'भारत का स्विट्जरलैंड' कौसानी और कत्यूरी इतिहास समेटे बागेश्वर जिले का सियासी मिजाज

ऐतिहासिक कुली बेगार आंदोलन और कत्यूरी विरासत की धरती बागेश्वर में 2027 के उत्तराखंड चुनावों को लेकर सियासी पारा चढ़ गया है. बागेश्वर (SC) और कपकोट विधानसभा सीटों पर पलायन, स्वास्थ्य, सड़क और जंगली जानवरों का संकट मुख्य चुनावी मुद्दे हैं. पर्यटन अपार संभावनाओं के बावजूद बुनियादी विकास के लिए तरस रहा है.

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क्या हैं बागेश्वर के सियासी समीकरण (Photo-ITG) क्या हैं बागेश्वर के सियासी समीकरण (Photo-ITG)

किशोर जोशी

  • नई दिल्ली,
  • 28 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 1:26 PM IST

उत्तराखंड में चुनावी सरगर्मियां तेज होने लगी हैं. नेताओं और मंत्रियों के ग्रामीण दौरे बढ़ रहे हैं. कहीं विकास योजनाओं का हिसाब मांगा जा रहा है, तो कहीं सड़क, अस्पताल और रोजगार की मांग एक बार फिर उठ रही है. चुनावी माहौल में हर नेता जनता का सबसे बड़ा हितैषी बनने की कोशिश में जुटा है. इसी सियासी हलचल के बीच कुमाऊं मंडल के बागेश्वर जिले की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है.

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जिले की सीमाएं अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ और गढ़वाल मंडल के चमोली से मिलती हैं.बाबा बागनाथ की नगरी के रूप में पहचान रखने वाला यह जिला अपनी धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक विरासत और प्राकृतिक खूबसूरती के साथ उन बुनियादी सवालों को भी समेटे हुए है, जिनका जवाब यहां के मतदाता चुनाव के समय तलाशते हैं.

पवित्र सरयू और गोमती नदियों के संगम पर बसा बागेश्वर उत्तराखंड के उन जिलों में शामिल है, जिनकी पहचान केवल मंदिरों और पहाड़ों तक सीमित नहीं है. यह इलाका 1921 के कुली बेगार आंदोलन के इतिहास से भी जुड़ा है. ब्रिटिश शासन के दौरान बिना उचित भुगतान के बेगार कराने की प्रथा के खिलाफ उठी आवाज ने यहां के लोगों में अधिकारों के प्रति जागरूकता और सामूहिक प्रतिरोध की भावना को मजबूती दी.

जिले का ऐतिहासिक महत्व

बागेश्वर पहले अल्मोड़ा जिले का हिस्सा था. लंबे समय से अलग जिला बनाने की मांग के बाद 15 सितंबर 1997 को इसे स्वतंत्र जिले का दर्जा मिला. आज भी यहां के दूरस्थ गांवों में प्रशासनिक पहुंच, बुनियादी सुविधाओं और विकास की समान भागीदारी से जुड़े सवाल प्रासंगिक हैं.

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पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, बागेश्वर को भगवान शिव के प्रिय स्थल ‘व्याघ्रेश्वर’ से जोड़कर देखा जाता है. कत्यूरी शासनकाल की विरासत भी इस क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान का अहम हिस्सा है. गरुड़ क्षेत्र की कत्यूरी घाटी में स्थित बैजनाथ मंदिर समूह प्राचीन स्थापत्य कला की झलक पेश करता है. वहीं, बागनाथ मंदिर सरयू-गोमती संगम के पास स्थित होने के कारण श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है. चंडिका मंदिर और गरुड़ के पास स्थित कोट भ्रामरी देवी मंदिर भी जिले की धार्मिक पहचान को मजबूत करते हैं. 

कौसानी में स्थित सरला आश्रम (और प्रसिद्ध छायावादी कवयित्री महादेवी वर्मा दोनों का ही बागेश्वर जिले से गहरा ऐतिहासिक व सांस्कृतिक संबंध है. सरला आश्रम की स्थापना गांधी जी की ब्रिटिश शिष्या सरला बहन ने वर्ष 1948 में की थी.महादेवी वर्मा का भी कौसानी और इस आश्रम से विशेष जुड़ाव रहा है.

कुमाऊंनी संस्कृति, लोकपरंपरा

बागेश्वर की संस्कृति में कुमाऊंनी भाषा, लोकगीत, पारंपरिक नृत्य और सामुदायिक जीवन की गहरी छाप दिखाई देती है. यहां हिंदी के साथ कुमाऊंनी का व्यापक इस्तेमाल होता है. मकर संक्रांति पर लगने वाला उत्तरायणी मेला धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक मेल-मिलाप और स्थानीय कारोबार का भी बड़ा अवसर है. यह मेला ऐतिहासिक रूप से व्यापारिक गतिविधियों और दूर-दराज के क्षेत्रों के लोगों के जुटान के लिए भी जाना जाता रहा है. विवाह और मांगलिक अवसरों पर किया जाने वाला छोलिया नृत्य कुमाऊं की लोकसंस्कृति की खास पहचान है.

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स्थानीय अनाज, शहद, दालें और दूसरे पहाड़ी उत्पाद ग्रामीण अर्थव्यवस्था के साथ-साथ पर्यटन को भी नई पहचान दे सकते हैं. सवाल यह है कि इन उत्पादों को बड़े बाजारों तक पहुंचाने और स्थानीय परिवारों की आमदनी बढ़ाने के लिए कितने प्रभावी अवसर तैयार किए जा रहे हैं.

हिमालयी खूबसूरती और पर्यटन की संभावनाएं

कुमाऊं हिमालय के सबसे सुलभ और प्रसिद्ध पिंडारी, काफनी और सुंदरढूंगा ग्लेशियर का बेस कैंप यही बागेश्वर है. महात्मा गांधी द्वारा 'भारत का स्विट्जरलैंड' कहे गए कौसानी के चाय बागान, सनसेट, चाय के बागान और 300-डिग्री में फैले त्रिशूल, नंदा देवी व पंचचूली चोटियों का विहंगम नजारा देश-विदेश के पर्यटकों को खींच लाते हैं. विजयपुर भी अपने शांत वातावरण और प्राकृतिक दृश्यों के कारण पर्यटकों को आकर्षित करता है. इसके बावजूद, स्थानीय लोगों का कहना है कि पर्यटन नीति का जो लाभ सीधे युवाओं को मिलना चाहिए था, वह अब तक आधा-अधूरा ही है.

पर्यटन की संभावनाओं के बावजूद असली चुनौती यह है कि इसका लाभ स्थानीय लोगों तक कितनी दूर पहुंचता है. क्या दूरस्थ गांवों में होम स्टे चलाने वाले परिवारों की आय बढ़ रही है? क्या युवाओं को गाइड, ट्रेकिंग, स्थानीय भोजन और परिवहन से स्थायी रोजगार मिल रहा है? क्या सड़क, मोबाइल नेटवर्क, साफ-सफाई और आपदा सुरक्षा की व्यवस्था पर्यटकों के साथ स्थानीय निवासियों के लिए भी बेहतर हो रही है? चुनावी बहस में इन सवालों को जगह मिलना जरूरी है.

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चुनावी राजनीति के केंद्र में पलायन और बुनियादी सुविधाएं

बागेश्वर जिले की राजनीति में पलायन, बेरोजगारी, अवैध खनन, सड़क संपर्क, पेयजल, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं अहम मुद्दे हैं. पहाड़ के गांवों से युवाओं का बाहर जाना केवल रोजगार का सवाल नहीं, बल्कि खेती, स्कूलों, स्थानीय बाजार और गांवों की सामाजिक संरचना से भी जुड़ा है. ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क पहुंच और मोबाइल नेटवर्क की कमी रोजमर्रा की जिंदगी से लेकर आपातकालीन सेवाओं तक असर डालती है. जिला अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टरों और आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता भी मतदाताओं की चिंताओं में शामिल है. गंभीर मरीजों को बड़े शहरों में रेफर करना पड़े तो पहाड़ी परिवारों के लिए इलाज का खर्च और यात्रा दोनों मुश्किल बन जाते हैं.

हालिया महीनों में क्षेत्र के लोगों का आक्रोश खुलकर सामने आया है. अगस्त 2026 में जहां फूलवाड़ी के ग्रामीण सड़क और मोबाइल नेटवर्क के लिए भूख हड़ताल पर बैठे, वहीं अक्टूबर 2026 में कपकोट के थांगधार और गड़खरीख के ग्रामीणों ने मांगें पूरी न होने पर चुनाव बहिष्कार तक का ऐलान कर दिया. इसके अलावा, जंगली जानवरों (सूअर व बंदर) द्वारा फसलों की तबाही भी खेती-किसानी के लिए बड़ा संकट बनी हुई है.

स्थानीय स्तर पर सड़क, पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की मांग को लेकर ग्रामीणों की आवाज समय-समय पर उठती रही है. कपकोट क्षेत्र के दूरस्थ गांवों में सड़क और मोबाइल कनेक्टिविटी की मांग खास तौर पर महत्वपूर्ण रही है. किसानों के लिए बंदर और जंगली सूअर से फसलों को होने वाला नुकसान भी बड़ी चुनौती है. ऐसे में चुनाव के दौरान सिर्फ नई योजनाओं और घोषणाओं की बात नहीं, बल्कि यह देखना भी जरूरी होगा कि पहले किए गए वादों पर कितना काम हुआ और उसका लाभ किन गांवों तक पहुंचा.

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बागेश्वर और कपकोट: दो सीटें, अलग चुनौतियां

बागेश्वर विधानसभा सीट (SC)- बागेश्वर विधानसभा सीट इस जिले की सबसे प्रमुख और राजनीतिक रूप से संवेदनशील सीट है, जो अनुसूचित जाति (SC) के लिए सुरक्षित है. फिलहाल यहां से बीजेपी की पार्वती दास विधायक हैं जो पूर्व विधायक चंदन राम दास की पत्नी हैं. यह सीट जिले का मुख्य प्रशासनिक और व्यापारिक केंद्र है, जहां सरयू और गोमती का पावन संगम स्थित है. यहाँ की राजनीति मुख्य रूप से स्थानीय विकास, सरयू नदी के संरक्षण, शहर में ट्रैफिक प्रबंधन और जिला अस्पताल की सुविधाओं जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती है. ऐतिहासिक रूप से यहां भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला देखने को मिलता है.

इस विधानसभा क्षेत्र की पहचान जिला मुख्यालय, बागनाथ मंदिर, सरयू-गोमती संगम और उत्तरायणी मेले से भी जुड़ी है. यहां चुनावी मुद्दों में शहरी सुविधाओं का विस्तार, यातायात और बाजार व्यवस्था, पेयजल, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा, युवाओं के लिए रोजगार और पर्यटन से स्थानीय कारोबार को बढ़ावा देना शामिल हैं. साथ ही, ग्रामीण इलाकों में सड़क, खेती को जंगली जानवरों से होने वाला नुकसान और पलायन जैसे सवाल भी महत्वपूर्ण हैं.

2- कपकोट विधानसभा सीट- कपकोट विधानसभा सीट भौगोलिक दृष्टि से अत्यधिक विस्तृत, दुर्गम और प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर क्षेत्र है. पूर्व मुख्यमंत्री और महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के गृह क्षेत्र की यह सीट भी फिलहाल बीजेपी के कब्जे में हैं और सुरेश गढ़िया यहां से विधायक हैं. यह सीट उच्च हिमालयी क्षेत्रों, प्रसिद्ध पिंडारी, काफनी और सुंदरढूंगा ग्लेशियरों के बेस कैंप और पिंडर घाटी को अपने में समेटे हुए है. यहां की राजनीति का मुख्य केंद्र दूरदराज के पर्वतीय गांवों की बुनियादी समस्याएं हैं. बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, आपात स्थिति में डोली के सहारे मरीजों को अस्पताल पहुंचाना और मानसून के दौरान भूस्खलन से सड़कें बंद हो जाना यहाँ के मतदाताओं के लिए सबसे बड़े और संवेदनशील चुनावी मुद्दे हैं.

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इसके अलावा, कपकोट क्षेत्र में पलायन एक बड़ी चुनौती है, जिसे रोकने के लिए साहसिक पर्यटन और होम-स्टे नीति को धरातल पर उतारने की मांग हमेशा उठती रही है. प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा, जंगलों में आग (दवानल) पर नियंत्रण और जंगली जानवरों द्वारा फसलों को पहुंचाए जाने वाले नुकसान से किसानों की सुरक्षा यहां के मुख्य चुनावी बिंदु हैं.

मतदाताओं की कसौटी पर विकास

बागेश्वर की चुनावी तस्वीर को समझने के लिए केवल नेताओं की सभाएं और घोषणाएं देखना पर्याप्त नहीं होगा. गांवों में जाकर यह जानना होगा कि लोगों की प्राथमिकताएं क्या हैं, सरकारी योजनाओं का लाभ किसे मिला और किन समस्याओं का समाधान अब भी बाकी है. एक ओर धार्मिक और प्राकृतिक पर्यटन जिले की आर्थिक संभावनाएं बढ़ा सकता है, तो दूसरी ओर सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसी बुनियादी जरूरतें पूरी करना जरूरी है. आखिरकार, बागेश्वर के मतदाताओं के सामने सवाल यही रहेगा कि चुनावी वादे गांवों की जमीन पर कितना असर दिखाते हैं.  

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