इस सरकार में जनसंघ के राम प्रकाश गुप्ता उपमुख्यमंत्री बने. गठबंधन में चरण सिंह की जन कांग्रेस के साथ जनसंघ, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया, स्वतंत्र पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और अन्य समूह शामिल थे.

कितनी टिकाऊ रही सरकार

इस गठबंधन की सबसे बड़ी ताकत ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी थी. कांग्रेस को हटाने के सवाल पर सभी दल एकजुट थे, लेकिन सरकार की नीतियों पर उनकी राय अलग-अलग थी. सिर्फ ‘कांग्रेस हटाओ’ का राजनीतिक लक्ष्य इन्हें जोड़े हुए था. सत्ता में आने के बाद मंत्रिमंडल में जगह, नीति और प्रभाव को लेकर आपसी खींचतान शुरू हो गई. भाषा, भूमि और भ्रष्टाचार अहम मुद्दे थे. 

विवाद की एक बड़ी वजह भूमि राजस्व था. charansingh.org के अनुसार लेफ्ट पार्टियां भू राजस्व को खत्म करने के पक्ष में थी. चरण सिंह इसके पक्ष में नहीं थे, क्योंकि उनका मानना ​​था कि राज्य के पास संसाधनों की कमी है. राज्य कर्मचारियों की हड़ताल के मुद्दे पर भी कोई आम सहमति नहीं बन पाई. चरण सिंह ने इस हड़ताल को सख्ती से कुचल दिया था, जबकि गठबंधन में शामिल अन्य दलों ने कर्मचारियों की मांगों का समर्थन करने का वादा किया था. सरकार बनने के एक महीने के भीतर ही नेताओं का एक दल छोड़कर दूसरे दल में जाने का सिलसिला शुरू हो गया. 

भाषा का विवाद दूसरा मुद्दा था

जनवरी 1968 में SSP ने 'अंग्रेजी हटाओ' आंदोलन शुरू किया. इसमें SSP के दो मंत्रियों ने गिरफ्तारी दी. चरण सिंह ने पुलिस कार्रवाई करवाई, इससे SSP नाराज हो गई और 5 जनवरी के आसपास गठबंधन से अलग हो गई. अन्य दल भी समर्थन वापस लेने लगे. सरकार अल्पमत में आ गई.17 फरवरी 1968 को चरण सिंह ने राज्यपाल को इस्तीफा सौंप दिया और विधानसभा भंग करने की सिफारिश की. 25 फरवरी को राष्ट्रपति शासन लागू हो गया.

हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार सीएम पद से इस्तीफा देने के बाद उन्होंने कहा,"इसमें कोई शक नहीं कि यह एक नया प्रयोग था, लेकिन यह कोई सुखद प्रयोग नहीं रहा."

सत्ता के लिए सिद्धांतों से समझौता करने के सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा था, "अपने पद से इस्तीफा देते हुए, मैं किसी को दोष नहीं देता. इतने अलग-अलग तत्वों वाले गठबंधन में सिद्धांतों के साथ कुछ तालमेल बिठाना ज़रूरी हो जाता है. लेकिन इस तालमेल या समझौते की भी एक सीमा होती है. मेरे मामले में वह सीमा आ गई है; यानी अब एक ऐसा मोड़ आ गया है जहां मैं लोगों के भविष्य और उनके हितों के साथ और अधिक समझौता नहीं कर सकता."

इस पूरे घटनाक्रम का ऐतिहासिक महत्व यह था कि उत्तर प्रदेश में पहली बार कांग्रेस का लंबे समय से चला आ रहा सिंगल पार्टी का दबदबा खत्म हुआ. चरण सिंह की व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षा, कांग्रेस के भीतर नेतृत्व का संघर्ष और लोहिया के गैर-कांग्रेसवाद ने मिलकर एक ऐसी सरकार बनाई, जिसमें जनसंघ से लेकर कम्युनिस्टों तक ने साथ काम किया.

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